गंभीर संकट! बड़े तालाब में फैला 8 हजार लीटर सोयाबीन ऑयल, जलीय जीवन पर मंडराया बड़ा खतरा
भोपाल का बड़ा तालाब सिर्फ पानी का एक विशाल जलाशय नहीं, बल्कि शहर के पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में कोहेफिजा क्षेत्र में टैंकर पलटने के बाद सड़क पर बहा सोयाबीन तेल नाले के रास्ते तालाब तक पहुंचना चिंता बढ़ाने वाली घटना है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक करीब 8 हजार लीटर सोयाबीन ऑयल बहा और इसका एक हिस्सा तालाब के किनारे लगभग डेढ़ एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैल गया है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि तेल पानी में घुलने के बजाय उसकी सतह पर एक परत बना रहा है। यही परत तालाब के उस हिस्से में प्राकृतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है, जहां पानी, हवा, सूर्य का प्रकाश और जलीय वनस्पतियां मिलकर एक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र बनाती हैं।
सड़क हादसे से तालाब तक पहुंचा प्रदूषण
वीआईपी रोड पर टैंकर पलटने के बाद तेल सड़क पर फैल गया। इसके बाद बहाव के साथ यह नाले तक पहुंचा और वहां से बड़े तालाब में प्रवेश कर गया।
यह घटनाक्रम शहरों में सड़क दुर्घटना और जल प्रदूषण के बीच मौजूद उस कड़ी को सामने लाता है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। किसी वाहन से निकला पदार्थ केवल दुर्घटना स्थल तक सीमित नहीं रहता। बारिश, नालों के बहाव और शहरी ड्रेनेज सिस्टम के जरिए वह आसपास के जलस्रोतों तक पहुंच सकता है।
बड़े तालाब के मामले में यही हुआ। अब चुनौती सिर्फ तेल हटाने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि प्रदूषण कितनी दूर तक पहुंचा और पानी के पारिस्थितिक तंत्र पर उसका कितना असर पड़ा है।
पानी की सतह पर बनी परत क्यों चिंता का कारण है?
तेल की मोटी परत पानी की सतह पर फैलने के बाद सूर्य के प्रकाश और वातावरण के बीच पानी का संपर्क प्रभावित कर सकती है। यदि यह परत पर्याप्त क्षेत्र में बनी रहती है, तो जलीय पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
प्रकाश संश्लेषण के जरिए जलीय पौधे पर्यावरणीय चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए किसी जलाशय की सतह पर बड़े पैमाने पर तेल का जमाव केवल दिखाई देने वाली गंदगी नहीं है, बल्कि पानी के भीतर चलने वाली जैविक प्रक्रियाओं के लिए भी जोखिम पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञ डॉ. शीतल शर्मा के अनुसार, तालाब के प्राकृतिक तंत्र में तेल का प्रवेश जलीय जीवन के लिए चिंताजनक है। उनके मुताबिक सतह पर बनी परत प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित कर सकती है और इससे पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिरने की स्थिति बन सकती है।
जलकुंभी पर जमी परत भी जांच का विषय
तेल का प्रभाव उस क्षेत्र में उगी जलकुंभी पर भी दिखाई दे रहा है। वनस्पतियों की सतह पर तेल जमने से उनकी सामान्य जैविक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, किसी बड़े जलाशय पर वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव केवल तस्वीर या सतह पर दिखाई देने वाली परत देखकर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए अलग-अलग स्थानों से पानी के नमूने लेकर वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी।
पानी में घुलित ऑक्सीजन, तेल और ग्रीस की मात्रा तथा अन्य जल गुणवत्ता मानकों की जांच से स्थिति की वास्तविक गंभीरता समझने में मदद मिल सकती है।
सीवेज ने बढ़ाई चिंता
जिस क्षेत्र में तेल तालाब तक पहुंचा है, वहां नाले का सीवेज और अन्य दूषित पदार्थ भी मौजूद हैं। तेल और सीवेज का एक साथ जलाशय में पहुंचना समस्या को और जटिल बना सकता है।
ऐसी स्थिति में दुर्गंध, पानी की गुणवत्ता में गिरावट और स्थानीय जलीय जीवों पर अतिरिक्त दबाव जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। लेकिन इन प्रभावों की पुष्टि वैज्ञानिक नमूनों और निगरानी के बाद ही की जा सकेगी।
अब सिर्फ सफाई नहीं, निगरानी भी जरूरी
इस घटना में सबसे जरूरी कदम तेल को पानी के दूसरे हिस्सों में फैलने से रोकना और प्रभावित क्षेत्र की प्रभावी सफाई है। इसके साथ पानी की गुणवत्ता की लगातार निगरानी भी जरूरी होगी।
क्योंकि तेल को केवल सतह से हटा देना समस्या का अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। सफाई के बाद यह देखना भी जरूरी है कि पानी की गुणवत्ता सामान्य स्तर पर लौट रही है या नहीं और जलीय वनस्पतियों तथा जीवों पर कोई दीर्घकालिक प्रभाव तो नहीं पड़ा।
बड़े तालाब जैसे शहरी जलस्रोतों के लिए यह घटना एक व्यापक सबक भी है। शहर का ड्रेनेज सिस्टम यदि सीधे प्राकृतिक जलस्रोतों से जुड़ा है, तो सड़क दुर्घटना से लेकर औद्योगिक या व्यावसायिक प्रदूषण तक कोई भी घटना कुछ ही समय में पर्यावरणीय समस्या बन सकती है।



