स्टेट बार काउंसिल में 30% महिला प्रतिनिधित्व पर नया विवाद, CJI सूर्यकांत ने कहा- वापस लेना पड़े तो विचार करेंगे
नई दिल्ली, 22 सितंबर 2026। स्टेट बार काउंसिल में महिलाओं के लिए 30% प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लेकर मंगलवार को अदालत में तीखी बहस देखने को मिली। कुछ महिला वकीलों के विरोध और इस व्यवस्था को असंवैधानिक तथा अलोकतांत्रिक बताए जाने की बात सामने आने के बाद मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि यदि संबंधित महिला वकील स्वयं इस व्यवस्था का विरोध कर रही हैं तो अदालत को अपने 30% प्रतिनिधित्व वाले आदेश को वापस लेने पर विचार करना चाहिए।
यह टिप्पणी उस समय आई है जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही बार काउंसिल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक विस्तृत व्यवस्था तैयार कर चुका है। इसलिए मंगलवार की सुनवाई का महत्व सिर्फ एक विरोध-प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में अदालत के निर्देश, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की संस्थागत स्वायत्तता और महिला प्रतिनिधित्व के तरीके से जुड़े सवाल हैं।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में निर्देश दिया था कि प्रत्येक स्टेट बार काउंसिल में महिलाओं को कुल सीटों का 30% प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसमें 20% प्रतिनिधित्व चुनाव के जरिए और 10% को-ऑप्शन के जरिए सुनिश्चित करने की व्यवस्था रखी गई थी।
बाद में 4 अगस्त 2026 के आदेश में को-ऑप्शन के लिए दो महिला सदस्यों को चुनने की व्यवस्था तय की गई। इनमें संबंधित हाईकोर्ट की पूर्व महिला न्यायाधीश अथवा संबंधित राज्य/केंद्रशासित प्रदेश से जुड़ी प्रतिष्ठित और वरिष्ठ महिला वकीलों को शामिल करने का प्रावधान रखा गया। 9 सितंबर के आदेश में इस व्यवस्था से जुड़े कई सवालों पर अदालत ने स्पष्टीकरण भी दिया।
यही प्रक्रिया अब विरोध का विषय बन गई है।
महिला वकीलों की आपत्ति सिर्फ आरक्षण पर नहीं
मंगलवार की कार्यवाही से यह संकेत मिलता है कि विरोध करने वाले पक्ष की चिंता केवल 30% प्रतिनिधित्व के विचार को लेकर नहीं है। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि बार काउंसिल जैसे वैधानिक पेशेवर निकाय की संरचना और चुनावी प्रक्रिया में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार किस संस्थान के पास होना चाहिए।
अदालत में जिस पत्र का उल्लेख किया गया, उसमें BCI की स्वायत्तता को लेकर चिंता जताए जाने की बात सामने आई। यानी विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू representation बनाम institutional autonomy का है।
यही कारण है कि पूरे मामले को केवल ‘महिला आरक्षण के पक्ष या विपक्ष’ के रूप में देखना अधूरा होगा। एक तरफ महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रश्न है, तो दूसरी तरफ यह संवैधानिक और संस्थागत सवाल भी है कि ऐसी व्यवस्था लागू करने का तरीका क्या होना चाहिए।
अदालत में अवमानना को लेकर भी हुई चर्चा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने विरोध-प्रदर्शन के एक फ्लायर में अदालत के आदेश को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बताए जाने का उल्लेख किया और इसे अदालत की अवमानना से जोड़ने की बात कही।
हालांकि, पीठ की ओर से यह भी कहा गया कि अदालत के फैसलों और न्यायाधीशों की आलोचना को लेकर व्यापक कानूनी सिद्धांत मौजूद हैं। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस संदर्भ में न्यायिक आलोचना की सीमाओं पर चर्चा की और लॉर्ड डेनिंग का भी उल्लेख किया।
यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायिक आदेशों की आलोचना और न्यायालय की अवमानना के बीच एक कानूनी सीमा मौजूद है। किसी फैसले से असहमति होना अपने आप में अवमानना नहीं माना जा सकता; सवाल आलोचना की प्रकृति और उसके संदर्भ का होता है।
अब आगे क्या होगा?
मंगलवार की सुनवाई में एक लंबित इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन (IA) को सूचीबद्ध करने का निर्देश भी दिया गया। इस आवेदन को 30% महिला प्रतिनिधित्व और BCI के गठन से जुड़ी आगे की प्रक्रिया के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया गया।
इससे संकेत मिलता है कि मामला अभी अंतिम रूप से समाप्त नहीं हुआ है। आने वाली सुनवाई में अदालत के सामने यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि 30% प्रतिनिधित्व को लागू करने की व्यावहारिक प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ेगी और BCI तथा स्टेट बार काउंसिल की भूमिका किस सीमा तक रहेगी।
सितंबर की पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि को-ऑप्शन के लिए ‘वरिष्ठ महिला वकील’ होना जरूरी नहीं कि ‘सीनियर एडवोकेट’ के रूप में औपचारिक designation का अर्थ रखता हो। अदालत ने पूर्व महिला हाईकोर्ट न्यायाधीशों की पात्रता से जुड़े सवाल पर भी स्पष्टीकरण दिया था।
असली चुनौती प्रतिनिधित्व लागू करने की प्रक्रिया है
बार काउंसिल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बहस अब एक व्यापक संस्थागत सवाल में बदल गई है। प्रतिनिधित्व का प्रतिशत तय कर देना एक कदम है, लेकिन उसके बाद यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो, योग्य उम्मीदवारों को वास्तविक अवसर मिले और संबंधित वैधानिक संस्थाओं की भूमिका स्पष्ट रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेशों में महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के उद्देश्य को सामने रखा है, जबकि BCI की स्वायत्तता से जुड़ी आपत्तियां यह बताती हैं कि इस लक्ष्य को लागू करने के तरीके पर अभी सहमति पूरी तरह नहीं बनी है।



