सोना-चांदी और कच्चे तेल में गिरावट: बाजार में क्यों बदला रुख, आगे क्या रहेगा असर?
नई दिल्ली। पिछले सप्ताह मजबूती दिखाने के बाद सोमवार, 21 सितंबर को कमोडिटी बाजार में तस्वीर कुछ बदली हुई नजर आई। घरेलू वायदा बाजार में सोने और चांदी पर बिकवाली का दबाव दिखाई दिया, वहीं कच्चे तेल की कीमतें भी नीचे आईं। यह गिरावट ऐसे समय हुई है जब वैश्विक बाजार पहले से ही अमेरिकी ब्याज दरों, डॉलर, बॉन्ड यील्ड और पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों को लेकर सतर्क है।
MCX पर अक्टूबर डिलीवरी वाला सोना एक समय ₹1,53,608 प्रति 10 ग्राम तक आ गया, जो पिछले बंद भाव से ₹773 यानी करीब 0.5% नीचे था। चांदी के दिसंबर वायदा भाव में ₹2,024 की गिरावट दर्ज हुई और यह ₹2,39,579 प्रति किलोग्राम पर पहुंचा। दूसरी ओर अक्टूबर डिलीवरी वाला कच्चा तेल करीब 1.5% फिसलकर ₹9,085 प्रति बैरल रहा।
लेकिन इन आंकड़ों को केवल एक दिन की सामान्य गिरावट समझना बाजार की पूरी तस्वीर नहीं बताता।
सोने की कीमत क्यों फिसली?
सोना आम तौर पर अनिश्चितता के समय सुरक्षित निवेश माना जाता है। इसके बावजूद सोमवार को इसकी कीमतों पर दबाव आया। इसकी एक वजह यह रही कि अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड में मजबूती ने सोने की आकर्षकता पर असर डाला। सोने पर ब्याज नहीं मिलता, इसलिए जब बॉन्ड जैसे ब्याज देने वाले निवेशों से मिलने वाला रिटर्न आकर्षक होता है तो कुछ निवेशक कीमती धातुओं से पैसा निकाल सकते हैं।
इसके अलावा, पिछले सप्ताह की तेजी के बाद कुछ निवेशकों की ओर से मुनाफावसूली भी देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने की कीमत नीचे आई। रॉयटर्स के अनुसार सोमवार को स्पॉट गोल्ड करीब 0.6% गिरकर 4,349.99 डॉलर प्रति औंस रहा।
इसका मतलब यह नहीं है कि सोने की तेजी की कहानी खत्म हो गई है। मौजूदा बाजार में एक साथ कई ताकतें काम कर रही हैं—एक तरफ भू-राजनीतिक तनाव सोने को सहारा देता है, दूसरी तरफ ऊंची यील्ड और ब्याज दरों की संभावना उस पर दबाव डालती है।
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चांदी में सोने से ज्यादा उतार-चढ़ाव क्यों?
चांदी का व्यवहार सोने से कुछ अलग है। इसे निवेश कीमती धातु के साथ-साथ औद्योगिक धातु के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए चांदी की कीमत पर निवेश मांग के अलावा औद्योगिक गतिविधियों की उम्मीद का भी असर पड़ता है।
MCX पर दिसंबर चांदी वायदा सोमवार को करीब 0.84% नीचे ₹2,39,579 प्रति किलोग्राम रहा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चांदी कमजोर हुई।
पिछले सप्ताह चांदी में करीब 3% की तेजी दर्ज हुई थी। ऐसे में सोमवार की गिरावट को आंशिक मुनाफावसूली और कमजोर वैश्विक रुख के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित है। बाजार में लगातार तेजी के बाद छोटी अवधि के कारोबारी अक्सर अपने मुनाफे को सुरक्षित करने के लिए बिकवाली करते हैं।
कच्चा तेल 100 डॉलर के नीचे, भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
कच्चे तेल की चाल भारत के लिए सोने-चांदी से अलग तरह से महत्वपूर्ण है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में लंबे समय तक राहत मिलने पर आयात बिल, पेट्रोलियम उत्पादों की लागत और महंगाई के दबाव पर असर पड़ सकता है।
सोमवार को वैश्विक बाजार में WTI क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे करीब 98.60 डॉलर पर था, जबकि ब्रेंट क्रूड करीब 102.22 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
हालांकि, केवल एक दिन की गिरावट से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि तेल अब लगातार सस्ता होने वाला है। पश्चिम एशिया की स्थिति, आपूर्ति बाधाएं और कूटनीतिक घटनाक्रम आने वाले दिनों में कीमतों को फिर प्रभावित कर सकते हैं।
