छत्तीसगढ़ की दर्दनाक तस्वीर: 3 घंटे इंतजार के बाद बांस की बल्ली बनी शवगाड़ी, सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र से सामने आई तस्वीरें दूरस्थ इलाकों की स्वास्थ्य व्यवस्था की उस हकीकत को सामने लाती हैं, जिसे आंकड़ों से समझना मुश्किल है। एक परिवार ने पहले अपने लापता सदस्य को जंगल में मृत पाया और फिर पोस्टमार्टम के बाद उसके शव को घर ले जाने के लिए घंटों इंतजार किया। जब सरकारी शव वाहन नहीं पहुंचा तो आखिरकार बांस की बल्ली और कपड़े के सहारे शव को गांव तक ले जाना पड़ा।
यह छत्तीसगढ़ शव वाहन मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सवाल केवल एक वाहन की अनुपलब्धता का नहीं है। सवाल यह है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिवार को सम्मानजनक तरीके से शव घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी व्यवस्था की किस कड़ी पर खत्म हो जाती है।
पांच दिन की तलाश का अंत, फिर शुरू हुआ दूसरा संघर्ष
बेहराडीह निवासी सुमेर सिंह, जो कमार जनजाति से थे, करीब पांच दिनों से लापता बताए गए थे। परिवार और आसपास के लोग उनकी तलाश कर रहे थे। इसी दौरान बरदुला जंगल में एक पेड़ पर उनका शव मिला।
सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। परिवार के लिए यह पहले ही बेहद कठिन समय था। लेकिन पोस्टमार्टम के बाद उन्हें एक और समस्या का सामना करना पड़ा।
शव को गांव तक ले जाने के लिए वाहन की जरूरत थी।
तीन घंटे का इंतजार और फिर टूट गई उम्मीद
पोस्टमार्टम पूरा होने के बाद परिजनों को उम्मीद थी कि शव परिवहन की व्यवस्था हो जाएगी। लेकिन बताया गया कि लगभग तीन घंटे तक इंतजार के बावजूद शव वाहन उपलब्ध नहीं हुआ।
दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में यह देरी केवल समय की समस्या नहीं होती। जंगल और खराब पहुंच वाले रास्तों के बीच किसी शव को निजी वाहन से ले जाना हर परिवार के लिए संभव नहीं होता। खासकर ऐसे परिवारों के लिए जिनके पास आर्थिक संसाधन सीमित हों।
आखिरकार परिजनों ने बांस की बल्ली और कपड़े का सहारा लिया। दो लोगों ने बल्ली को कंधे पर रखा और शव को लेकर जंगल के रास्ते गांव की ओर चल पड़े।
सवाल वाहन से बड़ा है
इस घटना की सबसे गंभीर तस्वीर यही है कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य मुश्किल समय में परिवार का बोझ कम करना होना चाहिए, उसकी अनुपस्थिति में परिवार को खुद ही रास्ता निकालना पड़ा।
स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल अस्पताल, डॉक्टर, दवा और एंबुलेंस की उपलब्धता से नहीं मापा जा सकता। किसी दूरस्थ क्षेत्र में मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने से लेकर उपचार और मृत्यु की स्थिति में शव को वापस घर तक पहुंचाने तक पूरी व्यवस्था एक निरंतर श्रृंखला होती है।
इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी कमजोर हो तो कागज पर मौजूद सुविधाएं जमीन पर अधूरी साबित हो सकती हैं।
आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों में चुनौती और बड़ी
मैनपुर जैसे वनांचल क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियां सामान्य शहरी इलाकों से अलग हैं। कई गांव मुख्य सड़कों से दूर हैं और जंगल के भीतर या दुर्गम मार्गों से जुड़े हुए हैं। ऐसे क्षेत्रों में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वाहन उपलब्ध है या नहीं।
जरूरी यह भी है कि किस परिस्थिति में वाहन भेजा जाएगा, कौन विभाग जिम्मेदार होगा, कितनी दूरी तक सेवा उपलब्ध होगी और आपात स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी, इसका स्पष्ट तंत्र मौजूद हो।
अगर किसी परिवार को पोस्टमार्टम के बाद भी घंटों इंतजार करना पड़े और अंततः शव को कंधे पर ले जाना पड़े, तो यह व्यवस्था की पहुंच और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़ा करता है।
अब जवाबदेही की जरूरत
इस घटना के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के सामने कुछ व्यावहारिक सवाल हैं—क्या संबंधित क्षेत्र में शव परिवहन के लिए निर्धारित वाहन उपलब्ध है? अगर वाहन किसी अन्य स्थान पर था तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं बनी? परिजनों को सहायता उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किस अधिकारी या संस्था की थी? और दूरस्थ गांवों के लिए ऐसी स्थिति में बैकअप व्यवस्था क्या है?
इन सवालों के जवाब केवल इस परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
आगे सुधार की दिशा क्या हो सकती है?
दुर्गम इलाकों में स्थायी समाधान केवल अतिरिक्त वाहन खरीदना नहीं है। जिला स्तर पर शव परिवहन की स्पष्ट जिम्मेदारी, 24 घंटे संपर्क व्यवस्था, बैकअप वाहन, स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य केंद्रों के बीच समन्वय तथा दूरस्थ गांवों की मैपिंग जैसी व्यवस्थाएं जरूरी हैं।
जहां सड़क संपर्क कमजोर है, वहां स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों को भी आधिकारिक आपात व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। इससे किसी परिवार को अंतिम समय में खुद साधन तलाशने की स्थिति से बचाया जा सकता है।
सुमेर सिंह के परिवार के लिए यह घटना एक निजी त्रासदी है। लेकिन जिस तरह शव को बांस की बल्ली पर रखकर जंगल के रास्ते ले जाने की तस्वीर सामने आई है, वह नीति और प्रशासन के लिए इससे बड़ा सवाल छोड़ती है—क्या स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी अस्पताल के दरवाजे पर खत्म हो जाती है, या अंतिम यात्रा तक परिवार के साथ खड़ा रहना भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है?



