SIR विवाद के बीच NDA सहयोगी दलों की EC से सफाई की मांग, चुनाव प्रक्रिया पर उठे सवालों के बीच पारदर्शिता पर जोर
नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रही बहस अब केवल विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच का मुद्दा नहीं रह गई है। केंद्र की सत्तारूढ़ NDA के तीन सहयोगी दलों—लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), तेलुगु देशम पार्टी और राष्ट्रीय लोक मोर्चा—ने भी चुनाव आयोग से पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। इन दलों का कहना है कि सवाल किसी राजनीतिक दल को जवाब देने के लिए नहीं, बल्कि मतदाताओं के बीच पैदा हो रही शंकाओं को दूर करने के लिए हैं।
इस घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मांग का केंद्र SIR की पूरी प्रक्रिया से ज्यादा चुनाव आयोग की संस्थागत पारदर्शिता बन गया है। LJP (रामविलास) प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि यदि लोगों के मन में चुनाव प्रक्रिया को लेकर संदेह पैदा होने लगे तो आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। इसी तरह TDP के लोकसभा फ्लोर लीडर लावू श्रीकृष्ण देवरायुलु ने कहा कि सवाल उठने पर उचित स्पष्टीकरण और पारदर्शिता से संस्था में जनता का विश्वास मजबूत हो सकता है। RLM प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने भी SIR को लेकर बनी स्थिति पर आयोग से स्पष्टीकरण की जरूरत बताई।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
मामला तब ज्यादा गंभीर सार्वजनिक चर्चा में आया जब एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग की कुछ निर्णय प्रक्रियाओं को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने-बहाल करने और चुनावी डेटा से जुड़े तकनीकी एवं प्रशासनिक मुद्दे शामिल थे।
हालांकि, चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने इन रिपोर्टों के बाद कहा कि SIR समेत आयोग के निर्णय सभी तीन चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे। आयोग ने भी बाद में कहा कि सदस्यों के बीच अलग-अलग टिप्पणियां या सुझाव किसी संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हो सकते हैं। उसके अनुसार लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-परख व्यवस्था का हिस्सा हैं।
यही वह बिंदु है जहां अब पारदर्शिता की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी संवैधानिक संस्था के भीतर किसी प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग टिप्पणियां दर्ज हुई हैं, तो जनता के लिए यह समझना जरूरी है कि अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से हुआ, आपत्तियों पर क्या विचार किया गया और अंतिम व्यवस्था कैसे तय की गई।
SIR सिर्फ मतदाता सूची की कवायद नहीं
SIR का सीधा संबंध मतदाता सूची की शुद्धता से है। इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं की जानकारी को व्यवस्थित करना और ऐसे नामों की पहचान करना है जिनमें मृत्यु, स्थान परिवर्तन, दोहरी प्रविष्टि या अन्य तरह की विसंगतियां हो सकती हैं। लेकिन ऐसी प्रक्रिया में दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि पात्र मतदाता का नाम गलती से प्रभावित न हो।
यही कारण है कि नोटिस, दस्तावेजों की जांच, आपत्ति दर्ज कराने और अपील की व्यवस्था जैसे चरण बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। हाल के दिनों में दिल्ली की SIR प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं को अलग-अलग तरह की विसंगतियों के आधार पर नोटिस दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू का नाम भी एक ऐसे मामले में आया था, जिसे बाद में सत्यापित कर वैध किया गया।
पश्चिम बंगाल में भी SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं के मामले में बड़ी संख्या में अपीलें दायर होने की जानकारी चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को दी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण केवल डेटा अपडेट करने की तकनीकी प्रक्रिया नहीं है; इसका सीधा संबंध नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ता है।
अब आगे क्या अहम होगा?
मौजूदा विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि किस राजनीतिक पक्ष का आरोप सही है, बल्कि यह है कि चुनाव आयोग अपने फैसलों और प्रक्रियाओं को जनता के सामने कितनी स्पष्टता से रखता है।
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और चुनावी प्रक्रिया में उसकी भूमिका प्रशासनिक निर्णयों से कहीं व्यापक है। इसलिए मतदाता सूची में बड़े स्तर पर बदलाव की प्रक्रिया के दौरान स्पष्ट दिशा-निर्देश, दस्तावेजों की सार्वजनिक जानकारी, आपत्ति और अपील की आसान व्यवस्था तथा तकनीकी प्रणालियों की जवाबदेही भविष्य में भी महत्वपूर्ण रहने वाली है।
तीन NDA सहयोगी दलों की ओर से स्पष्टीकरण की मांग इस बहस को एक अलग आयाम देती है। यह दिखाता है कि चुनावी प्रक्रिया पर भरोसे का प्रश्न केवल विपक्ष की राजनीतिक आपत्ति तक सीमित नहीं रह गया है। हालांकि, आयोग ने अपनी ओर से आंतरिक मतभेदों को निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बताया है और सभी निर्णयों पर सामूहिक मंजूरी होने की बात कही है।