एक तरफ सोना कमजोर, दूसरी तरफ भू-राजनीतिक जोखिम
मौजूदा बाजार की सबसे दिलचस्प बात यही है कि भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद सोने में गिरावट देखी गई। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे तनाव सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ा सकते हैं।
लेकिन कमोडिटी बाजार में कोई एक कारक हमेशा निर्णायक नहीं होता। इस समय निवेशकों को भू-राजनीतिक जोखिम के साथ अमेरिकी मौद्रिक नीति, डॉलर और बॉन्ड यील्ड भी प्रभावित कर रहे हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार सोमवार को सोने पर मजबूत डॉलर और मुनाफावसूली का असर रहा, जबकि तेल में गिरावट ने महंगाई संबंधी कुछ दबाव कम किया।
यही वजह है कि आने वाले दिनों में सोने की दिशा केवल युद्ध या तनाव की खबरों से तय नहीं होगी।
भारतीय बाजार पर क्या असर पड़ सकता है?
भारतीय निवेशकों के लिए सोने-चांदी की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय भाव पर निर्भर नहीं करती। रुपये और डॉलर की विनिमय दर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
रुपया कमजोर होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना स्थिर रहने के बावजूद भारत में उसकी कीमत पर ऊपर की ओर दबाव आ सकता है। इसके उलट रुपये में मजबूती घरेलू कीमतों को कुछ राहत दे सकती है।
कच्चे तेल के मामले में भी यही बात महत्वपूर्ण है। भारत के लिए तेल महंगा होने का असर आयात बिल और व्यापक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। सोमवार को रुपये पर भी तेल कीमतों और विदेशी पूंजी प्रवाह से जुड़े कारकों का प्रभाव बाजार में देखा जा रहा था।
क्या सोना-चांदी अभी और सस्ता होगा?
इस सवाल का सीधा जवाब देना मुश्किल है। मौजूदा बाजार में कीमतें कई परस्पर विरोधी संकेतों के बीच चल रही हैं।
अगर अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड मजबूत बने रहते हैं तथा ब्याज दरों में आगे सख्ती की आशंका बढ़ती है, तो सोने और चांदी पर दबाव जारी रह सकता है। इसके विपरीत, अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है या बाजार में ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद मजबूत होती है, तो कीमती धातुओं को फिर समर्थन मिल सकता है।
चांदी के मामले में औद्योगिक मांग भी महत्वपूर्ण संकेतक रहेगी।
निवेशकों के लिए सबसे अहम संकेत
सोमवार की गिरावट को देखकर केवल इस आधार पर बड़ा निवेश निर्णय लेना जोखिमपूर्ण हो सकता है। बाजार में फिलहाल तेज उतार-चढ़ाव है और अलग-अलग समय पर सोने-चांदी के भाव में बदलाव भी देखा गया है। उदाहरण के लिए, सुबह के कारोबार में MCX सोना और चांदी पहले कमजोर हुए, जबकि बाद की ट्रेडिंग में भी कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव जारी रहा।
इसलिए खुदरा खरीदारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि MCX का वायदा भाव और स्थानीय सर्राफा बाजार का खुदरा भाव एक जैसा नहीं होता। खुदरा कीमत में शुद्धता, स्थानीय मांग, GST और मेकिंग चार्ज जैसे तत्व भी शामिल होते हैं।
आगे बाजार की दिशा किन चीजों से तय होगी?
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से इन संकेतकों पर रहेगी:
- अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड
- अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर संबंधी दिशा
- पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक घटनाक्रम
- कच्चे तेल की वैश्विक कीमत
- रुपये की डॉलर के मुकाबले चाल
- सोने और चांदी की भौतिक तथा निवेश मांग
- प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के महंगाई और आर्थिक आंकड़े



