दाद समझकर न करें नजरअंदाज! शिंगल्स के बाद बढ़ सकता है स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरनाक जोखिम
त्वचा पर अचानक जलन, चुभन या तेज दर्द के बाद एक तरफ छोटे-छोटे फफोले दिखाई दें तो इसे मामूली दाद समझकर नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। यह शिंगल्स यानी हर्पीज जोस्टर हो सकता है—एक ऐसा वायरल संक्रमण जो केवल त्वचा को प्रभावित करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नसों से जुड़ी गंभीर परेशानियां भी पैदा कर सकता है।
पिछले वर्षों में सामने आए शोधों ने शिंगल्स के बाद स्ट्रोक और कुछ हृदय संबंधी घटनाओं के जोखिम में संभावित बढ़ोतरी की ओर ध्यान खींचा है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर शिंगल्स मरीज को स्ट्रोक या हार्ट अटैक होगा, लेकिन संक्रमण के बाद कुछ समय तक शरीर में होने वाले बदलावों को गंभीरता से लेने की जरूरत जरूर बताई गई है।
शिंगल्स आखिर होता क्यों है?
शिंगल्स का कारण वैरिसेला-जोस्टर वायरस है। यही वायरस पहली बार संक्रमण होने पर चिकनपॉक्स का कारण बनता है।
चिकनपॉक्स ठीक होने के बाद वायरस शरीर से पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वह तंत्रिका तंत्र की कुछ नसों में निष्क्रिय अवस्था में रह सकता है। कई साल बाद जब प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है या उम्र बढ़ने के साथ शरीर की वायरस को नियंत्रित करने की क्षमता कम होती है, तो वही वायरस दोबारा सक्रिय हो सकता है।
इस दोबारा सक्रियता का परिणाम शिंगल्स के रूप में सामने आता है।
इसकी खास पहचान यह है कि दर्द या जलन अक्सर दाने निकलने से पहले शुरू हो जाती है। इसके बाद शरीर के किसी एक हिस्से में, आमतौर पर नसों के रास्ते के अनुरूप, फफोले दिखाई देने लगते हैं।
साधारण दाद से अलग कैसे पहचानें?
शिंगल्स की शुरुआत कई बार त्वचा पर दिखाई देने वाले निशान से नहीं, बल्कि नसों से जुड़े दर्द से होती है।
मरीज को प्रभावित हिस्से में—
- जलन या चुभन
- झुनझुनी
- तेज दर्द
- खुजली
- त्वचा छूने पर असामान्य संवेदनशीलता
जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं।
इसके बाद एक तरफ फफोले या दाने निकलते हैं। यही एकतरफा पैटर्न कई मामलों में इसे सामान्य फंगल इंफेक्शन से अलग पहचानने में मदद करता है।
हालांकि, हर व्यक्ति में लक्षण एक जैसे नहीं होते। इसलिए केवल देखकर स्वयं बीमारी तय करने के बजाय चिकित्सकीय जांच अधिक सुरक्षित विकल्प है।
असली परेशानी दाने खत्म होने के बाद भी रह सकती है
शिंगल्स का सबसे परेशान करने वाला असर कई बार संक्रमण खत्म होने के बाद सामने आता है।
कुछ मरीजों में पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया विकसित हो सकती है। इसमें त्वचा पर मौजूद दाने ठीक हो जाने के बावजूद उसी हिस्से में नसों का दर्द बना रहता है। दर्द जलन, बिजली के झटके या चुभन जैसा महसूस हो सकता है।
उम्र बढ़ने के साथ इस जटिलता का खतरा बढ़ता है।
यदि शिंगल्स आंख या चेहरे के आसपास दिखाई दे, तो इसे विशेष रूप से गंभीरता से लेने की जरूरत होती है, क्योंकि आंखों और दृष्टि पर असर पड़ सकता है। बहुत दुर्लभ मामलों में संक्रमण तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हुए मस्तिष्क में सूजन जैसी गंभीर स्थिति से भी जुड़ सकता है।
स्ट्रोक से संभावित कनेक्शन कहां से आता है?
