बच्चों को अपराधी नहीं, सुधार का मौका दें: CJI सूर्यकांत का बड़ा संदेश, जुवेनाइल जस्टिस में बदलाव पर जोर
किसी बच्चे से अपराध हो जाए, तो क्या उसकी पहचान हमेशा के लिए अपराधी की बन जानी चाहिए? या उसे अपनी गलती समझने, नुकसान की जिम्मेदारी लेने और समाज में दोबारा जगह बनाने का अवसर मिलना चाहिए? भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने किशोर न्याय व्यवस्था पर चर्चा के दौरान इसी बुनियादी सवाल को सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों से जुड़े मामलों में न्याय का उद्देश्य केवल आरोप और सजा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सुधार और पुनर्वास को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के दस वर्ष पूरे होने पर आयोजित राष्ट्रीय विचार-विमर्श में बच्चों के कानूनी अधिकारों, न्यायिक प्रक्रिया और पुनर्वास व्यवस्था की समीक्षा की गई। इस दौरान बच्चों के लिए प्रशिक्षित बचाव वकीलों की अलग व्यवस्था बनाने और न्याय प्रक्रिया के शुरुआती चरण से ही कानूनी सहायता उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया।
किशोर न्याय अधिनियम के 10 साल बाद क्या है सबसे बड़ी जरूरत?
किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 का मूल उद्देश्य कानून से संघर्ष की स्थिति में आए बच्चों और देखभाल एवं संरक्षण की जरूरत वाले बच्चों के लिए एक विशेष व्यवस्था उपलब्ध कराना है। यह व्यवस्था सामान्य आपराधिक न्याय प्रक्रिया से अलग दृष्टिकोण अपनाती है, क्योंकि बच्चों की उम्र, मानसिक और सामाजिक परिस्थितियां तथा सुधार की संभावनाएं महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
CJI सूर्यकांत ने अपने संबोधन में इस सोच को रेखांकित किया कि बच्चे को केवल उसके खिलाफ लगे आरोपों से नहीं पहचाना जाना चाहिए। उसके पारिवारिक माहौल, सामाजिक परिस्थितियों और व्यवहार को समझना भी जरूरी है।
इस दृष्टिकोण का अर्थ अपराध को नजरअंदाज करना नहीं है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जवाबदेही तय करते समय बच्चे के भविष्य और उसके सुधार की संभावना को भी ध्यान में रखा जाए।
बच्चों के लिए अलग वकीलों की विंग क्यों जरूरी?
किशोर न्याय व्यवस्था में कानूनी सहायता का महत्व केवल अदालत में पक्ष रखने तक सीमित नहीं है। पुलिस से शुरुआती संपर्क, पूछताछ, बोर्ड के सामने पेशी और पुनर्वास की प्रक्रिया के दौरान भी बच्चे को सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है।
CJI सूर्यकांत ने कानूनी सेवा संस्थानों से बच्चों के मामलों के लिए प्रशिक्षित बचाव पक्ष के वकीलों की अलग विंग बनाने पर विचार करने का आग्रह किया। उनका सुझाव है कि बच्चे को शुरुआत से ही समर्पित वकील मिले, जो पुलिस स्टेशन से लेकर अंतिम आदेश और पुनर्वास तक उसकी मदद कर सके।
इस व्यवस्था के कई व्यावहारिक फायदे हो सकते हैं:
- बच्चे और उसके परिवार को कानूनी अधिकारों की स्पष्ट जानकारी मिलेगी।
- शुरुआती चरण में ही उचित कानूनी सहायता उपलब्ध हो सकेगी।
- मामले से जुड़े तथ्यों और बच्चे की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से सामने रखा जा सकेगा।
- कानूनी प्रक्रिया के दौरान बच्चे को अनावश्यक डर, भ्रम और सामाजिक कलंक से बचाने में मदद मिल सकती है।
- अंतिम आदेश के बाद पुनर्वास और सामाजिक जीवन में वापसी पर भी ध्यान दिया जा सकेगा।
हालांकि, ऐसी व्यवस्था का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब प्रशिक्षित वकीलों की पर्याप्त संख्या, नियमित प्रशिक्षण और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जाए।
सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट क्यों है अहम?
