TMC का नाम-निशान फ्रीज होने पर राहुल गांधी का हमला
नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा संगठनात्मक विवाद अब चुनावी पहचान की लड़ाई में बदल गया है। चुनाव आयोग ने 17 सितंबर 2026 के अंतरिम आदेश में दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनावों में ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘Flowers & Grass’ यानी जोड़ा फूल-घास चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने से रोक दिया। इसके बाद कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर तीखा राजनीतिक हमला बोला।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया कि शिवसेना और NCP के बाद अब TMC के मामले में भी वही पैटर्न दिखाई दे रहा है। उन्होंने लिखा, “वोट चोरी, सरकार चोरी, अब पार्टी चोरी” और चुनाव आयोग पर ऐसे कदमों को लेकर सवाल उठाए। गांधी का यह बयान उनका राजनीतिक आरोप है; चुनाव आयोग के आदेश में ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं है कि किसी राजनीतिक दल को तोड़ने के लिए BJP और आयोग ने मिलकर काम किया।
चुनाव आयोग ने वास्तव में क्या कहा?
आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि उसके सामने दो प्रतिद्वंद्वी समूह हैं—एक ममता बनर्जी के नेतृत्व में और दूसरा अरूप रॉय के नेतृत्व में—और दोनों खुद को मान्यता प्राप्त पार्टी का प्रतिनिधि बता रहे हैं। इसलिए पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अंतिम फैसला Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत विस्तृत सुनवाई के बाद किया जाना है।
समस्या यह थी कि 6 अक्टूबर को प्रस्तावित नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव नजदीक हैं। आयोग के अनुसार इतने कम समय में पूरी substantive proceedings पूरी करना संभव नहीं था। इसलिए दोनों गुटों को अस्थायी तौर पर अलग पहचान देने का फैसला किया गया।
दोनों पक्षों को 18 सितंबर सुबह 11 बजे तक तीन-तीन वैकल्पिक नाम और तीन-तीन free symbols की प्राथमिकता देने को कहा गया था। इन उपचुनावों के लिए यही अंतरिम पहचान लागू होगी, जब तक पार्टी विवाद पर अंतिम फैसला नहीं आता।
TMC का विवाद इतना बड़ा कैसे हुआ?
यह संकट सिर्फ चुनाव चिन्ह तक सीमित नहीं है। 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद TMC के भीतर संगठनात्मक नेतृत्व को लेकर गंभीर टकराव सामने आया। जून में बागी विधायकों के एक समूह ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुनने का दावा किया और विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता मिलने की बात कही। रिपोर्टों के अनुसार इस गुट ने 58 विधायकों के समर्थन का दावा किया था।
संसद में भी दरार सामने आई। जून में TMC के 20 लोकसभा सांसदों ने Nationalist Citizens Party of India (NCPI) के साथ जाने और NDA को समर्थन देने की घोषणा की। बाद में इन सांसदों के खिलाफ अयोग्यता से जुड़ी कार्यवाही भी चर्चा में आई और लोकसभा सचिवालय ने उनसे जवाब मांगा।
हालांकि इन घटनाओं को पार्टी के नाम और चिन्ह पर अंतिम अधिकार के बराबर मानना जल्दबाजी होगी। चुनाव आयोग ने अभी किसी एक गुट को TMC घोषित नहीं किया है।
ममता खेमे ने भी भेजे नए विकल्प
चुनाव आयोग के निर्देश के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने नए नाम और चिन्ह के विकल्प आयोग को भेजे। PTI की रिपोर्ट के अनुसार यह जवाब ‘strongest protest’ के साथ भेजा गया। इसका मतलब है कि ममता गुट ने अंतरिम आदेश को स्वीकार करने के बजाय अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए चुनावी प्रक्रिया में आगे बढ़ने की तैयारी की है।
यही इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। फिलहाल किसी पक्ष के हाथ से स्थायी तौर पर TMC की पहचान नहीं गई है। असली सवाल अभी भी आयोग के अंतिम पैराग्राफ-15 निर्धारण का है।
राहुल गांधी के बयान का राजनीतिक अर्थ
राहुल गांधी ने इस घटनाक्रम को केवल TMC का आंतरिक विवाद नहीं माना। उन्होंने इसे राजनीतिक दलों की संगठनात्मक स्वायत्तता और मतदाताओं के जनादेश से जोड़ते हुए कहा कि यह लड़ाई उन सभी दलों और मतदाताओं की है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहते हैं।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग का आधिकारिक रुख यह है कि मौजूदा आदेश अंतरिम और चुनाव-विशेष व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य दोनों दावेदार गुटों को समान स्थिति में रखते हुए आगामी उपचुनावों में पहचान संबंधी भ्रम से बचना है। अंतिम फैसला अभी बाकी है।
यही वजह है कि TMC का विवाद आने वाले दिनों में सिर्फ बंगाल की राजनीति नहीं, बल्कि भारत में पार्टी विभाजन, संगठनात्मक बहुमत और चुनाव चिन्ह के कानूनी अधिकार पर होने वाली बहस का भी महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।



