अमेरिका में हाल ही में शुरू किया गया “प्रोजेक्ट फायरवॉल” अब भारतीय स्टूडेंट्स और वर्कर्स के बीच चर्चा का सबसे गर्म विषय बन चुका है। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य अमेरिकी सरकार के अनुसार “राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा सुरक्षा” को मजबूत करना है, लेकिन इसके असर से हजारों भारतीय छात्रों, H-1B वर्कर्स और ग्रीन कार्ड आवेदकों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।
क्या है प्रोजेक्ट फायरवॉल?
“प्रोजेक्ट फायरवॉल” अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) और इमिग्रेशन एजेंसी द्वारा तैयार किया गया एक सिस्टम-आधारित निगरानी अभियान है। इसका मकसद विदेशी नागरिकों, खासकर टेक और इंजीनियरिंग सेक्टर में काम कर रहे वीजा धारकों के डेटा, ऑनलाइन गतिविधि और रोजगार की वैधता पर नज़र रखना है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के तहत इमिग्रेशन अधिकारी अब स्टूडेंट वीजा (F1), H-1B, और L1 वीजा धारकों की जानकारी को नई डिजिटल तकनीकों से ट्रैक कर रहे हैं। इसमें सोशल मीडिया, प्रोफेशनल नेटवर्क (जैसे LinkedIn) और वर्क ईमेल्स तक की निगरानी की जा रही है।
भारतीय छात्रों पर असर
अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय छात्रों के लिए यह प्रोजेक्ट परेशानी का कारण बन गया है। जिन छात्रों ने OPT (Optional Practical Training) या STEM Extension लिया है, उन्हें अब अपने रोजगार की वैधता को बार-बार साबित करना पड़ रहा है। कई यूनिवर्सिटीज़ ने छात्रों को चेतावनी दी है कि वे फर्जी नौकरी या बिना दस्तावेज़ वाले प्रोजेक्ट्स से दूर रहें, वरना उनका वीजा रद्द हो सकता है।
भारतीय वर्कर्स पर दबाव
टेक कंपनियों में काम कर रहे भारतीय H-1B प्रोफेशनल्स भी इस नीति से प्रभावित हो रहे हैं। अब उन्हें यह साबित करना होगा कि उनकी नौकरी न केवल वैध है बल्कि अमेरिकी कानूनों के तहत आवश्यक भी है। इसके चलते कई H-1B आवेदनों की समीक्षा में देरी और रिजेक्शन दर बढ़ गई है।
क्यों बना विवाद?
कई इमिग्रेशन विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने इस प्रोजेक्ट की आलोचना की है। उनका कहना है कि “प्रोजेक्ट फायरवॉल” विदेशी वर्कर्स और छात्रों की निजता (Privacy) का उल्लंघन कर रहा है और अमेरिका को टैलेंट हब के रूप में कमजोर बना सकता है।
इसके अलावा, यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब अमेरिकी चुनाव नज़दीक हैं, और इमिग्रेशन पॉलिसीज़ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी हैं।
भारत की प्रतिक्रिया
भारत सरकार ने अमेरिका से इस विषय पर स्पष्टीकरण मांगा है और भारतीय मिशन वाशिंगटन में छात्रों की मदद के लिए एक “सपोर्ट डेस्क” भी शुरू किया गया है, जहां प्रभावित छात्र अपनी समस्याएं दर्ज करा सकते हैं।


