रॉ कैसे बनी, एजेंटों का चयन कैसे बदला और खुफिया काम में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
नई दिल्ली। किसी देश की सुरक्षा व्यवस्था में खुफिया एजेंसियों की भूमिका अक्सर उन घटनाओं से समझ आती है जिनके बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम जानकारी उपलब्ध होती है। भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) भी इसी तरह की संस्था है, जिसके काम का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक रिकॉर्ड से बाहर रहता है।
21 सितंबर 1968 को स्थापित हुई रॉ का जन्म ऐसे दौर में हुआ था जब भारत को यह महसूस हुआ कि विदेशों से जुड़ी रणनीतिक जानकारी जुटाने के लिए एक अलग और विशेषीकृत व्यवस्था की जरूरत है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के एक आधिकारिक प्रकाशन में भी आर.एन. काव के योगदान को विशेष रूप से बाहरी खुफिया से जोड़ा गया है।
रॉ की कहानी केवल जासूसी अभियानों की कहानी नहीं है। इसके पीछे असल सवाल यह है कि बदलती सुरक्षा चुनौतियों के साथ एक खुफिया संगठन अपने लोगों को कैसे चुनता है, उन्हें किस तरह तैयार करता है और किस तरह ऐसी परिस्थितियों में काम करता है जहां पहचान छिपाना ही नौकरी का हिस्सा बन जाता है।
1965 के युद्ध के बाद क्यों महसूस हुई नई एजेंसी की जरूरत?
रॉ के गठन की पृष्ठभूमि को समझने के लिए 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को महत्वपूर्ण मोड़ के तौर पर देखा जाता है।
युद्ध के दौरान भारत के पास पाकिस्तान की सैन्य स्थिति से संबंधित हर जरूरी जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं थी। पूर्व रॉ प्रमुख शंकरन नायर ने अपनी पुस्तक Inside IB and RAW में उस दौर से जुड़े अधिकारियों के आकलन का उल्लेख किया है कि पर्याप्त और सटीक बाहरी खुफिया जानकारी की कमी सैन्य निर्णयों के लिए समस्या बनी थी।
इसी अनुभव से एक संस्थागत सवाल सामने आया—क्या घरेलू सुरक्षा पर केंद्रित एजेंसी से विदेशों में रणनीतिक खुफिया जानकारी जुटाने की वही जिम्मेदारी निभाई जानी चाहिए, या इसके लिए अलग विशेषज्ञ संस्था होनी चाहिए?
1968 में दूसरा रास्ता चुना गया।
21 सितंबर 1968 को बनी रॉ
रिसर्च एंड एनालिसिस विंग की स्थापना 21 सितंबर 1968 को हुई और आर.एन. काव इसके पहले प्रमुख बने। शुरुआत में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों और कर्मचारियों का एक हिस्सा नई संस्था में स्थानांतरित किया गया।
इस बदलाव का मूल उद्देश्य विदेशों से संबंधित खुफिया जानकारी को अधिक विशेषीकृत ढंग से जुटाना था। यानी रॉ की स्थापना महज एक नई सरकारी संस्था बनाने की कवायद नहीं थी, बल्कि खुफिया काम को अलग-अलग विशेषज्ञताओं में बांटने की दिशा में एक संस्थागत बदलाव था।
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेज में भी काव को ऐसी संस्था बनाने वाले अधिकारी के रूप में याद किया गया है जिसने बाहरी खुफिया के क्षेत्र में एक अलग संगठन खड़ा किया।
शुरुआती दौर में भर्ती का तरीका कैसा था?
रॉ की शुरुआती भर्ती व्यवस्था समय के साथ बदलती रही। उपलब्ध संस्मरणों और पूर्व अधिकारियों के विवरणों के मुताबिक 1971 के बाद सीधे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से प्रतिभाशाली लोगों को लेने का प्रयोग किया गया।
लेकिन यह मॉडल लंबे समय तक उसी रूप में नहीं चला। 1970 के दशक में चयन प्रक्रिया अधिक प्रतिस्पर्धी और बहु-स्तरीय होने लगी।
पूर्व अधिकारी जयदेव रानाडे ने अपने चयन के अनुभव का वर्णन करते हुए बताया है कि उम्मीदवारों को मनोवैज्ञानिक परीक्षण, अलग-अलग स्तर के इंटरव्यू और वरिष्ठ अधिकारियों वाली चयन समिति की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—खुफिया सेवा के लिए केवल सामान्य शैक्षणिक योग्यता पर्याप्त नहीं मानी जाती थी। उम्मीदवार के व्यवहार, मानसिक क्षमता, परिस्थितियों को समझने की क्षमता और दबाव में निर्णय लेने जैसी खूबियों को भी परखा जाता था।
समय के साथ भर्ती व्यवस्था में क्या बदला?
बाद के दशकों में रॉ के लिए अधिकारियों की भर्ती में सिविल सेवाओं, खासकर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की भूमिका बढ़ी। पूर्व रॉ अधिकारियों ने इस मॉडल के फायदे और सीमाओं दोनों पर चर्चा की है।
पूर्व रॉ प्रमुख विक्रम सूद ने अपनी पुस्तक The Unending Game में तर्क दिया है कि पुलिस सेवा से अपेक्षाकृत बाद की उम्र में आने वाले अधिकारियों के लिए पूरी तरह अलग पेशे की कार्यशैली अपनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
उनके अनुसार आधुनिक खुफिया काम केवल पारंपरिक सुरक्षा कौशल तक सीमित नहीं है। भाषा, आर्थिक गतिविधियों की समझ, साइबर तकनीक, विज्ञान, रणनीतिक अध्ययन और मानवीय संपर्कों से जानकारी हासिल करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती जा रही है।
यही बदलाव आज की खुफिया दुनिया की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। आधुनिक एजेंट से केवल गोपनीयता बनाए रखने की अपेक्षा नहीं होती; उसे तेजी से बदलती तकनीक और जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को समझने की क्षमता भी चाहिए।
खुफिया अधिकारियों की ट्रेनिंग में क्या होता है?
