कैंसर का बड़ा खुलासा: भारत में 1.9 लाख मामले संक्रमण से जुड़े, बचाव के रास्ते भी मौजूद
कैंसर को आमतौर पर जीवनशैली, तंबाकू, शराब, प्रदूषण और आनुवंशिक कारणों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन नई वैश्विक रिसर्च ने इसकी तस्वीर का एक ऐसा हिस्सा सामने रखा है, जो भारत जैसे बड़े देश के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। द लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित IARC की नई स्टडी के मुताबिक, 2024 में भारत में अनुमानित करीब 15.6 लाख नए कैंसर मामलों में लगभग 1.9 लाख मामले ऐसे थे, जिन्हें कैंसर पैदा करने वाले संक्रमणों से जोड़ा गया।
इस आंकड़े की अहमियत केवल इसलिए नहीं है कि संख्या बड़ी है। असली बात यह है कि संक्रमण से जुड़े कैंसर के कुछ प्रमुख कारणों को वैक्सीनेशन, संक्रमण की पहचान, स्क्रीनिंग और उचित उपचार के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है। यानी कैंसर की रोकथाम की रणनीति केवल अस्पतालों और महंगे इलाज तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि संक्रमण रोकने की शुरुआत से ही होनी चाहिए।
भारत में HPV सबसे महत्वपूर्ण कड़ी
भारत के संक्रमण-संबंधित कैंसर के आंकड़ों में HPV यानी ह्यूमन पैपिलोमावायरस विशेष महत्व रखता है। इसका सबसे मजबूत संबंध सर्वाइकल कैंसर से है। IARC के अनुसार, लगातार बने रहने वाला हाई-रिस्क HPV संक्रमण सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण है और इसके खिलाफ वैक्सीन उपलब्ध है। स्क्रीनिंग से गर्भाशय ग्रीवा में होने वाले प्रीकैंसरस बदलावों की पहचान भी शुरुआती चरण में की जा सकती है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—HPV संक्रमण होना और कैंसर होना एक ही बात नहीं है। अधिकांश HPV संक्रमण अपने आप खत्म हो जाते हैं। समस्या तब बढ़ती है जब हाई-रिस्क संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है और कोशिकाओं में ऐसे बदलाव पैदा करता है, जो आगे चलकर कैंसर का रूप ले सकते हैं।
इसलिए HPV के मामले में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का जोर केवल बीमारी के इलाज पर नहीं, बल्कि संक्रमण से पहले सुरक्षा और समय पर स्क्रीनिंग पर होना अधिक प्रभावी हो सकता है।
H. pylori: पेट के कैंसर से जुड़ी अनदेखी कड़ी
दूसरा बड़ा नाम है Helicobacter pylori यानी H. pylori। यह बैक्टीरिया पेट में लंबे समय तक संक्रमण पैदा कर सकता है और पेट के कैंसर के विकास से इसका वैज्ञानिक संबंध स्थापित है। IARC इसे दुनिया में गैस्ट्रिक कैंसर का सबसे महत्वपूर्ण कारण बताता है।
भारत में स्टडी के मुताबिक H. pylori से जुड़े कैंसर मामलों की संख्या भी हजारों में है। इसका मतलब यह है कि पेट से जुड़ी लगातार रहने वाली संक्रमण संबंधी समस्या को केवल सामान्य गैस्ट्रिक परेशानी मानकर छोड़ देना हर स्थिति में उचित नहीं है।
हालांकि, हर व्यक्ति को बिना चिकित्सकीय सलाह के H. pylori की जांच या एंटीबायोटिक उपचार शुरू नहीं करना चाहिए। किस व्यक्ति की जांच और इलाज जरूरी है, यह उसकी उम्र, लक्षण, जोखिम और चिकित्सकीय स्थिति पर निर्भर करता है।
हेपेटाइटिस वायरस भी कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं
