छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में बड़ा खुलासा: 183 करोड़ के भुगतान पर सवाल, कर्मचारियों के हक और सरकारी खजाने की जांच तेज
छत्तीसगढ़ के कथित शराब घोटाले में अब सरकारी शराब दुकानों पर काम करने वाले कर्मचारियों के नाम पर हुए भुगतान जांच के केंद्र में हैं। ACB-EOW ने करीब 182.98 करोड़ रुपये के मैनपावर भुगतान से जुड़े मामले में CSMCL के तत्कालीन प्रबंध संचालक अरुणपति त्रिपाठी और एजेंसी संचालक बीआर लोहिया के खिलाफ पूरक चालान पेश किया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि पांच कंपनियों ने ओवरटाइम, बोनस और अतिरिक्त दिनों के काम के नाम पर निगम से रकम हासिल की, लेकिन कर्मचारियों तक उसका पूरा भुगतान नहीं पहुंचा।
यह मामला केवल सरकारी धन के कथित दुरुपयोग तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में वे कर्मचारी भी हैं, जिनके नाम पर भुगतान दर्ज होने के बावजूद उन्हें उस राशि का लाभ मिलने का दावा जांच में विवादित बताया गया है। अदालत में आरोप साबित होना बाकी है, लेकिन मामले ने सरकारी ठेकों, बिलों के सत्यापन और श्रमिकों के भुगतान की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
183 करोड़ रुपये का मामला आखिर इतना अहम क्यों है?
जांच एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2019 से 2023 के बीच पांच मैनपावर कंपनियों को ओवरटाइम, बोनस, चार अतिरिक्त दिनों के काम और इन मदों पर सेवा शुल्क सहित लगभग 182.98 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया गया। आरोप है कि कंपनियों ने कर्मचारियों के नाम पर बिल तैयार कर निगम से भुगतान लिया, जबकि संबंधित कर्मचारियों को अतिरिक्त रकम नहीं मिली।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भुगतान की प्रक्रिया में कर्मचारियों के वास्तविक काम और उन्हें मिली रकम का मिलान किस तरह किया गया। यदि बिलों में दर्ज राशि और कर्मचारियों के बैंक खातों में पहुंचे पैसे के बीच अंतर था, तो उसे समय रहते पकड़ने के लिए जिम्मेदार व्यवस्था की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
सरकारी संस्थानों में ठेके पर कर्मचारियों की नियुक्ति आम व्यवस्था है। इसमें निगम, मैनपावर एजेंसी और कर्मचारी के बीच जिम्मेदारियां बंटी होती हैं। ऐसी व्यवस्था में केवल कंपनी का बिल मंजूर कर देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। भुगतान से पहले उपस्थिति, अतिरिक्त कार्य के आदेश, निर्धारित दरों और वास्तविक वेतन वितरण का सत्यापन भी जरूरी है।
कर्मचारियों के नाम पर पैसा, लेकिन लाभ किसे मिला?
ACB-EOW के मुताबिक, कर्मचारियों ने अपने बयानों में कहा कि उन्हें सामान्य मासिक वेतन मिलता था, लेकिन उनके नाम पर दर्ज अतिरिक्त भुगतान नहीं मिला। जांच एजेंसी का आरोप है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत पहले कर्मचारियों को संबंधित राशि दी जानी थी और उसके बाद निगम से भुगतान प्राप्त किया जाना था।
यदि यह आरोप अदालत में प्रमाणित होते हैं, तो मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं रहेगा। यह उन कर्मचारियों के अधिकारों से भी जुड़ जाएगा, जिनकी मेहनत और अतिरिक्त काम के आधार पर भुगतान का दावा किया गया था।
ऐसे मामलों में एक व्यावहारिक समस्या यह भी होती है कि कर्मचारी ठेका एजेंसी पर निर्भर रहते हैं। भुगतान से जुड़ी शिकायत करने पर नौकरी, ड्यूटी या भविष्य के रोजगार को लेकर आशंका हो सकती है। इसलिए प्रभावी निगरानी के लिए कर्मचारियों के बैंक खातों में सीधे भुगतान, डिजिटल उपस्थिति और स्वतंत्र शिकायत व्यवस्था जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
