बड़ी पहल: छत्तीसगढ़ के 6 विश्वविद्यालयों में शुरू हुआ ‘रक्षक’ पाठ्यक्रम, बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए तैयार होंगे विशेषज्ञ
रायपुर, 1 अक्टूबर 2026। बच्चों की सुरक्षा केवल कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उन कानूनों और अधिकारों को जमीन पर लागू करने के लिए प्रशिक्षित लोगों की भी जरूरत होती है। इसी दिशा में छत्तीसगढ़ में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। राज्य के छह विश्वविद्यालयों में एक साथ ‘रक्षक’ पाठ्यक्रम की कक्षाएं शुरू की गई हैं, जिसका उद्देश्य बाल अधिकारों के संरक्षण, संवर्धन और जागरूकता के क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना है।
यह पाठ्यक्रम Post Graduate Diploma in Protection of Child Rights (RAKSHAK) के रूप में शुरू किया गया है। इसे छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पहल पर लागू किया गया है।
बाल अधिकारों की समझ को अकादमिक प्रशिक्षण से जोड़ने की कोशिश
बच्चों से जुड़े मामलों में कानून, सामाजिक परिस्थितियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार और प्रशासन—कई स्तर एक साथ जुड़े होते हैं। ऐसे में केवल सामान्य जागरूकता पर्याप्त नहीं होती। संबंधित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को बाल अधिकारों से जुड़े कानूनी और सामाजिक पहलुओं की व्यावहारिक समझ भी जरूरी होती है।
‘रक्षक’ पाठ्यक्रम का उद्देश्य इसी जरूरत को पूरा करना है। इसके जरिए ऐसे विद्यार्थियों को तैयार करने की कोशिश की जा रही है जो भविष्य में बच्चों के संरक्षण और अधिकारों से जुड़े कार्यों में अधिक संवेदनशीलता और विशेषज्ञता के साथ योगदान दे सकें।
छह विश्वविद्यालयों में एक साथ शुरू हुई पढ़ाई
इस पहल की खासियत इसका व्यापक संस्थागत दायरा है। पाठ्यक्रम की कक्षाएं एक साथ इन छह विश्वविद्यालयों में शुरू हुई हैं—
- पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय
- कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय
- संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय
- एमिटी विश्वविद्यालय
- आंजनेय विश्वविद्यालय
- शंकराचार्य विश्वविद्यालय
छह अलग-अलग विश्वविद्यालयों को जोड़ने से पाठ्यक्रम का प्रभाव केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं रहेगा। इससे अलग-अलग क्षेत्रों से विद्यार्थियों को बाल अधिकारों के विषय में औपचारिक प्रशिक्षण हासिल करने का अवसर मिल सकता है।
विश्वविद्यालयों के बीच समन्वय पर भी जोर
पाठ्यक्रम के शुभारंभ के अवसर पर छहों विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और संबंधित पदाधिकारियों की ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई। इसमें छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा सहित अन्य अधिकारी शामिल हुए।
उच्च शिक्षा मंत्री टंकराम वर्मा ने भी बैठक में भाग लिया और पाठ्यक्रम की शुरुआत पर विश्वविद्यालयों को शुभकामनाएं दीं। महिला एवं बाल विकास तथा समाज कल्याण मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने भी विद्यार्थियों और संबंधित संस्थानों को बधाई दी।
कुलपतियों ने बच्चों के अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के लिए आपसी सहयोग के साथ काम करने की प्रतिबद्धता जताई। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बाल संरक्षण का प्रभावी ढांचा शिक्षा संस्थानों, प्रशासन, सामाजिक संस्थाओं और समुदाय के बीच बेहतर समन्वय पर निर्भर करता है।
विद्यार्थियों के सवालों से सामने आया व्यावहारिक पक्ष
शुभारंभ कार्यक्रम केवल औपचारिक संबोधन तक सीमित नहीं रहा। विद्यार्थियों ने बाल अधिकारों से जुड़े विषयों पर सवाल पूछे, जिनका आयोग की अध्यक्ष और सचिव ने जवाब दिया।
ऐसे संवाद से विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि बाल अधिकारों से जुड़े विषय केवल पाठ्यक्रम की किताबों तक सीमित नहीं हैं। वास्तविक परिस्थितियों में बच्चों की सुरक्षा, अधिकारों और संरक्षण से जुड़े मामलों में कई तरह की जटिलताएं सामने आती हैं।
यही कारण है कि किसी भी ऐसे पाठ्यक्रम की उपयोगिता उसके सैद्धांतिक अध्ययन के साथ-साथ व्यावहारिक समझ विकसित करने की क्षमता पर भी निर्भर करेगी।
प्रशिक्षित मानव संसाधन की जरूरत क्यों महत्वपूर्ण है?
बाल संरक्षण से जुड़े मामलों में समय पर पहचान, उचित हस्तक्षेप और संवेदनशील व्यवहार बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। किसी बच्चे से जुड़ी समस्या को केवल प्रशासनिक मामले के रूप में देखने के बजाय उसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संदर्भ को समझना भी जरूरी हो सकता है।
‘रक्षक’ जैसे अकादमिक कार्यक्रम से यदि प्रशिक्षित युवाओं की एक नई श्रेणी तैयार होती है, तो आने वाले वर्षों में बाल अधिकारों से जुड़े संस्थानों और संगठनों को विशेषज्ञ मानव संसाधन उपलब्ध हो सकता है।
इसके अलावा यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को सामाजिक क्षेत्र, बाल संरक्षण, गैर-सरकारी संगठनों, शोध, नीति और संबंधित संस्थागत कार्यों में आगे बढ़ने के लिए आधार भी दे सकता है।
आगे की सफलता सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं होगी
इस पहल का वास्तविक प्रभाव इस बात से तय होगा कि पाठ्यक्रम पूरा करने वाले विद्यार्थियों को आगे किस तरह के अवसर और व्यावहारिक अनुभव मिलते हैं। विश्वविद्यालयों और बाल अधिकार संरक्षण आयोग के बीच यदि प्रशिक्षण, इंटर्नशिप, फील्ड स्टडी और शोध परियोजनाओं का मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाता है, तो इसका लाभ अधिक व्यापक हो सकता है।
भविष्य में विश्वविद्यालयों में बाल अधिकारों से जुड़े शोध और स्थानीय स्तर की समस्याओं पर अध्ययन भी इस पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। इससे नीति निर्माण और बाल संरक्षण व्यवस्था को जमीनी स्तर की जानकारी उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
छत्तीसगढ़ के छह विश्वविद्यालयों में एक साथ शुरू हुआ यह पाठ्यक्रम इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि यह बाल अधिकारों के विषय को जागरूकता से आगे बढ़ाकर विशेषज्ञता और संस्थागत प्रशिक्षण से जोड़ने की कोशिश करता है। आने वाले समय में इसकी सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यही होगा कि इससे तैयार होने वाली विशेषज्ञता बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों की वास्तविक व्यवस्था को कितना मजबूत करती है।



