स्ट्रीट फूड पर तुकाराम मुंढे का बड़ा बयान: कारोबार बंद नहीं, सुरक्षित और व्यवस्थित व्यवस्था पर जोर
नई दिल्ली: सड़क किनारे मिलने वाला खाना भारत की रोजमर्रा की जिंदगी और स्थानीय फूड कल्चर का अहम हिस्सा है। लाखों लोग इससे रोजगार कमाते हैं और करोड़ों ग्राहक कम कीमत में भोजन का विकल्प पाते हैं। ऐसे में स्ट्रीट फूड को लेकर महाराष्ट्र FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे का बयान एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या कारोबार और सार्वजनिक स्वास्थ्य, दोनों को साथ लेकर चलने के लिए बेहतर व्यवस्था बनाई जा सकती है?
मुंढे के मुताबिक, स्ट्रीट फूड कारोबार को बंद करना उद्देश्य नहीं है। जरूरत इस बात की है कि वेंडर्स की आजीविका, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता और शहर में सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाया जाए।
सवाल सिर्फ खाने की सफाई का नहीं, पूरे सिस्टम का है
स्ट्रीट फूड की गुणवत्ता केवल खाना बनाने वाले व्यक्ति की सावधानी पर निर्भर नहीं करती। पानी की उपलब्धता, कच्चे माल का भंडारण, बर्तन धोने की व्यवस्था, कचरा निपटान, खाना ढककर रखना और आसपास की स्वच्छता जैसे कई कारक भोजन की सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।
यही वजह है कि केवल छापेमारी या किसी एक दुकान को हटाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। यदि वेंडर के पास साफ पानी, कचरा संग्रहण और उचित जगह जैसी बुनियादी सुविधाएं ही नहीं होंगी, तो खाद्य सुरक्षा के नियमों का पालन करना उसके लिए भी मुश्किल होगा।
मुंढे के बयान का महत्वपूर्ण पहलू यही है कि नियमों के साथ बुनियादी ढांचे की व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा।
हर फुटपाथ कारोबार की जगह नहीं हो सकता
शहरों में स्ट्रीट वेंडिंग का एक दूसरा पहलू पैदल यात्रियों और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल से जुड़ा है। फुटपाथ का प्राथमिक उद्देश्य पैदल चलने वालों की आवाजाही है। अगर वहां अनियोजित तरीके से दुकानें लगती हैं, तो पैदल यात्रियों के लिए जगह कम हो सकती है और ट्रैफिक तथा सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
मुंढे ने इसी संदर्भ में वेंडिंग के लिए निर्धारित क्षेत्रों यानी जोनिंग की जरूरत पर जोर दिया है। मुंबई की चौपाटी और खाऊ गलियों जैसे स्थानों का उदाहरण देते हुए उन्होंने संकेत दिया कि जहां बड़ी संख्या में फूड वेंडर्स एक जगह हों, वहां सफाई, पानी, कचरा प्रबंधन और दूसरी सुविधाओं को अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकता है।
स्ट्रीट फूड के लिए भी हो सकते हैं ‘फूड मार्केट’
यदि किसी शहर में सब्जी मंडी, फल बाजार और दूसरे व्यापारिक क्षेत्रों के लिए नियोजित स्थान बनाए जा सकते हैं, तो स्ट्रीट फूड के लिए भी व्यवस्थित बाजार विकसित किए जा सकते हैं।
ऐसे वेंडिंग जोन में कुछ बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य की जा सकती हैं—पीने और सफाई के लिए पानी, कचरा संग्रहण, ड्रेनेज, बिजली, खाद्य भंडारण की उचित व्यवस्था और नियमित निरीक्षण। इससे नियमों का पालन कराने वाली एजेंसियों के लिए निगरानी आसान होगी और वेंडर्स को भी बार-बार स्थान बदलने की समस्या कम हो सकती है।
ग्राहकों के लिए भी इसका सीधा फायदा होगा। उन्हें यह पता होगा कि भोजन बेचने वाली जगह एक निर्धारित और निगरानी योग्य क्षेत्र में है।
वेंडर्स की आजीविका भी नीति का हिस्सा
स्ट्रीट फूड पर किसी भी नीति को केवल खाद्य सुरक्षा के नजरिए से देखना अधूरा होगा। छोटे वेंडर्स के लिए यही कारोबार परिवार की आय का प्रमुख साधन हो सकता है। इसलिए किसी स्थान से हटाने की कार्रवाई के साथ वैकल्पिक जगह और बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
एक व्यावहारिक मॉडल में स्थानीय निकाय, खाद्य सुरक्षा विभाग और वेंडर्स के प्रतिनिधियों के बीच समन्वय किया जा सकता है। इससे नियम केवल कागज पर रहने के बजाय रोजमर्रा के कारोबार का हिस्सा बन सकते हैं।
भारत की फूड कल्चर को भी मिल सकता है फायदा
भारत के अलग-अलग शहरों की पहचान वहां के स्ट्रीट फूड से भी होती है। चाट, इडली, वड़ा पाव, मोमोज, कचौरी, भेलपुरी से लेकर क्षेत्रीय व्यंजनों तक, सड़क किनारे मिलने वाला भोजन स्थानीय संस्कृति और छोटे कारोबार का हिस्सा है।
इसलिए चुनौती स्ट्रीट फूड को खत्म करने की नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित, स्वच्छ और व्यवस्थित बनाने की है। अगर शहर नियोजन और खाद्य सुरक्षा को एक साथ जोड़ा जाए, तो इससे वेंडर्स और ग्राहकों दोनों को फायदा हो सकता है।