त्रिपाठी के कार्यकाल में 152.40 करोड़ रुपये का भुगतान
आरोपों के अनुसार, अरुणपति त्रिपाठी 9 मई 2019 से 16 अप्रैल 2023 तक CSMCL के प्रबंध संचालक थे। जांच एजेंसी का दावा है कि इस अवधि में पांचों कंपनियों को लगभग 152.40 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान हुआ।
इस राशि में करीब 82.66 करोड़ रुपये ओवरटाइम, 12.21 करोड़ रुपये बोनस, 45.02 करोड़ रुपये चार अतिरिक्त दिनों के काम और 12.51 करोड़ रुपये सेवा शुल्क से संबंधित बताए गए हैं।
ACB-EOW ने आरोप लगाया है कि निविदा की शर्तों में बदलाव और अतिरिक्त भुगतान की व्यवस्था के पीछे कथित तौर पर एक व्यापक तंत्र काम कर रहा था। एजेंसी के मुताबिक, इस प्रक्रिया में कमीशन के लेन-देन भी शामिल थे। हालांकि, इन आरोपों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका पर अंतिम निर्णय अदालत में साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगा।
यहां जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रशासनिक जवाबदेही भी है। बड़े सरकारी भुगतान में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि फाइल पर किसने हस्ताक्षर किए। यह पता लगाना भी जरूरी होता है कि भुगतान के लिए कौन-से दस्तावेज इस्तेमाल हुए, सत्यापन किस स्तर पर हुआ और आपत्तियों या विसंगतियों को किसने मंजूरी दी।
पांच कंपनियां और कथित कमीशन का नेटवर्क
जांच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि मैनपावर कंपनियों से नकद कमीशन एकत्र करने और उसे संबंधित लोगों तक पहुंचाने में कई व्यक्तियों की भूमिका थी। एजेंसी के दावे के अनुसार, त्रिपाठी के कार्यकाल में करीब 28 से 32 करोड़ रुपये कमीशन के रूप में लिए गए और कथित तौर पर अनवर ढेबर तक पहुंचाए गए।
जांच में अक्टूबर 2019 से मार्च 2023 के बीच सुमीत फैसिलिटीज की ओर से लगभग 15.65 करोड़ रुपये दिए जाने की जानकारी भी शामिल बताई गई है। ये आंकड़े जांच एजेंसी के आरोपों का हिस्सा हैं, न कि अदालत से प्रमाणित निष्कर्ष।
इस मामले का व्यापक महत्व यह है कि यदि सरकारी भुगतान के बदले कमीशन देने का आरोप सही साबित होता है, तो उससे निविदा प्रक्रिया की निष्पक्षता और सरकारी खरीद प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। ठेकेदारों के चयन से लेकर बिलों की मंजूरी तक पारदर्शिता बनाए रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से है।
ईगल हंटर और अलर्ट कमांडोज के भुगतान पर भी सवाल
ACB-EOW के अनुसार, ईगल हंटर सॉल्यूशन लिमिटेड और अलर्ट कमांडोज प्राइवेट लिमिटेड को मिलाकर लगभग 48.08 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान हुआ। जांच एजेंसी का आरोप है कि कर्मचारियों के ओवरटाइम और चार अतिरिक्त दिनों के काम के बिल तैयार किए गए, लेकिन निगम से रकम मिलने के बाद संबंधित कर्मचारियों को उसका भुगतान नहीं किया गया।
एजेंसी ने यह भी दावा किया है कि इन दोनों कंपनियों को मिली अतिरिक्त राशि में से करीब 38.32 करोड़ रुपये त्रिपाठी के कार्यकाल के दौरान दिए गए थे।
चालान में नवंबर 2023 के एक कथित कमीशन लेन-देन का भी उल्लेख है। जांच एजेंसी के मुताबिक, लंबित बिलों को पास कराने के बदले तत्कालीन उप महाप्रबंधक नवीन प्रताप सिंह तोमर को लगभग 28.80 लाख रुपये दिए जाने थे। एजेंसी के विवरण के अनुसार, इस रकम को पहुंचाने से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के दौरान राशि बरामद हुई थी।
इन घटनाओं की न्यायिक जांच में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित रकम किस उद्देश्य से भेजी गई थी, भुगतान प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका थी और उपलब्ध दस्तावेजों तथा बयानों से आरोपों की कितनी पुष्टि होती है।