यहीं इस बीमारी का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पहलू सामने आता है।
कुछ अध्ययनों में शिंगल्स के बाद स्ट्रोक के जोखिम में बढ़ोतरी देखी गई है, खासकर संक्रमण के शुरुआती समय में। वैज्ञानिकों ने इसके पीछे कई संभावित जैविक प्रक्रियाओं पर विचार किया है।
एक संभावना यह है कि वायरस रक्त-नलिकाओं के आसपास या उनकी दीवारों में सूजन पैदा कर सकता है। इसे वैस्कुलोपैथी से जोड़ा जाता है। रक्त-नलिकाओं में सूजन और अन्य बदलाव मस्तिष्क तक रक्त पहुंचने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—शिंगल्स और स्ट्रोक के बीच संबंध मिलना कारण-परिणाम का सीधा प्रमाण नहीं है। किसी व्यक्ति में स्ट्रोक का जोखिम उम्र, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान, कोलेस्ट्रॉल और अन्य हृदय संबंधी कारकों से भी प्रभावित होता है।
इसलिए शिंगल्स को एक संभावित अतिरिक्त जोखिम कारक के रूप में समझना अधिक उचित है, न कि स्ट्रोक का सीधा कारण मान लेना।
दिल के लिए भी क्यों महत्वपूर्ण है?
शोध में हर्पीज जोस्टर के बाद कुछ कार्डियोवैस्कुलर घटनाओं के साथ भी संबंध देखा गया है। संभावित वजहों में संक्रमण के दौरान शरीर में बढ़ने वाली सूजन और रक्त-नलिकाओं पर उसका प्रभाव शामिल हो सकता है।
यहां भी यही सावधानी जरूरी है कि संबंध का मतलब यह नहीं कि शिंगल्स सीधे हार्ट अटैक कर देता है।
लेकिन यदि किसी व्यक्ति में पहले से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल या हृदय रोग जैसे जोखिम मौजूद हैं, तो किसी भी गंभीर संक्रमण के दौरान स्वास्थ्य पर अतिरिक्त नजर रखना समझदारी है।
इलाज में देरी क्यों पड़ सकती है भारी?
शिंगल्स के मामले में समय महत्वपूर्ण हो सकता है। शुरुआती चरण में डॉक्टर की सलाह से एंटीवायरल उपचार दिया जा सकता है, जो बीमारी की गंभीरता और कुछ जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
यही कारण है कि दर्दनाक एकतरफा दाने या फफोलों को कई दिनों तक घरेलू इलाज से दबाकर रखने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
खासकर चेहरे, आंख या कान के आसपास हुए रैश को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
बचाव का सबसे मजबूत तरीका क्या है?
शिंगल्स से बचाव के लिए वैक्सीन एक महत्वपूर्ण विकल्प है। विशेष रूप से उम्रदराज लोगों और कुछ उच्च जोखिम वाले समूहों में इसके बारे में डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है।
टीकाकरण का उद्देश्य वायरस को पूरी तरह शरीर से खत्म करना नहीं, बल्कि भविष्य में इसके दोबारा सक्रिय होने और गंभीर जटिलताओं की संभावना को कम करना है।
इसके अलावा, यदि किसी व्यक्ति को सक्रिय शिंगल्स है, तो फफोलों को ढंककर रखना और सीधे संपर्क से बचना महत्वपूर्ण है। ऐसे व्यक्ति के फफोलों के तरल के संपर्क से उस व्यक्ति में वैरिसेला-जोस्टर वायरस का संक्रमण हो सकता है, जिसे पहले चिकनपॉक्स नहीं हुआ है या टीकाकरण नहीं हुआ है।
किन संकेतों पर तुरंत मदद लेनी चाहिए?
यदि शिंगल्स के साथ अचानक—
- चेहरे या हाथ-पैर में कमजोरी या सुन्नपन
- बोलने में परेशानी
- चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा होना
- अचानक देखने में दिक्कत
- तेज चक्कर या चलने में परेशानी
- अचानक बहुत तेज सिरदर्द
- सीने में दबाव या दर्द
- सांस लेने में तकलीफ
जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे केवल त्वचा की बीमारी मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए। ये आपात स्थिति के संकेत हो सकते हैं और तत्काल चिकित्सा सहायता जरूरी है।
आगे की तस्वीर क्या कहती है?
शिंगल्स को लेकर बदलती मेडिकल समझ का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि किसी संक्रमण का असर केवल उसी अंग तक सीमित मानना हमेशा सही नहीं होता। तंत्रिका तंत्र, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और रक्त-नलिकाओं के बीच जटिल संबंधों पर लगातार शोध हो रहा है।
आने वाले समय में बेहतर डेटा यह स्पष्ट करने में मदद कर सकता है कि किन मरीजों में संक्रमण के बाद स्ट्रोक या हृदय संबंधी जटिलताओं का जोखिम अपेक्षाकृत ज्यादा होता है। इससे इलाज और निगरानी की रणनीति भी अधिक व्यक्तिगत बनाई जा सकती है।



