जयशंकर का बड़ा बयान! रूस की पुरानी दोस्ती से लेकर ग्लोबल पावर तक, भारत के भविष्य पर खुला बड़ा राज
भारत और रूस के रिश्ते सिर्फ वर्तमान की रणनीतिक जरूरतों से बने संबंध नहीं हैं। इनके पीछे दशकों पुराना भरोसा, सुरक्षा सहयोग और ऐसे दौर की कूटनीतिक स्मृतियां हैं, जब भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दिल्ली में म्यूनिख लीडर्स मीटिंग के दौरान इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को सामने रखते हुए भारत-रूस संबंधों की अहमियत बताई।
लेकिन जयशंकर की टिप्पणी का दूसरा हिस्सा इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने आने वाले पांच से दस वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति पर बात करते हुए संकेत दिया कि दुनिया में शक्ति का संतुलन बदल रहा है और भारत के पास इस बदलाव में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कई आधार मौजूद हैं।
रूस के साथ रिश्ता सिर्फ आज की राजनीति से नहीं समझा जा सकता
जयशंकर ने भारत और रूस के संबंधों को 1950 के दशक से चली आ रही ऐतिहासिक साझेदारी से जोड़ते हुए कहा कि उस दौर की विरासत आज भी दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करती है।
उनके मुताबिक ऐसे समय भी रहे जब भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के सामने चुनौती थी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा था। जयशंकर ने विशेष रूप से उस दौर का उल्लेख किया जब पाकिस्तान में सैन्य शासन को दुनिया के कई हिस्सों से समर्थन मिल रहा था और रूस भारत के साथ खड़ा था।
यह इतिहास भारत की विदेश नीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में देशों की साझेदारी केवल वर्तमान व्यापार या रक्षा समझौतों से तय नहीं होती। पुराने संकटों के दौरान किस देश ने क्या भूमिका निभाई, इसका असर आने वाली पीढ़ियों की रणनीतिक सोच पर भी पड़ता है।
लेकिन भारत-रूस संबंधों की असली परीक्षा बदलती दुनिया में है
आज वैश्विक परिस्थितियां 1950 या 1970 के दशक जैसी नहीं हैं। रूस के साथ भारत के संबंधों के साथ-साथ भारत के अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ भी व्यापक रणनीतिक संबंध हैं।
ऐसे माहौल में भारत की विदेश नीति का लक्ष्य किसी एक शक्ति-गुट के साथ पूरी तरह जुड़ना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के लिए अलग-अलग साझेदारियों को संतुलित करना है।
इसी संदर्भ में रूस के साथ पुराने संबंधों की जयशंकर की चर्चा को देखा जाना चाहिए। ऐतिहासिक भरोसा महत्वपूर्ण है, लेकिन आने वाले वर्षों में इन संबंधों की उपयोगिता इस बात से तय होगी कि दोनों देश रक्षा, ऊर्जा, तकनीक, व्यापार और बदलती भू-राजनीति में किस तरह सहयोग करते हैं।
अगले 5 से 10 साल में भारत कहां पहुंचेगा?
म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में जब जयशंकर से पूछा गया कि अगले पांच से दस वर्षों में वैश्विक व्यवस्था में भारत की जगह क्या होगी, तो उन्होंने किसी निश्चित रैंकिंग का दावा करने के बजाय भारत की विकास क्षमता पर जोर दिया।
उनका तर्क था कि भारत के सामने आने वाले दशकों में तेज आर्थिक विकास की संभावना है और देश की जनसांख्यिकीय संरचना इस विकास को सहारा दे सकती है।
यह बात महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि किसी देश की वैश्विक ताकत केवल उसकी सेना या GDP से तय नहीं होती। बड़ी और कामकाजी आबादी, उत्पादकता, तकनीकी क्षमता, बुनियादी ढांचा, शिक्षा और रोजगार के अवसर—ये सभी मिलकर किसी देश की वास्तविक शक्ति बनाते हैं।
भारत के लिए चुनौती यही है कि बड़ी युवा आबादी को केवल जनसंख्या के आंकड़े से आर्थिक ताकत में बदला जाए।
युवा आबादी तभी ताकत बनेगी जब रोजगार और कौशल साथ चलें
भारत के पास बड़ा demographic advantage है, लेकिन यह अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है।
अगर युवाओं को बेहतर शिक्षा, आधुनिक कौशल, पर्याप्त रोजगार और उद्यमिता के अवसर मिलते हैं तो यही आबादी आर्थिक विकास को लंबे समय तक गति दे सकती है। लेकिन अगर रोजगार की वृद्धि आबादी की गति के साथ नहीं चलती, तो यही demographic advantage दबाव में बदल सकता है।
इसलिए भारत की अगली छलांग का सवाल केवल यह नहीं है कि देश की आबादी कितनी युवा है। बड़ा सवाल यह है कि भारत उस युवा आबादी को कितनी तेजी से उत्पादक मानव पूंजी में बदल पाता है।
भारत को पुराने औद्योगीकरण मॉडल की हूबहू नकल क्यों नहीं करनी चाहिए?
