टाटा संस में फिर आमने-सामने
मुंबई। टाटा समूह में नेतृत्व परिवर्तन का सवाल एक बार फिर अचानक केंद्र में आ गया है। कुछ सप्ताह पहले एन. चंद्रशेखरन ने संकेत दिया था कि वह टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा करने के बाद आगे नहीं बढ़ना चाहते। इसके बाद उत्तराधिकारी की तलाश की चर्चा शुरू हुई थी। लेकिन 17 सितंबर 2026 की टाटा संस बोर्ड बैठक ने पूरा परिदृश्य बदल दिया। बोर्ड ने चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए चेयरमैन बनाए रखने के पक्ष में 4-1 से फैसला किया।
इस निर्णय पर टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने खुलकर आपत्ति जताई। Moneycontrol के अनुसार नोएल टाटा ने कहा कि उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया और कानूनी राय के आधार पर उनके विरोध को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने इस निर्णय को “illegal” बताया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह नोएल टाटा और ट्रस्ट्स की कानूनी स्थिति है; फैसला अवैध है या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण संबंधित कानूनी प्रक्रिया में ही होगा।
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विवाद का केंद्र सिर्फ चेयरमैन पद नहीं
इस पूरे घटनाक्रम को केवल व्यक्ति बनाम व्यक्ति के विवाद की तरह देखना अधूरा होगा। असली प्रश्न टाटा संस में गवर्नेंस, उत्तराधिकार और नियंत्रण की प्रक्रिया का है। Tata Trusts के पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है और उसके दो प्रमुख ट्रस्ट—Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust—सबसे बड़े शेयरधारकों में हैं। इसलिए बोर्ड का फैसला महत्वपूर्ण होने के बावजूद अंतिम तस्वीर शेयरहोल्डर स्तर पर बदल सकती है।
चंद्रशेखरन के मौजूदा निदेशक कार्यकाल में रोटेशन के आधार पर बदलाव होना है, इसलिए आगामी AGM में उनकी निदेशक के रूप में पुनर्नियुक्ति महत्वपूर्ण होगी। रिपोर्टों के मुताबिक यह बैठक 31 दिसंबर 2026 तक आयोजित करना जरूरी है। यहीं पर चेयरमैन पद और डायरेक्टर पद का संबंध बेहद अहम हो जाता है—चेयरमैन के तौर पर बने रहने के लिए उनका बोर्ड में बने रहना जरूरी है।
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AGM से पहले तस्वीर क्यों जटिल है?
समस्या यह भी है कि Tata Trusts के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पहले से पूरी तरह सुचारु नहीं रही है। Sir Ratan Tata Trust से जुड़ी महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की कार्यवाही के कारण ट्रस्टी बैठक बुलाने पर प्रतिबंध की स्थिति बनी हुई है। इसी पृष्ठभूमि में टाटा संस की AGM, जो पहले 18 अगस्त के लिए तय थी, प्रतिनिधि नामित न हो पाने के कारण स्थगित हुई थी।
इसलिए आने वाली AGM सिर्फ चंद्रशेखरन के भविष्य का फैसला नहीं करेगी, बल्कि यह भी दिखाएगी कि टाटा समूह जैसे बड़े कारोबारी ढांचे में बोर्ड, ट्रस्ट्स और शेयरधारकों के बीच अधिकारों की व्याख्या व्यवहार में कैसे होती है।
इसी समय लिस्टिंग का दबाव भी बढ़ा
चंद्रशेखरन की वापसी का फैसला ऐसे समय हुआ है जब Tata Sons पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने का नियामकीय दबाव भी बढ़ गया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने Tata Sons की Core Investment Company के रूप में रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की कोशिश स्वीकार नहीं की है, जिससे ऊपरी स्तर की NBFC पर लागू लिस्टिंग नियम फिर चर्चा में आ गए हैं। बोर्ड ने 17 सितंबर को लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने पर भी सहमति जताई।
यानी आने वाले महीनों में टाटा संस के सामने एक साथ तीन बड़े सवाल रहेंगे—चेयरमैन कौन रहेगा, ट्रस्ट्स और बोर्ड के बीच सहमति कैसे बनेगी और कंपनी के संभावित लिस्टिंग ढांचे को किस तरह आगे बढ़ाया जाएगा। अभी बोर्ड का 4-1 फैसला एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन अंतिम अध्याय AGM और उससे जुड़ी आगे की कानूनी-प्रशासनिक प्रक्रिया में लिखा जाएगा।



