सरकारी विज्ञापनों पर बड़ा खर्च, RTI ने खोला पूरा राज; GST बचत उत्सव के प्रचार पर ₹27.1 करोड़
नई दिल्ली। सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाना किसी भी कल्याणकारी कार्यक्रम की सफलता का अहम हिस्सा है। लेकिन इस सूचना को जनता तक पहुंचाने में सरकारी खजाने से कितना पैसा खर्च हो रहा है, यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब RTI से सामने आए आंकड़ों ने इस खर्च की तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है।
वित्त वर्ष 2023-24 से 2025-26 के दौरान 10 प्रमुख सरकारी योजनाओं और पहलों के प्रचार-प्रसार पर कुल ₹54.5 करोड़ खर्च किए गए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा GST बचत उत्सव के प्रचार पर गया, जिस पर करीब ₹27.1 करोड़ खर्च हुए। यानी इन 10 पहलों के कुल विज्ञापन खर्च का लगभग आधा हिस्सा अकेले इसी अभियान को मिला।
यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए पारंपरिक मीडिया के साथ डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल भी लगातार बढ़ रहा है। इसलिए यह सिर्फ विज्ञापन बजट का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह भी बताता है कि सरकार अलग-अलग पहलों के लिए किस तरह के संचार माध्यमों को प्राथमिकता दे रही है।
सबसे ज्यादा खर्च GST बचत उत्सव पर
इन 10 योजनाओं में GST बचत उत्सव विज्ञापन खर्च के मामले में सबसे आगे रहा। सितंबर से दिसंबर 2025 के बीच चलाए गए इस 100-दिवसीय अभियान के लिए ₹27.1 करोड़ आवंटित किए गए थे। इसका उद्देश्य GST दरों में किए गए बदलावों और उनसे जुड़ी संभावित बचत की जानकारी लोगों तक पहुंचाना था।
सरकारी संचार में ऐसे अभियान तब महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब किसी नीति या कर व्यवस्था में बदलाव का असर सीधे आम उपभोक्ता और कारोबार पर पड़ता हो। GST बचत उत्सव के मामले में भी सरकार ने इसे उपभोक्ताओं और कारोबारियों तक सुधारों की जानकारी पहुंचाने के अभियान के रूप में प्रस्तुत किया था।
PM Internship और PM Vishwakarma पर भी करोड़ों
विज्ञापन खर्च के मामले में PM Internship Scheme दूसरे स्थान पर रही। इस योजना के प्रचार पर अक्टूबर 2024 से मार्च 2026 के बीच करीब ₹12.6 करोड़ खर्च किए गए। इसके बाद PM Vishwakarma Scheme पर सितंबर 2023 से मार्च 2026 के बीच करीब ₹7.4 करोड़ खर्च हुए।
दोनों योजनाओं का लक्षित वर्ग अलग है। PM Internship Scheme का उद्देश्य युवाओं को कंपनियों में व्यावहारिक अनुभव देने और रोजगार योग्य कौशल से जोड़ना है। सरकार ने इसे पांच वर्षों में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप अवसर देने की महत्वाकांक्षी पहल के रूप में शुरू किया था।
वहीं PM Vishwakarma पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को कौशल प्रशिक्षण, टूलकिट, ऋण सहायता और बाजार से जोड़ने जैसी सुविधाएं देने पर केंद्रित है। सितंबर 2026 तक सरकार के अनुसार इस योजना का 30 लाख लाभार्थियों के पंजीकरण का लक्ष्य हासिल हो चुका था।
सरकारी विज्ञापन का पैसा कहां जाता है?
सरकारी प्रचार सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और आउटडोर मीडिया जैसे माध्यम शामिल हैं।
कुल ₹54.5 करोड़ के खर्च में प्रिंट मीडिया की हिस्सेदारी 58.8 प्रतिशत रही। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 19.5 प्रतिशत, डिजिटल मीडिया को 14.6 प्रतिशत और आउटडोर विज्ञापनों को 7.2 प्रतिशत हिस्सा मिला।
यह वितरण एक दिलचस्प तस्वीर पेश करता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़ने के बावजूद सरकारी अभियानों में प्रिंट मीडिया की भूमिका अभी भी काफी बड़ी है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि सरकारी योजनाओं का संचार केवल युवा या इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली आबादी तक सीमित नहीं होता। ग्रामीण क्षेत्रों, वरिष्ठ नागरिकों और कम डिजिटल पहुंच वाले लोगों तक जानकारी पहुंचाने के लिए पारंपरिक माध्यम अब भी उपयोगी हैं।
क्या विज्ञापन खर्च को सिर्फ खर्च मानना सही होगा?
सरकारी योजना का विज्ञापन अपने आप में केवल प्रचार नहीं होता। अगर किसी पात्र व्यक्ति को किसी योजना की जानकारी ही नहीं मिले, तो योजना के लिए तय बजट और सुविधाएं होने के बावजूद उसका लाभ सीमित रह सकता है। इस लिहाज से सूचना प्रसार पर खर्च को योजना की पहुंच का एक हिस्सा माना जा सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ, विज्ञापन पर खर्च की उपयोगिता को सिर्फ रकम से नहीं, परिणाम से भी देखना जरूरी है। कितने लोगों तक सूचना पहुंची, कितने पात्र लोगों ने आवेदन किया, कितने लाभार्थियों को वास्तविक लाभ मिला और प्रचार के बाद योजना की पहुंच में कितना बदलाव आया—ऐसे सवाल किसी भी बड़े सार्वजनिक संचार अभियान की प्रभावशीलता समझने में ज्यादा मदद करते हैं।
यही वजह है कि भविष्य में सरकारी विज्ञापन खर्च के साथ आउटपुट और आउटकम के आंकड़े सार्वजनिक होने से तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
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आगे बदल सकता है सरकारी प्रचार का तरीका
मीडिया की आदतें बदल रही हैं। टीवी और अखबार के साथ सोशल मीडिया, वेबसाइट, मोबाइल एप और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म सरकारी सूचना के महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। इसके बावजूद मौजूदा आंकड़ों में प्रिंट मीडिया की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही है।



