कोरबा में 500 रुपये के मुआवजे के बाद
कोरबा, छत्तीसगढ़। खेत में मवेशी पहुंचने और फसल खराब होने जैसी घटनाएं ग्रामीण इलाकों में नई नहीं हैं। आमतौर पर ऐसे विवाद नुकसान की भरपाई और बातचीत के जरिए सुलझा लिए जाते हैं। लेकिन कोरबा जिले में फसल नुकसान से शुरू हुआ ऐसा ही एक विवाद हिंसक घटना में बदल गया। तेंदुबेदरा जंगल क्षेत्र में एक पशुपालक पर धनुष-बाण से हमला किए जाने का मामला सामने आया है। बाण युवक के बाएं कूल्हे में जा धंसा, जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया।
पुलिस के मुताबिक घायल युवक की पहचान कवर्धा जिले के भागनपुर निवासी 24 वर्षीय लीलीधर सप्रे के रूप में हुई है। वह बिलासपुर, मुंगेली, कवर्धा और बेमेतरा जिलों से आए अन्य पशुपालकों के साथ करीब 650 भेड़-बकरियों और घोड़ों को लेकर तेंदुबेदरा जंगल क्षेत्र में पहुंचा था। इसी दौरान समूह का एक घोड़ा निकलकर तेंदुभाठा गांव में गंगादीन मरकाम के खेत तक पहुंच गया और वहां धान की फसल को नुकसान पहुंचा।
500 रुपये देने के बाद मामला शांत होने की उम्मीद थी
फसल नुकसान की शिकायत लेकर गंगादीन अपने बच्चों के साथ पशुपालकों के पास पहुंचा। रिपोर्ट के अनुसार बातचीत के बाद समूह में शामिल अनिल पाल ने 500 रुपये मुआवजे के तौर पर दिए। इसके बाद गंगादीन अपने बच्चों के साथ वापस लौट गया। इस स्तर पर विवाद खत्म होता दिखाई दे रहा था।
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लेकिन घायल लीलीधर की शिकायत के अनुसार, रात करीब आठ बजे गंगादीन अपने साथी अर्जुन सिंह के साथ दोबारा वहां पहुंचा। आरोप है कि दोनों के पास धनुष-बाण थे और उन्होंने गाली-गलौज तथा जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद गंगादीन ने लीलीधर को निशाना बनाकर बाण चलाया। लीलीधर ने बचने के लिए पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन बाण उसके बाएं कूल्हे में जा धंसा। मौके पर मौजूद अन्य लोगों ने घटना देखी।
घायल को अस्पताल ले जाया गया, पुलिस ने दर्ज किया मामला
हमले के बाद आरोपी मौके से चले गए। घायल लीलीधर को अनिल पाल और राजेंद्र पाल उपचार के लिए कटघोरा के नगोई अस्पताल लेकर पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे आगे के इलाज के लिए रेफर किया गया।
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जटगा चौकी पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 296, 351(3), 109(1) और 3(5) के तहत अपराध दर्ज कर जांच शुरू की है। पुलिस के अनुसार घटना में नामजद आरोपियों की तलाश की जा रही है।
मामूली फसल नुकसान से हिंसा तक पहुंचना क्यों गंभीर संकेत है?
इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू केवल हमला नहीं है, बल्कि यह है कि एक स्थानीय फसल नुकसान का विवाद बातचीत और मुआवजे के बाद भी हिंसा तक पहुंच गया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में किसान और पशुपालक दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। चराई के दौरान पशुओं का खेत में पहुंच जाना कई इलाकों में विवाद का कारण बन सकता है, लेकिन ऐसे मामलों के लिए बातचीत, पंचायत या कानूनी शिकायत जैसे रास्ते मौजूद हैं।
कृषि विशेषज्ञों के नजरिए से देखें तो फसल नुकसान की स्थिति में सबसे जरूरी है कि नुकसान का आकलन स्पष्ट तरीके से हो और दोनों पक्षों के बीच जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था हो। वहीं, बड़े पशु समूहों के साथ दूसरे जिलों से आने वाले पशुपालकों के लिए भी चराई के क्षेत्र और खेतों की सीमाओं को लेकर पहले से स्पष्टता होना विवाद रोकने में मदद कर सकता है।
बड़ी संख्या में पशुओं के साथ आवाजाही में स्थानीय समन्वय जरूरी
यह मामला इसलिए भी ध्यान खींचता है क्योंकि पशुपालकों का समूह करीब 650 पशुओं के साथ इलाके में पहुंचा था। इतने बड़े झुंड की आवाजाही के दौरान स्थानीय किसानों के खेतों तक पशुओं के पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। दूसरी तरफ किसानों के लिए खड़ी फसल का नुकसान सीधे उनकी आय से जुड़ा होता है।
ऐसे मामलों में स्थानीय स्तर पर ग्राम पंचायत, पशुपालक समूह और संबंधित प्रशासन के बीच समन्वय की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। चराई मार्ग, अस्थायी पड़ाव और खेतों से दूरी जैसी छोटी व्यवस्थाएं कई बार विवाद को जन्म लेने से पहले ही रोक सकती हैं।
फिलहाल पुलिस की जांच यह तय करेगी कि घटना में वास्तव में क्या हुआ, किसकी क्या भूमिका थी और लगाए गए आरोपों की पुष्टि किन साक्ष्यों से होती है। लेकिन इस घटना ने यह जरूर दिखा दिया है कि फसल और पशु चराई से जुड़े छोटे विवाद अगर समय रहते नहीं सुलझाए जाएं, तो वे गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या में बदल सकते हैं।
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