नई दिल्ली — भारत सरकार ने 2025-26 के नए सीज़न (अक्टूबर से शुरू) के लिए 1.5 मिलियन टन (15 लाख टन) चीनी निर्यात की मंजूरी दे दी है। साथ ही, मोलास्सेज़ (शीरा) पर 50% निर्यात शुल्क को हटा दिया गया है, जिससे चीनी मिलों को अतिरिक्त राहत मिल सकती है।
क्या है पृष्ठभूमि और वजह
इस अनुमति का कारण घरेलू बाजार में अतिरिक्त स्टॉक (सरप्लस) है।
पिछले सीज़न में, गन्ने से बनी चीनी का केवल एक हिस्सा ही इथेनॉल उत्पादन में गया। इस बार इथेनॉल डायवर्जन कम रहने की उम्मीद है और इसलिए स्टॉक बढ़े हैं।
इस नीति का एक लक्ष्य गन्ना किसानों को भी लाभ पहुंचाना है।
एक्सपोर्ट कोटा का बंटवारा और अवधि
यह निर्यात कोटा चीनी मिलों को उनके पिछले तीन सीज़न के औसत उत्पादन के हिसाब से आवंटित किया गया है।
मिलों को यह कोटा 30 सितंबर, 2026 तक इस्तेमाल करने की अनुमति है। यदि कोई मिल अपना कोटा इस्तेमाल नहीं करना चाहती है, तो वह इसे मार्च 2026 तक छोड़ सकती है, और बचे हुए हिस्से को फिर से आवंटित किया जा सकता है।
शेयर बाजार पर असर — कौन-सी कंपनियां फायदेमंद हो सकती हैं?
इस कदम की घोषणा के बाद, कुछ प्रमुख चीनी मिल कंपनियों के शेयरों में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी जा रही है:
बालरामपुर चीनी मिल्स (Balrampur Chini Mills) — एक्सपोर्ट की संभावना बढ़ने से उनकी वित्तीय स्थिति मज़बूत हो सकती है।
ईआईडी पैर्री (EID Parry) — निर्यात कोटा और अतिरिक्त मांग से उन्हें लाभ मिल सकता है।
दलमिया भारत (Dalmia Bharat Sugar) — निर्यात बढ़ने से उनकी उत्पादन इकाइयों को बेहतर लाभ मिल सकता है।
श्री रेणुका शुगर (Shree Renuka Sugars) — मोलास्सेज़ पर टैक्स हटने के कारण उनके बाय-प्रोडक्ट (मोलास्सेज़) व्यवसाय को भी फायदा हो सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम मिलों को कैश फ्लो बढ़ाने, स्टॉक मैनेजमेंट में मदद देने, और गन्ना किसानों के बकाये हुए भुगतानों की स्थिति सुधारने में सहायक रहेगा।
चुनौतियाँ और जोखिम
इसके बावजूद, कुछ विशेषज्ञों को चिंता है कि वैश्विक चीनी के दाम पहले से ही काफी कम हैं, जो निर्यात व्यवहार्यता को सीमित कर सकते हैं।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरती रहीं, तो मिलों को निर्यात के ज़रिए लाभ तो मिल सकता है, लेकिन मार्जिन बहुत बड़ा न हो।
लॉजिस्टिक और निर्यात खर्च भी मिलों की कुल कमाई पर असर डाल सकते हैं।