आंगड़िया नेटवर्क और संपत्ति में निवेश के आरोप
जांच एजेंसी ने पूरक चालान में आंगड़िया नेटवर्क के माध्यम से नकदी मुंबई और हैदराबाद भेजे जाने से संबंधित बयान भी शामिल किए हैं। एजेंसी के मुताबिक, महमूद अहमद खान ने वर्ष 2019 से 2022 के बीच पी. विजय कंपनी तक लगभग 60 से 70 करोड़ रुपये पहुंचाने की बात कही। यह रकम अरुणपति त्रिपाठी की बताई गई है।
इसके अलावा, जांच में आरोप लगाया गया है कि कथित अवैध रकम का एक हिस्सा बेंगलुरु की पेंथियान बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से संपत्ति में लगाया गया। चालान के मुताबिक, इस रकम में से तीन करोड़ रुपये प्रवर्तन निदेशालय ने जब्त किए हैं।
ऐसे आरोपों में धन के स्रोत और उसके अंतिम उपयोग का पता लगाना जांच का अहम हिस्सा होता है। बैंक रिकॉर्ड, कंपनी के वित्तीय दस्तावेज, नकदी लेन-देन से जुड़े बयान और संपत्ति के स्वामित्व संबंधी कागजात को आपस में मिलाकर ही किसी कथित वित्तीय नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
42 आरोपी, छठा पूरक चालान और आगे की कानूनी प्रक्रिया
बचाव पक्ष के वकील फैजल रिजवी के अनुसार, जांच एजेंसी ने छठा पूरक चालान पेश किया है, जिसमें कुल 42 लोगों को आरोपी बनाया गया है। मामले में पहले 12 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
अरुणपति त्रिपाठी फिलहाल न्यायिक अभिरक्षा में हैं। जांच एजेंसी के मुताबिक, बीआर लोहिया विदेश में हैं और पूछताछ के लिए उपस्थित नहीं होने के बाद उनके खिलाफ फरारी पंचनामा तैयार कर चालान पेश किया गया है। एजेंसी ने उनके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी होने और आगे की कार्रवाई में इंटरपोल का सहयोग लेने की बात कही है।
मामले की अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को निर्धारित बताई गई है। पूरक चालान दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी आरोप साबित हो गए हैं। अब न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों, गवाहों और बचाव पक्ष की दलीलों का परीक्षण होना बाकी है।
आगे क्या बदलना चाहिए?
इस मामले से निकलने वाला सबसे बड़ा प्रशासनिक सबक यह है कि सरकारी ठेकों में भुगतान की निगरानी केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह सकती। कर्मचारियों के नाम पर जारी अतिरिक्त राशि का स्वतंत्र सत्यापन होना चाहिए। ओवरटाइम के लिए अधिकृत आदेश, डिजिटल उपस्थिति, वेतन पर्ची और बैंक खाते में वास्तविक भुगतान का रिकॉर्ड एक ही प्रणाली में उपलब्ध हो, तो संभावित गड़बड़ी पकड़ना आसान हो सकता है।
इसके साथ ही, नियमित सामाजिक या वित्तीय ऑडिट, ठेकेदारों की जवाबदेही और कर्मचारियों के लिए सुरक्षित शिकायत तंत्र भी जरूरी हैं। यदि भुगतान में अंतर पाया जाए, तो संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों की जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ के इस मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा। फिर भी, लगभग 183 करोड़ रुपये के भुगतान से जुड़े आरोप एक बुनियादी प्रश्न उठाते हैं: सरकारी रिकॉर्ड में किसी कर्मचारी के नाम पर रकम दर्ज होना पर्याप्त है, या यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि पैसा वास्तव में उसी कर्मचारी तक पहुंचा?
सार्वजनिक धन की रक्षा और श्रमिकों के अधिकारों का सम्मान—दोनों के लिए इस प्रश्न का जवाब केवल जांच में नहीं, बल्कि सरकारी भुगतान व्यवस्था में ठोस सुधारों के जरिए भी मिलना चाहिए।



