रायगढ़ में स्पंज प्लांट पर बढ़ा विवाद: ग्रामीणों का बड़ा विरोध, 160 एकड़ जमीन और सरकारी भूमि की जांच की मांग
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में औद्योगिक परियोजना को लेकर ग्रामीणों और कंपनी के बीच विवाद गहराता दिखाई दे रहा है। तमनार क्षेत्र के बड़गांव के ग्रामीणों ने बीएस स्पंज प्लांट के खिलाफ कलेक्ट्रेट पहुंचकर कलेक्टर को लिखित शिकायत सौंपी है। ग्रामीणों ने जमीन की खरीद, सरकारी राजस्व भूमि पर कथित कब्जे, पेड़ों की कटाई और ग्रामसभा के प्रस्ताव की अनदेखी जैसे मुद्दे उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
इस विवाद का केंद्र केवल एक औद्योगिक इकाई की स्थापना नहीं है। मामला जमीन के अधिकार, ग्रामसभा की भूमिका, सरकारी भूमि की सुरक्षा और प्रशासनिक कार्रवाई की जवाबदेही से भी जुड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले भी संबंधित अधिकारियों को शिकायतें दी गई थीं, लेकिन उनकी मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। अब वे पूरे मामले की जांच और कथित अनियमितताएं सामने आने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई चाहते हैं।
160 एकड़ जमीन की खरीद पर ग्रामीणों ने उठाए सवाल
ग्रामीणों ने अपने आवेदन में आरोप लगाया है कि बीएस स्पंज प्राइवेट लिमिटेड के संचालक ने बड़गांव में लगभग 160 एकड़ जमीन ग्रामीणों से पूरी जानकारी दिए बिना और कथित तौर पर बहला-फुसलाकर खरीदी। इसी जमीन पर कंपनी स्थापित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने की बात कही गई है।
ग्रामीणों ने भूमि के डायवर्सन यानी उसके निर्धारित उपयोग को बदलने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि संबंधित प्रक्रिया के दौरान गांव के लोगों को पूरी जानकारी नहीं दी गई।
हालांकि, जमीन की खरीद और डायवर्सन से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संबंधित प्रक्रियाओं में किसी नियम का उल्लंघन हुआ है या नहीं। भूमि खरीद के प्रत्येक मामले में दस्तावेज, स्वामित्व, सहमति और लागू राजस्व नियमों की स्थिति अलग-अलग हो सकती है। इसलिए शिकायत के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।
ग्रामसभा के प्रस्ताव के बावजूद काम शुरू करने का आरोप
ग्रामीणों की शिकायत में 26 नवंबर 2025 को हुई ग्रामसभा का प्रस्ताव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आवेदन के मुताबिक, ग्रामसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था कि ग्रामसभा और ग्राम पंचायत की पूर्व अनुमति के बिना कंपनी किसी प्रकार का काम शुरू नहीं करेगी। ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्ताव की प्रतियां संबंधित अधिकारियों और कंपनी को भी दी गई थीं।
इसके बावजूद कंपनी की ओर से बिना विधिवत सीमांकन कराए बाउंड्री निर्माण और पेड़ों की कटाई शुरू करने का आरोप लगाया गया है। इस संबंध में ग्रामीणों ने 28 नवंबर 2025 को एसडीएम घरघोड़ा के समक्ष भी शिकायत प्रस्तुत करने की जानकारी दी है।
यहां प्रशासन के सामने दो महत्वपूर्ण सवाल हैं। पहला, संबंधित जमीन का वास्तविक सीमांकन क्या है और उस पर किसका वैध अधिकार है? दूसरा, प्रस्तावित औद्योगिक गतिविधियों के लिए कौन-कौन सी अनुमतियां आवश्यक हैं और क्या उनका पालन किया गया है?
