छत्तीसगढ़ में कैंसर अब नोटिफाइड डिजीज, हर केस की रिपोर्टिंग होगी जरूरी
रायपुर। छत्तीसगढ़ ने कैंसर को ‘नोटिफाइड डिजीज’ यानी अधिसूचित बीमारी की श्रेणी में शामिल कर दिया है। इसका सीधा अर्थ है कि राज्य में कैंसर के मामलों की पहचान और रिपोर्टिंग अब पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित और अनिवार्य तरीके से की जाएगी। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की इस पहल का बड़ा उद्देश्य केवल मरीजों की संख्या गिनना नहीं, बल्कि ऐसा भरोसेमंद डेटाबेस तैयार करना है जिसके आधार पर स्क्रीनिंग, इलाज और कैंसर नियंत्रण की रणनीति बनाई जा सके।
यह कदम ऐसे समय आया है जब देशभर में कैंसर surveillance मजबूत करने पर जोर बढ़ा है। 11 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कैंसर अभी तक अधिसूचित बीमारी नहीं था, उन्हें ऐसी व्यवस्था पर विचार करने को कहा था। कोर्ट ने बेहतर cancer registry और वास्तविक incidence-prevalence data को स्वास्थ्य नीति के लिए जरूरी बताया था।
अस्पताल से लेकर लैब तक बढ़ी जिम्मेदारी
नई व्यवस्था के तहत सरकारी और निजी अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों, पैथोलॉजी तथा रेडियोलॉजी लैब, डायग्नोस्टिक सेंटर और कैंसर की जांच-इलाज से जुड़े दूसरे संस्थानों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत कैंसर संबंधी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, किसी मरीज में कैंसर की पुष्टि होने के बाद जानकारी एक महीने के भीतर दर्ज कराने की व्यवस्था रखी गई है। संदिग्ध मामले में चिकित्सकीय जांच और पुष्टि के बाद निर्धारित notification प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
इस बदलाव की असली अहमियत यह है कि कैंसर का डेटा किसी एक बड़े सरकारी अस्पताल तक सीमित नहीं रहेगा। निजी क्षेत्र में इलाज कराने वाले मरीज और छोटे शहरों की जांच सुविधाओं से सामने आने वाले मामले भी राज्य के surveillance system का हिस्सा बन सकेंगे।
17,611 मामले बताते हैं कि डेटा कितना जरूरी है
राज्य की उपलब्ध जानकारी के अनुसार 1 अप्रैल 2024 से जून 2026 के बीच छत्तीसगढ़ में 17,611 कैंसर मामले दर्ज किए गए। इनमें 4,465 मुख कैंसर, 1,038 फेफड़ों के कैंसर, 2,633 स्तन कैंसर, 2,200 गर्भाशय कैंसर और 2,560 पेट के कैंसर के मामले शामिल हैं। बाकी मामलों में गले, जीभ और अन्य प्रकार के कैंसर दर्ज किए गए हैं।
हालांकि, इन आंकड़ों को प्रदेश में कैंसर के कुल वास्तविक मामलों का अंतिम आंकड़ा मानना ठीक नहीं होगा। क्योंकि नई व्यवस्था की जरूरत ही इस वजह से बताई गई है कि पुरानी voluntary reporting व्यवस्था में कुछ मामले दर्ज नहीं हो पाते थे। इसलिए अनिवार्य रिपोर्टिंग के बाद शुरुआती वर्षों में रिकॉर्ड किए गए मामलों की संख्या बढ़ भी सकती है—और इसका मतलब जरूरी नहीं कि बीमारी उसी अनुपात में बढ़ी हो।
अब डेटा से तय हो सकती है स्वास्थ्य नीति
कैंसर को नोटिफाइड बीमारी बनाने का सबसे बड़ा फायदा डेटा की गुणवत्ता में संभावित सुधार है। किस जिले में कौन-सा कैंसर ज्यादा है, किस आयु समूह में मामले बढ़ रहे हैं, मरीज किस चरण में अस्पताल पहुंच रहे हैं और उपचार के बाद outcomes क्या हैं—इन सवालों के जवाब बेहतर डेटा से मिल सकते हैं।
यही जानकारी भविष्य में कैंसर screening, diagnostic facilities, मानव संसाधन और उपचार केंद्रों की योजना बनाने में उपयोगी होगी। केंद्र सरकार भी ICMR cancer registry data के आधार पर उच्च-भार वाले जिलों में Day Care Cancer Centres विकसित करने की नीति पर काम कर रही है। जुलाई 2025 में केंद्र ने 2025-26 के लिए 200 से अधिक DCCCs को मंजूरी दी थी, जबकि 2026 के सरकारी रिकॉर्ड में देशभर में सैकड़ों DCCCs के संचालन की जानकारी दी गई है।
छत्तीसगढ़ में इलाज की पहुंच भी बढ़ाई जा रही
राज्य में उपलब्ध जानकारी के अनुसार 26 जिलों में डे-केयर कीमोथेरेपी सेंटर संचालित हैं और पांच अन्य जिलों के लिए प्रस्ताव भेजे गए हैं। राज्य में सरकारी कैंसर अस्पतालों और रेडियोथेरेपी सुविधाओं के साथ प्राथमिक स्तर पर screening को भी मजबूत करने की कोशिश चल रही है। यह ढांचा तब ज्यादा उपयोगी हो सकता है जब नोटिफाइड डिजीज से मिलने वाला डेटा सीधे treatment planning से जोड़ा जाए।
अब चुनौती केवल रिपोर्ट भेजने की नहीं होगी। रिपोर्ट समय पर हो, डेटा में दोहराव न हो, निजी और सरकारी संस्थानों के रिकॉर्ड आपस में जुड़ें और मरीज की गोपनीयता सुरक्षित रहे—इन सभी पहलुओं पर व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
छत्तीसगढ़ का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में सही संख्या जानना ही आगे की रणनीति की पहली शर्त है। आने वाले वर्षों में इस नई रिपोर्टिंग व्यवस्था का वास्तविक मूल्य इस बात से तय होगा कि इसके आंकड़े कितनी जल्दी स्क्रीनिंग, इलाज और संसाधनों के फैसलों में बदलते हैं।



