एशियाड में भारत का शानदार धमाका: 44 साल बाद महिला हॉकी में गोल्ड, एक दिन में 6 स्वर्ण से रचा इतिहास
एशियन गेम्स के 13वें दिन भारतीय खेल जगत के लिए कई यादगार अध्याय एक साथ लिखे गए। सबसे बड़ी उपलब्धि महिला हॉकी टीम ने हासिल की, जिसने 44 साल के लंबे इंतजार को खत्म करते हुए चीन को 1-0 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस जीत का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसके साथ भारत ने लॉस एंजिलिस 2028 ओलिंपिक का टिकट भी हासिल कर लिया।
लेकिन भारत की कहानी सिर्फ हॉकी के गोल्ड तक सीमित नहीं रही। बॉक्सिंग, कुश्ती और तीरंदाजी में लगातार मिली सफलताओं ने 13वें दिन को भारतीय दल के लिए बेहद खास बना दिया। एक ही दिन भारत की झोली में छह स्वर्ण पदक आए।
महिला हॉकी ने खत्म किया 44 साल का इंतजार
फाइनल में चीन के खिलाफ भारतीय टीम को सिर्फ एक गोल की जरूरत पड़ी। लालरेमसियामी के निर्णायक गोल ने भारत को बढ़त दिलाई, लेकिन मुकाबले का तनाव यहीं खत्म नहीं हुआ।
पहले हाफ में चीन को मिले पेनल्टी स्ट्रोक के समय गोलकीपर सविता पूनिया ने शानदार बचाव करते हुए भारत की बढ़त को कायम रखा। ऐसे मुकाबलों में एक गोल की बढ़त बेहद नाजुक होती है और गोलकीपर की एक गलती पूरा परिणाम बदल सकती है। सविता का बचाव इसी लिहाज से निर्णायक साबित हुआ।
भारत ने इससे पहले महिला हॉकी में 1982 में गोल्ड जीता था। चार दशक से अधिक समय बाद उसी उपलब्धि को दोहराना इस टीम के सफर की अहम कड़ी है।
गोल्ड के साथ ओलिंपिक का रास्ता साफ
एशियन गेम्स का यह स्वर्ण सिर्फ पदक तालिका में एक और गोल्ड नहीं जोड़ता। भारत के लिए इसका सीधा संबंध ओलिंपिक क्वालिफिकेशन से है।
लॉस एंजिलिस 2028 के लिए क्वालिफाई करना टीम को अब अगले बड़े लक्ष्य की ओर जल्दी बढ़ने का मौका देगा। इससे तैयारी के लिए लंबा समय मिलेगा और टीम को क्वालिफिकेशन की अतिरिक्त प्रक्रिया से गुजरने का दबाव भी कम होगा।
महिला हॉकी के लिहाज से यह इसलिए भी अहम है क्योंकि भारतीय टीम ने पिछले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाई है। अब चुनौती इस लय को ओलिंपिक तक बनाए रखने की होगी।
एक दिन में बॉक्सिंग के तीन चैंपियन
भारत की सफलता का दूसरा बड़ा केंद्र बॉक्सिंग रहा। एक ही एशियन गेम्स में पहली बार तीन भारतीय मुक्केबाजों ने स्वर्ण पदक जीतने की उपलब्धि हासिल की।
परवीन हुड्डा ने महिलाओं के 65 किग्रा वर्ग में 3-2 से जीत दर्ज की। इसके बाद लवलीना बोरगोहेन ने 75 किग्रा वर्ग में 5-0 के स्पष्ट अंतर से फाइनल जीता।
दिन का तीसरा बॉक्सिंग गोल्ड अंकुश पंघाल ने 80 किग्रा वर्ग में दक्षिण कोरिया के किम मिन-सियोंग को 4-0 से हराकर हासिल किया।
अंकुश की जीत का एक अतिरिक्त महत्व भी है। वह 2018 के बाद एशियन गेम्स में पुरुष बॉक्सिंग का स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष मुक्केबाज बने।