जयशंकर ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभर रहे नए अवसरों की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि भारत के लिए जरूरी नहीं कि वह वही पारंपरिक औद्योगीकरण मॉडल अपनाए, जिसे पहले की अर्थव्यवस्थाओं ने अपनाया था।
यह विचार मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था में खासा प्रासंगिक है।
आज आर्थिक विकास का मतलब केवल बड़े कारखाने और भारी उद्योग नहीं रह गया है। डिजिटल सेवाएं, artificial intelligence, semiconductor ecosystem, green technology, advanced manufacturing, biotechnology, space economy और global services जैसे क्षेत्र विकास के नए रास्ते खोल रहे हैं।
भारत के सामने अवसर यह है कि वह पारंपरिक manufacturing क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ नई अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में भी वैश्विक स्तर की भूमिका बनाए।
‘मिडिल पावर’ देशों की राह एक जैसी नहीं होगी
जयशंकर ने वैश्विक शक्ति संतुलन पर एक महत्वपूर्ण बात कही—आज जिन देशों को broadly ‘middle powers’ की श्रेणी में रखा जाता है, जरूरी नहीं कि वे भविष्य में एक ही गति से आगे बढ़ें।
कुछ देश तेजी से ऊपर जा सकते हैं, कुछ अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रख सकते हैं और कुछ अपेक्षाकृत पीछे रह सकते हैं।
यही आने वाले वैश्विक बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक हो सकती है। दुनिया में शक्ति का संतुलन केवल दो या तीन बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा से तय नहीं होगा। कई मध्यम और उभरती शक्तियां भी क्षेत्रीय और वैश्विक संस्थाओं में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश करेंगी।
भारत के लिए इसका अर्थ है कि केवल बड़ी अर्थव्यवस्था बनना पर्याप्त नहीं होगा। उसे तकनीक, रक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीति, व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में प्रभाव—हर मोर्चे पर अपनी क्षमता बढ़ानी होगी।
भारत के सामने अवसर बड़ा है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
भारत के लिए अगले दशक में वैश्विक भूमिका मजबूत करने के कई अवसर हैं। लेकिन इसके लिए घरेलू स्तर पर कुछ कठिन सवालों का समाधान भी जरूरी होगा।
शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार, कौशल विकास, विनिर्माण क्षमता, अनुसंधान, बुनियादी ढांचा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्र सीधे भारत की वैश्विक शक्ति से जुड़े हैं।
इसके अलावा वैश्विक व्यापार में बढ़ता संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव और supply chains का पुनर्गठन भी भारत के लिए अवसर और जोखिम दोनों लेकर आएगा।
अगर भारत इन बदलावों को अपने पक्ष में मोड़ पाता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका और व्यापक हो सकती है। लेकिन इसके लिए केवल तेज GDP growth नहीं, बल्कि विकास की गुणवत्ता और उसकी स्थिरता भी जरूरी होगी।
रूस से रिश्ते और भारत की नई कूटनीति—दोनों साथ चलेंगे
जयशंकर के बयान का सबसे व्यापक संदेश यही है कि भारत अपनी विदेश नीति को इतिहास और भविष्य—दोनों के आधार पर देख रहा है।
रूस के साथ पुराने संबंध भारत की रणनीतिक स्मृति का हिस्सा हैं। वहीं अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया और इंडो-पैसिफिक के साथ बढ़ते संबंध भारत की वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को दर्शाते हैं।
भारत के लिए चुनौती किसी एक पक्ष को चुनना नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना है।
आने वाले पांच से दस वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति इस बात से तय होगी कि वह अपनी आर्थिक क्षमता को कितनी तेजी से रणनीतिक प्रभाव में बदलता है। जयशंकर का बयान इसी व्यापक बदलाव की ओर संकेत करता है—जहां भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा बनने की बात नहीं कर रहा, बल्कि उसमें अपनी जगह को लगातार बड़ा करने की क्षमता पर जोर दे रहा है।



