दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाना ही सेवा का उद्देश्य है– उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा
कवर्धा। किसी दिव्यांग व्यक्ति के लिए कृत्रिम हाथ या पैर सिर्फ एक सहायक उपकरण नहीं होता। कई मामलों में यह रोजमर्रा के उन कामों को दोबारा करने का माध्यम बनता है, जिनके लिए लंबे समय से किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़ता था। कवर्धा में चल रहा चार दिवसीय दिव्यांग उपकरण वितरण शिविर इसी बदलाव को केंद्र में रखकर आयोजित किया गया है।
पीजी कॉलेज डोम, कवर्धा में 23 से 26 सितंबर तक चल रहे इस शिविर का शुभारंभ छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने किया। भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति जयपुर, सकल जैन समाज, भारतीय जैन संगठन और जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित शिविर में करीब एक हजार दिव्यांगजनों का पंजीयन होने की जानकारी दी गई है।
मशीन और उपकरण से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका इस्तेमाल
शिविर में कृत्रिम हाथ-पैर, कैलिपर्स, ट्राइसाइकिल और जरूरत के अनुसार दूसरे सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। खास बात यह है कि राजस्थान से आई विशेषज्ञ टीम मौके पर ही जरूरत के मुताबिक कृत्रिम अंग तैयार कर रही है। इसके बाद उनकी फिटिंग और परीक्षण भी किया जा रहा है।
इस व्यवस्था का सीधा फायदा यह है कि लाभार्थी को केवल तैयार उपकरण थमाने के बजाय उसकी शारीरिक जरूरत के अनुरूप फिटिंग पर ध्यान दिया जा रहा है। कृत्रिम अंग की उपयोगिता काफी हद तक इसी बात पर निर्भर करती है कि वह व्यक्ति के शरीर और दैनिक गतिविधियों के अनुकूल कितना है।
शिविर में एक हितग्राही द्वारा कृत्रिम पैर की सहायता से बाइक चलाने और दूसरे व्यक्ति द्वारा कृत्रिम हाथ से पानी का गिलास उठाने का प्रदर्शन इसी बदलाव को सामने लाता है। ऐसे छोटे दिखने वाले काम किसी व्यक्ति के लिए आत्मनिर्भरता की बड़ी वापसी हो सकते हैं।
एक गिलास पानी ने बताया कि बदलाव कितना बड़ा है
उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने शिविर के दौरान एक ऐसे दिव्यांगजन का उदाहरण साझा किया, जिसके दोनों हाथ बिजली के तार की चपेट में आने के बाद चले गए थे। कृत्रिम हाथ मिलने के बाद उसने पहली बार अपने हाथ से पानी का गिलास उठाया।
यह घटना इस बात की ओर ध्यान खींचती है कि दिव्यांगजनों के पुनर्वास को केवल उपकरण वितरण के आंकड़ों से नहीं देखा जा सकता। किसी व्यक्ति के लिए खुद खाना खाना, पानी पीना, चलना, काम पर जाना या परिवार की जिम्मेदारियों में हिस्सा लेना—इनमें से प्रत्येक गतिविधि उसकी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान से जुड़ी होती है।
विजय शर्मा ने शिविर को सेवा का उदाहरण बताते हुए जैन समाज और सहयोगी संस्थाओं के योगदान की सराहना की। उनके अनुसार, उपकरणों की कीमत से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनके मिलने के बाद व्यक्ति के जीवन में कितना व्यावहारिक बदलाव आता है।
अब बस्तर के प्रभावित लोगों तक पहुंचाने की तैयारी
शिविर की एक महत्वपूर्ण कड़ी बस्तर से भी जुड़ती है। उप मुख्यमंत्री के अनुसार जगदलपुर और दंतेवाड़ा में भी इसी तरह के शिविर आयोजित किए जाएंगे। बस्तर में IED विस्फोटों के कारण दिव्यांग हुए लोगों की पहचान कर उन्हें कृत्रिम हाथ-पैर उपलब्ध कराने की योजना पर काम किए जाने की बात कही गई है।
अंदरूनी क्षेत्रों तक ऐसे लोगों की पहचान और उन्हें उपचार या पुनर्वास सेवाओं तक पहुंचाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण काम है। इसलिए ग्राम पंचायत स्तर से जानकारी जुटाने की व्यवस्था का उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को चिन्हित करके शिविरों तक पहुंचाना बताया गया है।
यदि यह प्रक्रिया नियमित रूप से आगे बढ़ती है तो इसका असर केवल उपकरण वितरण तक सीमित नहीं रहेगा। दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले ऐसे लोगों को पुनर्वास सेवाओं से जोड़ना उनके सामाजिक और आर्थिक पुनर्स्थापन की दिशा में भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
असली लक्ष्य उपकरण नहीं, रोजगार और स्वावलंबन
दिव्यांगजनों के लिए सहायक उपकरण उपलब्ध कराना पुनर्वास की शुरुआत है, अंतिम चरण नहीं। दिव्यांगजन वित्त एवं विकास निगम के अध्यक्ष लोकेश कावड़िया ने भी इसी व्यापक जरूरत पर जोर दिया। उनके अनुसार दिव्यांगजनों को कौशल प्रशिक्षण, स्वरोजगार और रोजगार के अवसरों से जोड़ना जरूरी है।
रायपुर में दिव्यांगजनों के लिए प्रस्तावित कौशल विकास केंद्र में विभिन्न ट्रेड के साथ डिजिटल मार्केटिंग और वित्तीय प्रबंधन जैसे प्रशिक्षण देने की जानकारी दी गई है। स्वरोजगार के लिए कम ब्याज दर पर ऋण और पात्र हितग्राहियों को ऋण पर अनुदान की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया है।
यहीं से ऐसे शिविरों की अगली चुनौती सामने आती है। यदि कृत्रिम अंग पाने वाला व्यक्ति प्रशिक्षण, रोजगार, स्वरोजगार या शिक्षा के अवसरों से भी जुड़ता है, तो उपकरण का असर लंबे समय तक बना रह सकता है। इसलिए भविष्य में उपकरण + प्रशिक्षण + रोजगार + वित्तीय सहायता को एक साथ जोड़ना दिव्यांगजन पुनर्वास को अधिक प्रभावी बना सकता है।
26 सितंबर तक मिलेगा उपकरणों का लाभ
कवर्धा का यह शिविर 23 से 26 सितंबर तक चलेगा। अलग-अलग जरूरतों वाले दिव्यांगजनों के लिए कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण तैयार करने, उनका परीक्षण करने तथा फिटिंग की प्रक्रिया शिविर में ही की जा रही है।