इन परिणामों को सिर्फ पदकों की संख्या से देखना अधूरा होगा। अलग-अलग भार वर्गों में भारतीय मुक्केबाजों का प्रदर्शन बताता है कि देश के पास अब एक से ज्यादा वर्गों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने वाले खिलाड़ी मौजूद हैं।
कुश्ती में आखिरी मिनट का अविश्वसनीय पल
सुजीत कलकल का 65 किग्रा फ्रीस्टाइल फाइनल भारतीय खेल प्रशंसकों को लंबे समय तक याद रहेगा।
ताजिकिस्तान के अब्दुलमजीद कुडिएव के खिलाफ मुकाबले में सुजीत एक समय 2-9 से पीछे थे। मैच में केवल 1 मिनट 40 सेकंड का समय बचा था। ऐसी स्थिति में वापसी के लिए सिर्फ आक्रमण नहीं, बल्कि बेहद सटीक रणनीति और मानसिक मजबूती की जरूरत होती है।
सुजीत ने लगातार टेकडाउन के जरिए अंतर कम किया और अंतिम 11 सेकंड में एक और टेकडाउन से स्कोर 10-9 कर दिया। इस एक अंक ने मुकाबले का पूरा रुख बदल दिया और भारत को कुश्ती में स्वर्ण मिल गया।
यह जीत युवा पहलवानों के लिए खास संदेश भी देती है—फाइनल का परिणाम आखिरी सेकंड तक बदल सकता है।
तीरंदाजी में भी भारत का दबदबा
महिला रिकर्व टीम ने भी भारत के स्वर्णिम अभियान को आगे बढ़ाया। कुमकुम मोहोड, अंकिता भक्त और कीर्ति की टीम ने फाइनल जीतकर गोल्ड हासिल किया।
रिकर्व टीम इवेंट में मुकाबला सेट पॉइंट के आधार पर तय होता है। ऐसे प्रारूप में सिर्फ निशाना सटीक होना पर्याप्त नहीं होता; दबाव के बीच लगातार सेट जीतने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
भारत की पुरुष रिकर्व टीम को सिल्वर मिला, जबकि कुमकुम मोहोड और धीरज बोम्मदेवरा की मिश्रित रिकर्व टीम ने भी रजत पदक हासिल किया। इससे तीरंदाजी में भारत की कुल पदक स्थिति और मजबूत हुई।
13वें दिन छह गोल्ड ने बदली भारत की रफ्तार
महिला हॉकी के स्वर्ण से पहले भारत को तीरंदाजी, बॉक्सिंग और कुश्ती में सफलता मिल चुकी थी। परवीन हुड्डा, लवलीना बोरगोहेन, अंकुश पंघाल, सुजीत कलकल और महिला रिकर्व टीम के स्वर्ण के बाद हॉकी ने दिन का छठा गोल्ड पूरा किया।
इसके अलावा सेलिंग में नेथ्रा कुमानन ने महिलाओं की डिंगी स्पर्धा में कांस्य पदक जीता, जबकि पुरुष सेपकटकरा टीम ने भी ब्रॉन्ज हासिल किया।
इन नतीजों के साथ भारत के कुल स्वर्ण पदकों की संख्या 16 तक पहुंची और वह पदक तालिका में पांचवें स्थान पर रहा।
अब असली चुनौती उपलब्धियों को निरंतरता में बदलने की
एक शानदार दिन किसी भी खेल अभियान को नई ऊर्जा दे सकता है, लेकिन बड़ी खेल प्रतियोगिताओं में स्थायी सफलता के लिए इन पदकों को दीर्घकालिक विकास से जोड़ना जरूरी होता है।
हॉकी में अब ओलिंपिक की तैयारी, बॉक्सिंग में इन चैंपियनों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रदर्शन, कुश्ती में नई प्रतिभाओं को तैयार करना और तीरंदाजी में टीम तथा व्यक्तिगत स्पर्धाओं की गहराई बढ़ाना भारत के अगले लक्ष्य होने चाहिए।



