झूठी शिकायतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, थाने-अदालतों से नगर निगम तक लगेंगे चेतावनी बोर्ड? जानिए क्या है पूरा मामला
नई दिल्ली। किसी सरकारी दफ्तर में शिकायत दर्ज कराना नागरिक का महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन अगर शिकायत में जानबूझकर गलत तथ्य, झूठे आरोप या फर्जी सबूत दिए जाएं तो उसका असर केवल शिकायत तक सीमित नहीं रहता। किसी निर्दोष व्यक्ति को जांच, मुकदमे और सामाजिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इसी सवाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने एक जनहित याचिका पहुंची है, जिसमें पुलिस थानों, अदालत परिसरों और नगर निगम जैसे सरकारी संस्थानों में झूठी शिकायत के कानूनी परिणामों की जानकारी देने वाले बोर्ड लगाने की मांग की गई है।
24 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई। पीठ में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं।
याचिका में आखिर क्या मांग की गई है?
अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को सरकारी संस्थानों में ऐसे सूचना बोर्ड लगाने का निर्देश देने की मांग की गई है, जिनमें झूठी शिकायत, झूठे आरोप, गलत जानकारी, झूठे बयान और झूठे साक्ष्य देने के संभावित कानूनी परिणाम स्पष्ट रूप से बताए जाएं।
याचिका का तर्क है कि शिकायतकर्ता को शिकायत दर्ज कराने से पहले ही यह जानकारी होनी चाहिए कि जानबूझकर गलत सूचना देने पर कानून में परिणाम हो सकते हैं। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने शिकायत स्वीकार करने से पहले शिकायतकर्ता से एक घोषणा या हलफनामा लेने की मांग भी की है कि उसके द्वारा दी गई जानकारी सही है।
इस प्रस्ताव का दूसरा पहलू महत्वपूर्ण है—शिकायत करने के अधिकार को कमजोर किए बिना जिम्मेदारी के साथ शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था कैसे बनाई जाए।
शिकायत और झूठी शिकायत में अंतर समझना जरूरी
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक फर्क यही है कि हर असफल शिकायत झूठी शिकायत नहीं होती।
किसी व्यक्ति की शिकायत जांच में सही साबित न हो, पर्याप्त सबूत न मिलें या आरोपी अदालत से बरी हो जाए, तो मात्र इस आधार पर शिकायतकर्ता को झूठा नहीं कहा जा सकता। जानबूझकर गलत तथ्य या मनगढ़ंत सामग्री के साथ किसी को फंसाने की कोशिश एक अलग स्थिति है।
यही वजह है कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर कोई व्यापक दिशा-निर्देश देता है तो उसकी भाषा और प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। ऐसी व्यवस्था बनाते समय यह संतुलन जरूरी होगा कि फर्जी मामलों पर रोक लगे, लेकिन वास्तविक शिकायत करने वाले लोग संभावित कार्रवाई के डर से अपनी बात रखने से पीछे न हटें।
याचिका में NCRB के आंकड़ों का भी हवाला
याचिका में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि कुछ विशेष आपराधिक कानूनों के तहत दर्ज मामलों और दोषसिद्धि के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। याचिकाकर्ता ने इसे झूठी शिकायतों और मनगढ़ंत साक्ष्यों की संभावित संरचनात्मक समस्या से जोड़ा है।
हालांकि, कम दोषसिद्धि दर को अपने आप झूठी FIR या झूठी शिकायतों का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। किसी मामले में आरोपी के बरी होने के पीछे जांच की गुणवत्ता, सबूतों की कमी, गवाहों के मुकरने, कानूनी मानकों पर आरोप साबित न होने और कई अन्य कारण हो सकते हैं।
इसलिए इस याचिका पर सुनवाई के दौरान यही सवाल अहम रहेगा कि झूठी शिकायत की पहचान किस स्पष्ट और न्यायसंगत प्रक्रिया से की जाए।
थानों में बोर्ड लगाने से क्या बदलेगा?
अगर अदालत ऐसी व्यवस्था पर विचार करती है तो इसका सबसे सीधा असर पुलिस थानों और अन्य सरकारी कार्यालयों में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
एक स्पष्ट सूचना बोर्ड नागरिक को यह समझा सकता है कि शिकायत दर्ज करना अधिकार है, लेकिन उसमें जानबूझकर गलत जानकारी देना अलग कानूनी स्थिति पैदा कर सकता है। इससे शिकायतकर्ता को प्रक्रिया और जिम्मेदारी दोनों की जानकारी मिल सकती है।
लेकिन केवल बोर्ड लगा देना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती यह होगी कि शिकायतों की जांच निष्पक्ष तरीके से हो और किसी व्यक्ति को केवल इसलिए परेशान न किया जाए क्योंकि उसकी शिकायत प्रारंभिक जांच में साबित नहीं हुई।
निर्दोष व्यक्ति की सुरक्षा भी याचिका का अहम पहलू
याचिका में यह तर्क भी दिया गया है कि झूठे आरोपों और मनगढ़ंत मामलों से निर्दोष नागरिकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक आरोप लगने के बाद उसे जांच, अदालत की प्रक्रिया, आर्थिक खर्च और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
यही कारण है कि शिकायत व्यवस्था में दो चीजों का संतुलन जरूरी है—पीड़ित को शिकायत का आसान रास्ता मिले और निर्दोष व्यक्ति को जानबूझकर झूठे मुकदमे में फंसाने से सुरक्षा मिले।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी आपराधिक प्रक्रिया में वैकल्पिक कानूनी उपायों और उचित प्रक्रिया पर जोर देता रहा है। अप्रैल 2026 के एक फैसले में अदालत ने FIR दर्ज न होने की शिकायत के लिए उपलब्ध वैधानिक रास्तों का उल्लेख करते हुए कहा था कि ऐसे मामलों में संबंधित कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
अब अगले सप्ताह की सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण है?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। 10 सितंबर 2026 के आदेश में अदालत ने केंद्र और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था और मामले को 6 नवंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया था।
24 सितंबर को हुई कार्यवाही में याचिका को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति की खबर सामने आई है।