किसी किशोर के खिलाफ आरोप सामने आने पर केवल घटना का विवरण पूरी तस्वीर नहीं बताता। यह जानना भी जरूरी हो सकता है कि बच्चे का पारिवारिक वातावरण कैसा है, उसकी शिक्षा की स्थिति क्या है, उसके व्यवहार पर किन परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा और उसे सुधारने के लिए किस तरह की सहायता की जरूरत है।
इसी संदर्भ में सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह रिपोर्ट किशोर न्याय बोर्ड को बच्चे की सामाजिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियों को समझने में मदद करती है।
CJI ने इस रिपोर्ट के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि कई बार यही दस्तावेज बोर्ड को यह समझने में मदद करता है कि आरोपों से परे वह बच्चा कौन है। इससे न्यायिक निर्णय में परिस्थितियों और सुधार की संभावनाओं को उचित स्थान मिल सकता है।
लेकिन रिपोर्ट की उपयोगिता उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करती है। यदि सामाजिक जांच सतही हो, जानकारी अधूरी हो या प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी हो, तो बच्चे की वास्तविक जरूरतों का सही आकलन करना कठिन हो सकता है। इसलिए बेहतर रिपोर्टिंग के साथ पर्याप्त सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रशिक्षित अधिकारियों की उपलब्धता भी जरूरी है।
गंभीर अपराधों में किशोरों के लिए क्या है नियम?
बच्चों को सुधार का अवसर देने की बात का अर्थ यह नहीं है कि कानून गंभीर अपराधों को नजरअंदाज करता है। किशोर न्याय अधिनियम में 16 से 18 वर्ष की उम्र के उन बच्चों के लिए विशेष प्रावधान हैं, जिन पर जघन्य अपराध का आरोप है।
ऐसे मामलों में कानून के तहत किशोर न्याय बोर्ड को निर्धारित प्रारंभिक आकलन करना होता है। इसमें बच्चे की मानसिक और शारीरिक क्षमता, अपराध के कथित परिणामों को समझने की योग्यता तथा घटना की परिस्थितियों जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है। कानूनी शर्तें पूरी होने पर मामला बालिगों के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया में भेजे जाने का निर्णय लिया जा सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है: किसी गंभीर आरोप का होना अपने आप यह तय नहीं करता कि किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा चलेगा। इसके लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया और आकलन का पालन आवश्यक है।
यही संतुलन किशोर न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है—पीड़ित को न्याय मिले, अपराध की गंभीरता को उचित महत्व दिया जाए और साथ ही बच्चे के अधिकारों तथा सुधार की संभावना की रक्षा भी हो।
रिस्टोरेटिव जस्टिस: गलती की जिम्मेदारी और सुधार का रास्ता
CJI सूर्यकांत ने सुधारात्मक न्याय (Restorative Justice) की अवधारणा पर भी जोर दिया। इसका मूल विचार यह है कि न्याय केवल यह तय करने तक सीमित न रहे कि नियम किसने तोड़ा और उसे क्या दंड मिले। यह भी समझा जाए कि नुकसान किसे हुआ, उस नुकसान की भरपाई कैसे संभव है और भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
किशोरों के मामलों में यह दृष्टिकोण विशेष महत्व रखता है। उचित और कानूनसम्मत परिस्थितियों में परामर्श, शिक्षा, व्यवहार सुधार और पुनर्वास की योजनाएं बच्चे को अपनी जिम्मेदारी समझने में मदद कर सकती हैं।
हालांकि, सुधारात्मक न्याय का अर्थ पीड़ित के अनुभव या नुकसान को कम करके देखना नहीं है। पीड़ित की सुरक्षा, गरिमा और न्याय की जरूरतों को भी समान महत्व देना आवश्यक है। किसी भी सुधार प्रक्रिया को कानून के अनुरूप और संबंधित पक्षों के अधिकारों का सम्मान करते हुए लागू किया जाना चाहिए।
आगे किशोर न्याय व्यवस्था में क्या बदलना चाहिए?
अधिनियम के दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर हुई चर्चा ने यह अवसर दिया है कि व्यवस्था की उपलब्धियों के साथ उसकी कमियों पर भी ध्यान दिया जाए। बच्चों को समय पर कानूनी सहायता, प्रभावी सामाजिक जांच और पुनर्वास उपलब्ध कराने के लिए केवल कानून में प्रावधान होना पर्याप्त नहीं है।
इसके लिए कुछ क्षेत्रों में निरंतर सुधार की जरूरत होगी:
- प्रशिक्षित कानूनी सहायता: बच्चों के मामलों को समझने वाले वकीलों की उपलब्धता बढ़ाना।
- बेहतर सामाजिक जांच: हर बच्चे की परिस्थितियों का गंभीरता से आकलन करना।
- प्रभावी पुनर्वास: शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, परामर्श और परिवार के सहयोग के माध्यम से समाज में वापसी आसान बनाना।
- संस्थागत जवाबदेही: किशोर न्याय बोर्ड, पुलिस, कानूनी सेवा संस्थानों और पुनर्वास एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत करना।
- सामाजिक कलंक कम करना: बच्चे की पहचान को उसके अतीत के आरोपों तक सीमित न रखना और कानून के अनुसार उसकी निजता की रक्षा करना।
इन प्रयासों की सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि बच्चों को उनके अधिकार कितनी प्रभावी ढंग से मिलते हैं, न्याय प्रक्रिया कितनी संवेदनशील बनती है और पुनर्वास के अवसर कितने वास्तविक होते हैं।



