CEC ज्ञानेश कुमार पर बढ़ा बड़ा कानूनी संकट! सुप्रीम कोर्ट में कल होगी सुनवाई, SIR के 14 फैसलों पर उठे सवाल
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंच चुका है। 5 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ दो याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं।
मामले की अहमियत सिर्फ इस वजह से नहीं है कि याचिकाएं मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हैं। असली संवैधानिक सवाल यह है कि बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग में निर्णय लेने की प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए और क्या आयोग के नाम पर ऐसे फैसले लिए जा सकते हैं, जिन पर उसके अन्य सदस्यों की सहमति को लेकर विवाद हो।
14 फैसलों को लेकर क्या है विवाद?
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े करीब 14 फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए या उन पर उनकी आपत्तियां थीं। याचिकाओं में दावा है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच ऐसे मामलों पर आपत्तियां दर्ज की गई थीं।
इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि अदालत यह स्पष्ट करे कि निर्वाचन आयोग जैसे बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय के निर्णय किस प्रक्रिया के तहत वैध माने जाएंगे।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये याचिकाकर्ताओं के आरोप हैं, अदालत का निष्कर्ष नहीं। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग का कहना है कि SIR और Form-6 से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।
याचिकाओं में क्या-क्या मांग की गई है?
मामला केवल 14 फैसलों को चुनौती देने तक सीमित नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने कई स्तरों पर राहत मांगी है।
इनमें विवादित फैसलों को रद्द करने, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अंतरिम तौर पर उनके पद से निलंबित करने और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग शामिल है। एक याचिका में सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में जांच व्यवस्था बनाने तथा साइबर सुरक्षा और IT विशेषज्ञों को उसमें शामिल करने की मांग भी की गई है।
याचिकाओं में ECINet और ERONet जैसे चुनावी डेटाबेस के फोरेंसिक ऑडिट की मांग भी उठाई गई है।
मतदाता सूची का मुद्दा क्यों सबसे संवेदनशील है?
चुनाव प्रक्रिया में मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है। यही वह आधार है जिसके जरिए यह तय होता है कि चुनाव में कौन मतदान कर सकता है।
याचिकाओं में SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के दावे किए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने करीब 13 करोड़ नामों के हटने से जुड़ी परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
लेकिन यहां भी आंकड़े और आरोपों के बीच अंतर करना जरूरी है। अदालत के सामने यह तय करना महत्वपूर्ण होगा कि कितने नाम क्यों हटाए गए, उनमें कितने अपात्र या डुप्लीकेट थे, कितने मामलों में प्रक्रिया का पालन हुआ और पात्र मतदाताओं को सुधार या अपील का पर्याप्त अवसर मिला या नहीं।
यही वह बिंदु है जहां तकनीकी प्रक्रिया सीधे नागरिक के मतदान अधिकार से जुड़ जाती है।
मामला CEC के खिलाफ व्यक्तिगत कार्रवाई से कहीं बड़ा
पहली नजर में यह विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिखाई देता है, लेकिन कानूनी दृष्टि से इसका दायरा कहीं बड़ा है।
यदि अदालत इस मामले में निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया, बहुसदस्यीय निकाय की भूमिका और सदस्यों के बीच मतभेद होने की स्थिति को लेकर कोई महत्वपूर्ण व्याख्या करती है, तो उसका असर भविष्य के चुनावी प्रशासन पर भी पड़ सकता है।
दूसरे शब्दों में, सवाल केवल यह नहीं है कि किसी खास फैसले में क्या हुआ। सवाल यह भी है कि संवैधानिक संस्था के भीतर निर्णय लेने की संस्थागत व्यवस्था कितनी पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए।
क्या सुप्रीम कोर्ट तुरंत CEC को निलंबित कर सकता है?
याचिकाकर्ताओं ने अंतरिम राहत के रूप में ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग की है। लेकिन यह मांग अपने आप में अदालत के आदेश का संकेत नहीं है।
5 अक्टूबर की सुनवाई में अदालत पहले याचिकाओं की वैधता, उठाए गए कानूनी सवालों और उपलब्ध सामग्री को देख सकती है। अदालत क्या अंतरिम आदेश देती है या आगे की सुनवाई के लिए क्या दिशा तय करती है, यह सुनवाई के दौरान ही स्पष्ट होगा।
इसीलिए अभी यह कहना कि CEC के खिलाफ कोई कार्रवाई तय है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
जांच और FIR की मांग भी याचिकाओं में शामिल
याचिकाकर्ताओं ने ज्ञानेश कुमार के अलावा वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, IT से जुड़े अधिकारी सीमा खन्ना और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग भी की है।
इसके लिए Representation of the People Act, 1950 की धारा 32 के तहत कार्रवाई की मांग का उल्लेख याचिकाओं में किया गया है।
लेकिन किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप और अपराध सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी भी आपराधिक कार्रवाई के लिए उपलब्ध साक्ष्य, जांच और लागू कानून की कसौटी निर्णायक होगी।
कल की सुनवाई पर क्यों रहेंगी नजरें?
5 अक्टूबर की सुनवाई से तीन बड़े सवालों पर आगे की दिशा मिल सकती है।
पहला, क्या निर्वाचन आयोग के बहुसदस्यीय ढांचे में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट विस्तृत विचार करेगा?
दूसरा, SIR से जुड़े विवादित फैसलों और मतदाता सूची के डेटा को लेकर स्वतंत्र जांच या रिकॉर्ड की जांच की जरूरत अदालत महसूस करती है या नहीं?
तीसरा, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मांगी गई अंतरिम राहत पर अदालत किस दृष्टिकोण से आगे बढ़ती है?
इन सवालों का जवाब सिर्फ मौजूदा विवाद के लिए महत्वपूर्ण नहीं होगा। निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वायत्तता, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया में जनता के भरोसे के लिए भी इसका दूरगामी महत्व हो सकता है।



