नींद कितने घंटे जरूरी?
नई दिल्ली। रोजाना कितने घंटे सोना चाहिए? इस सवाल का जवाब अक्सर 7 या 8 घंटे में दिया जाता है, लेकिन नई वैज्ञानिक शोध ने तस्वीर को थोड़ा अधिक बारीकी से समझाया है। Nature में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में करीब 5 लाख लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण कर पाया गया कि नींद और शरीर की जैविक उम्र के बीच संबंध सीधा नहीं, बल्कि U-shaped है। यानी बहुत कम और बहुत ज्यादा नींद—दोनों ही उम्र बढ़ने से जुड़े जैविक संकेतकों के साथ जुड़ी पाई गईं।
अध्ययन में UK Biobank के 37 से 84 वर्ष की उम्र वाले प्रतिभागियों के self-reported sleep data का इस्तेमाल किया गया। शोधकर्ताओं ने शरीर और दिमाग से जुड़े 23 biological ageing clocks को देखा। इन विश्लेषणों में कई प्रमुख अंगों और जैविक प्रणालियों में नींद की अवधि तथा biological age gap के बीच समान दिशा का संबंध दिखाई दिया।
कितनी नींद को सबसे अनुकूल पाया गया?
शोध के अनुसार, अलग-अलग अंगों और लिंग के हिसाब से सबसे कम biological age gap लगभग 6.4 से 7.8 घंटे की नींद के बीच पाया गया। महिलाओं में यह सीमा लगभग 6.5 से 7.8 घंटे, जबकि पुरुषों में 6.4 से 7.7 घंटे रही। वैज्ञानिकों ने व्यापक विश्लेषण के लिए 6 से 8 घंटे को सामान्य नींद की श्रेणी माना और 6 घंटे से कम को short sleep तथा 8 घंटे से अधिक को long sleep के रूप में वर्गीकृत किया।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति के लिए बिल्कुल 7 घंटे 10 मिनट की नींद ही सही होगी। ये आंकड़े मुख्य रूप से मध्य और अधिक उम्र की आबादी से जुड़े हैं और अध्ययन में नींद की अवधि स्वयं प्रतिभागियों द्वारा बताई गई थी। इसलिए व्यक्तिगत जरूरत, उम्र, स्वास्थ्य और नींद की गुणवत्ता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कम नींद पर जोखिम क्यों बढ़ता दिखा?
अध्ययन में 6 घंटे से कम सोने वालों में 6–8 घंटे सोने वालों की तुलना में किसी भी कारण से मृत्यु का hazard ratio 1.50 था। 8 घंटे से ज्यादा सोने वालों में यह 1.40 था। सरल भाषा में कहें तो दोनों समूहों में मृत्यु का जोखिम सांख्यिकीय रूप से अधिक पाया गया, हालांकि यह आंकड़ा कारण और परिणाम साबित नहीं करता।
यही इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण सावधानी है। वैज्ञानिकों ने स्वयं कहा है कि अध्ययन मुख्यतः association दिखाता है। इससे यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कम या ज्यादा नींद ही बीमारी या मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण है। इसके उलट, पहले से मौजूद बीमारी भी किसी व्यक्ति की नींद की अवधि बदल सकती है।
सिर्फ सोने का समय नहीं, नींद का पैटर्न भी मायने रखता है
इस शोध का व्यापक संदेश यह है कि नींद को केवल “कम सोना” या “ज्यादा सोना” जैसे आसान पैमाने से नहीं देखा जा सकता। नियमित नींद, उसकी गुणवत्ता और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति भी महत्वपूर्ण हैं। अध्ययन में short और long sleep दोनों का संबंध कई systemic diseases तथा late-life depression जैसे परिणामों से पाया गया।
इसलिए लगातार 5-6 घंटे की नींद को सामान्य मान लेना भी ठीक नहीं है और रोजाना जरूरत से बहुत अधिक सोने को अपने-आप स्वस्थ संकेत मान लेना भी सही नहीं होगा। खासकर यदि पर्याप्त समय बिस्तर पर बिताने के बावजूद थकान, बार-बार नींद टूटना या दिन में अत्यधिक नींद बनी रहती है, तो समस्या केवल घंटों की नहीं हो सकती।