रॉ की वास्तविक प्रशिक्षण व्यवस्था सार्वजनिक रूप से पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। पूर्व अधिकारियों और प्रकाशित संस्मरणों में हालांकि प्रशिक्षण के कुछ पहलुओं का उल्लेख मिलता है।
इनमें विदेशी भाषा सीखना, अलग-अलग परिस्थितियों में काम करना, फील्ड इंटेलिजेंस की बुनियादी समझ, संपर्क विकसित करना और दबाव की स्थिति में व्यवहार जैसे विषय शामिल बताए गए हैं।
पूर्व अधिकारियों के संस्मरणों में आत्मरक्षा प्रशिक्षण तथा पुराने दौर में इस्तेमाल की जाने वाली संचार और संपर्क तकनीकों का भी उल्लेख मिलता है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। फिल्मों में जासूसी को अक्सर हथियारों, पीछा करने और रोमांचक अभियानों से जोड़कर दिखाया जाता है, जबकि वास्तविक खुफिया काम का बड़ा हिस्सा जानकारी हासिल करने, उसका मूल्यांकन करने और उसे सही संदर्भ में निर्णय लेने वालों तक पहुंचाने से जुड़ा होता है।
विदेश में पहचान छिपाकर काम करने की चुनौती
विदेश में तैनाती खुफिया काम का सबसे संवेदनशील हिस्सा हो सकती है। कुछ अधिकारी राजनयिक या अन्य आधिकारिक भूमिकाओं के आवरण में काम कर सकते हैं, जबकि कुछ मामलों में अलग पहचान का इस्तेमाल किए जाने के दावे और संस्मरण भी सामने आए हैं।
ऐसी स्थिति में चुनौती केवल अपनी पहचान छिपाने की नहीं होती। लंबे समय तक एक अलग पेशेवर पहचान बनाए रखना, परिवार को उससे जोड़ना और अचानक पैदा होने वाली कूटनीतिक परिस्थितियों से निपटना भी जोखिम का हिस्सा बन सकता है।
पूर्व अधिकारियों के संस्मरणों में ऐसे उदाहरणों का उल्लेख मिलता है जहां विदेश में काम करने वाले अधिकारी की पहचान को लेकर अत्यधिक गोपनीयता बरती गई।
पकड़े जाने या वापस बुलाए जाने का जोखिम
खुफिया काम की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सफलता अक्सर सार्वजनिक नहीं होती, लेकिन असफलता के परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
यदि किसी अधिकारी की पहचान उजागर हो जाए तो संबंधित देश उसे वापस भेज सकता है या उसके खिलाफ कूटनीतिक कार्रवाई हो सकती है। भारत और पाकिस्तान जैसे देशों के संदर्भ में पूर्व अधिकारियों ने ऐसी व्यवस्थाओं और कूटनीतिक प्रोटोकॉल का उल्लेख किया है जिनके तहत पहचाने गए खुफिया अधिकारियों को वापस भेजे जाने की स्थिति पैदा हो सकती है।
विदेश में तैनात किसी अधिकारी के लिए यह सिर्फ पेशेवर समस्या नहीं होती। परिवार, बच्चों की शिक्षा और रोजमर्रा की योजनाएं भी अचानक प्रभावित हो सकती हैं।
आज रॉ के सामने चुनौती पहले से अलग क्यों है?
1960 और 1970 के दशक की खुफिया दुनिया और आज की दुनिया में बड़ा अंतर है।
पहले खुफिया जानकारी का बड़ा हिस्सा मानव संपर्कों, दस्तावेजों और सीमित संचार माध्यमों से जुटाया जाता था। अब इसके साथ साइबर सुरक्षा, सैटेलाइट इमेजरी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल फॉरेंसिक, वित्तीय नेटवर्क और सोशल मीडिया से मिलने वाली सूचनाओं का महत्व बढ़ गया है।
इसका अर्थ यह है कि भविष्य की खुफिया एजेंसी के लिए केवल पारंपरिक फील्ड एजेंट पर्याप्त नहीं होंगे। उसे भाषाविदों, डेटा विशेषज्ञों, साइबर विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय मामलों के जानकारों जैसे अलग-अलग कौशल वाले लोगों की जरूरत होगी।
रॉ की कहानी का सबसे बड़ा सबक
रॉ के इतिहास को केवल रहस्यमय अभियानों या जासूसों की कहानियों से समझना अधूरा होगा। इसकी असली कहानी एक ऐसे संगठन के लगातार बदलने की कहानी है जिसे हर दौर की नई सुरक्षा चुनौती के साथ अपनी कार्यप्रणाली और मानव संसाधन को बदलना पड़ा।
1965 के युद्ध के बाद जिस जरूरत ने एक अलग बाहरी खुफिया संस्था के गठन की जमीन तैयार की, वह जरूरत आज और अधिक जटिल रूप ले चुकी है। अब खतरे केवल सीमाओं के पार सैन्य गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं। आर्थिक दबाव, साइबर हमले, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, आतंकवाद, दुष्प्रचार और संवेदनशील तकनीकों की होड़ भी राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में आ चुकी है।