हेपेटाइटिस-B और हेपेटाइटिस-C वायरस का संबंध लिवर कैंसर से है। लंबे समय तक रहने वाला वायरल संक्रमण लिवर में लगातार नुकसान और सूजन पैदा कर सकता है, जिससे वर्षों में कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। IARC संक्रमण और कैंसर की रोकथाम के लिए HBV के खिलाफ वैक्सीनेशन तथा HBV/HCV की जांच और उपयुक्त उपचार को महत्वपूर्ण उपायों में गिनता है।
यही वजह है कि हेपेटाइटिस की रोकथाम को केवल संक्रमण नियंत्रण की समस्या नहीं, बल्कि लंबे समय की कैंसर-प्रिवेंशन रणनीति के हिस्से के रूप में देखना जरूरी है।
EBV सहित कई संक्रमणों की भूमिका
स्टडी में Epstein–Barr virus यानी EBV को भी संक्रमण से संबंधित कैंसर के कारणों में शामिल किया गया है। IARC के अनुसार EBV के साथ कुछ लिम्फोमा और नासोफैरिंजियल कैंसर सहित कई कैंसर के संबंध स्थापित हैं। संक्रमण और कैंसर का संबंध हर वायरस या बैक्टीरिया में अलग तरीके से काम करता है, इसलिए सभी संक्रमणों के लिए एक जैसी रोकथाम रणनीति लागू नहीं की जा सकती।
यही बिंदु इस रिसर्च को महज आंकड़ों की खबर से आगे ले जाता है। अलग-अलग संक्रमणों के लिए अलग-अलग वैक्सीन, स्क्रीनिंग और उपचार नीति की जरूरत होती है।
दुनिया में हर आठवां कैंसर संक्रमण से जुड़ा
IARC की नई वैश्विक स्टडी के मुताबिक, 2024 में दुनिया भर में करीब 23 लाख नए कैंसर मामले संक्रमणों के कारण होने का अनुमान लगाया गया, जो कुल नए कैंसर मामलों का लगभग 12 प्रतिशत है। अध्ययन में कई कैंसरकारी संक्रमणों और उनसे संबंधित कैंसरों को शामिल किया गया है।
इस वैश्विक तस्वीर में H. pylori, HPV, हेपेटाइटिस-B, EBV और हेपेटाइटिस-C प्रमुख योगदानकर्ताओं में शामिल रहे। संक्रमण से जुड़े कैंसर का बोझ निम्न और मध्यम आय वाले देशों में disproportionately अधिक है, जिससे स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और रोकथाम की असमानता का मुद्दा भी सामने आता है।
असली चुनौती इलाज से पहले रोकथाम की है
भारत के लिए इस स्टडी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि कैंसर नियंत्रण की रणनीति को केवल कैंसर अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं किया जा सकता।
अगर किसी कैंसर का जोखिम संक्रमण से जुड़ा है, तो उसके खिलाफ लड़ाई कई साल पहले शुरू की जा सकती है—वैक्सीनेशन से, संक्रमण की पहचान से, स्क्रीनिंग से और समय पर उपचार से।
IARC भी संक्रमण से संबंधित कैंसर की रोकथाम में HPV और हेपेटाइटिस-B के खिलाफ टीकाकरण तथा H. pylori और हेपेटाइटिस-C जैसे संक्रमणों की पहचान और उपचार को महत्वपूर्ण मानता है।
भारत के लिए आगे की चुनौती यह होगी कि इन उपायों को केवल बड़े शहरों और निजी स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित न रखा जाए। ग्रामीण और कम-संसाधन वाले क्षेत्रों में जागरूकता, स्क्रीनिंग, वैक्सीनेशन और प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होगी, तभी रिसर्च में सामने आए इस संभावित रोकथाम अवसर का वास्तविक फायदा आबादी तक पहुंच पाएगा।
आगे क्या?
कैंसर के हर मामले को संक्रमण से नहीं जोड़ा जा सकता और किसी संक्रमण की मौजूदगी का मतलब यह भी नहीं कि व्यक्ति को निश्चित रूप से कैंसर होगा। लेकिन वैज्ञानिक रूप से स्थापित संक्रमण-कैंसर संबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर देते हैं।