ग्रामसभा के प्रस्ताव का कानूनी प्रभाव भी भूमि की प्रकृति, लागू कानूनों और परियोजना पर लागू नियमों के आधार पर तय होगा। ऐसे में प्रशासन को केवल शिकायतों की संख्या नहीं, बल्कि संबंधित प्रस्ताव, राजस्व अभिलेख और अनुमतियों की वैधानिक स्थिति की भी जांच करनी चाहिए।
सरकारी जमीन पर कथित कब्जे की जांच की मांग
ग्रामीणों ने शासकीय राजस्व भूमि के खसरा नंबर 145 का नए सिरे से सीमांकन कराने की मांग की है। उनका कहना है कि राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जमीन की स्थिति स्पष्ट की जाए और यदि कंपनी का अवैध कब्जा पाया जाता है तो नियमानुसार उसे हटाकर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
भूमि सीमांकन इस विवाद का निर्णायक हिस्सा साबित हो सकता है। राजस्व अभिलेखों, नक्शे, मौके की वास्तविक स्थिति और संबंधित पक्षों के दस्तावेजों का मिलान किए बिना किसी जमीन पर अवैध कब्जे की पुष्टि नहीं की जा सकती।
यदि जांच में सरकारी भूमि पर अनधिकृत कब्जा मिलता है, तो प्रशासन को लागू नियमों के तहत कार्रवाई करनी होगी। वहीं, यदि सीमांकन में कोई विवाद या दस्तावेजी विसंगति सामने आती है, तो उसे भी स्पष्ट रिकॉर्ड के साथ सुलझाना जरूरी होगा। इससे भविष्य में भूमि स्वामित्व को लेकर पैदा होने वाले विवादों को कम किया जा सकता है।
पुरानी शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने से बढ़ी नाराजगी
ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने 6 अक्टूबर 2025 को तहसीलदार तमनार और एसडीएम घरघोड़ा के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की थी। इसके बाद नवंबर में ग्रामसभा के प्रस्ताव और कथित निर्माण गतिविधियों को लेकर भी आवेदन दिए गए। उनका दावा है कि इन शिकायतों पर अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है।
यदि शिकायतों पर समयबद्ध जांच नहीं होती, तो ग्रामीणों का प्रशासन पर भरोसा कमजोर हो सकता है। दूसरी ओर, उद्योग से जुड़े भूमि विवादों का समाधान लंबित रहने पर कंपनी की परियोजना भी अनिश्चितता में फंस सकती है। इसलिए समय रहते तथ्यात्मक जांच करना सभी पक्षों के हित में है।
प्रशासन के लिए बेहतर रास्ता यह होगा कि शिकायतों की तारीख, संबंधित अधिकारियों को दिए गए आवेदनों, उपलब्ध दस्तावेजों और अब तक हुई कार्रवाई का स्पष्ट रिकॉर्ड तैयार किया जाए। जांच की प्रगति के बारे में शिकायतकर्ताओं को जानकारी देने से अनावश्यक तनाव और अफवाहों की गुंजाइश भी घट सकती है।
औद्योगिक विकास और ग्रामीण अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी
रायगढ़ क्षेत्र में उद्योगों की मौजूदगी रोजगार, स्थानीय कारोबार और आर्थिक गतिविधियों के अवसर पैदा कर सकती है। लेकिन औद्योगिक विकास तभी टिकाऊ माना जा सकता है, जब जमीन की खरीद पारदर्शी हो, सरकारी भूमि सुरक्षित रहे और लागू पर्यावरणीय तथा प्रशासनिक नियमों का पालन किया जाए।
बड़गांव का मामला इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि ग्रामीणों की शिकायतों का समाधान केवल निर्माण कार्य की अनुमति या रोक तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जमीन की वास्तविक स्थिति, पेड़ों की कटाई से संबंधित अनुमतियां, भूमि उपयोग परिवर्तन और ग्रामसभा के प्रस्ताव की वैधानिक स्थिति जैसे पहलुओं पर अलग-अलग स्पष्टता जरूरी है।
यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी आरोप की पुष्टि नहीं होती, तो प्रशासन को उसके कारण और संबंधित रिकॉर्ड भी स्पष्ट करने चाहिए। निष्पक्ष जांच का उद्देश्य किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि अधिकारों और कानूनों की स्थिति को स्पष्ट करना होना चाहिए।
अब कलेक्टर की जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर नजर
बड़गांव के ग्रामीणों ने कलेक्टर से पूरे मामले की जांच कराने, खसरा नंबर 145 का सीमांकन करने, ग्रामसभा के प्रस्ताव के पालन को सुनिश्चित करने और जांच पूरी होने तक किसी भी ग्रामीण के खिलाफ पर्याप्त जांच के बिना एकतरफा कार्रवाई नहीं करने की मांग की है।
अब आगे की प्रक्रिया में राजस्व विभाग की रिपोर्ट, भूमि संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन और निर्माण व पेड़ों की कटाई से जुड़ी अनुमतियों की जांच महत्वपूर्ण होगी। प्रशासनिक स्तर पर समयबद्ध निर्णय से यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन गतिविधियों में नियमों का पालन हुआ और किन मामलों में सुधार या कार्रवाई की जरूरत है।
फिलहाल ग्रामीणों ने शिकायत के माध्यम से अपना पक्ष प्रशासन के सामने रखा है। आरोपों की पुष्टि होना अभी बाकी है। इस पूरे मामले का परिणाम बड़गांव के ग्रामीणों के जमीन संबंधी अधिकारों के साथ-साथ क्षेत्र में औद्योगिक परियोजनाओं के संचालन की पारदर्शिता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण रहेगा।



