Diwali 2026: भारत की 7 अनोखी परंपराएं देखकर रह जाएंगे हैरान, कहीं राम का स्वागत तो कहीं होती है मां काली की पूजा
भारत में दिवाली सिर्फ रोशनी, मिठाइयों और आतिशबाजी का त्योहार नहीं है। इसकी असली खूबसूरती देश की अलग-अलग संस्कृतियों और परंपराओं में छिपी है। एक ही अमावस्या की रात कहीं भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाए जाते हैं, तो कहीं मां काली की आराधना होती है। किसी शहर में लाखों दीपों से नदी के घाट सजते हैं, तो कहीं व्यापारी नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत करते हैं।
यही विविधता दिवाली को भारत के सबसे खास त्योहारों में शामिल करती है। 2026 में भी देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व अपनी स्थानीय मान्यताओं, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के साथ मनाया जाएगा। आइए जानते हैं भारत के उन शहरों और राज्यों की खास दिवाली परंपराओं के बारे में, जिनकी पहचान देशभर में है।
1. अयोध्या: भगवान राम के स्वागत में दीपों का भव्य उत्सव
उत्तर प्रदेश की अयोध्या का नाम आते ही दिवाली की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक कथा याद आती है। मान्यता है कि भगवान राम 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में नगरवासियों ने दीप जलाकर पूरी नगरी को रोशन किया था।
इसी परंपरा की सांस्कृतिक झलक आज अयोध्या के दीपोत्सव में दिखाई देती है। सरयू नदी के किनारे राम की पैड़ी और आसपास के क्षेत्रों में हजारों-लाखों दीप जलाए जाते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
इससे स्थानीय कारीगरों, मिट्टी के दीये बनाने वालों, दुकानदारों और पर्यटन से जुड़े कारोबारियों को भी अवसर मिलता है।
2. वाराणसी: देव दीपावली पर धरती पर उतरती है रोशनी
वाराणसी की दिवाली देश के दूसरे शहरों से अलग पहचान रखती है। यहां कार्तिक अमावस्या पर सामान्य दिवाली मनाई जाती है, लेकिन इसके लगभग 15 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली का भव्य आयोजन होता है।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवता स्वर्ग से उतरकर काशी के गंगा घाटों पर दीपोत्सव मनाते हैं। दशाश्वमेध घाट सहित गंगा के विभिन्न घाट दीपों की रोशनी से जगमगा उठते हैं। गंगा आरती और दीपदान इस उत्सव के मुख्य आकर्षण होते हैं।
देव दीपावली का महत्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से भी बढ़ गया है। इस अवसर पर देश-विदेश से पर्यटक वाराणसी पहुंचते हैं, जिससे होटल, नाव संचालन, स्थानीय बाजार और हस्तशिल्प कारोबार को लाभ मिलता है।
3. जयपुर: शाही सजावट के साथ मांडना कला की परंपरा
राजस्थान की राजधानी जयपुर में दिवाली का उत्सव अपनी शाही सजावट और पारंपरिक लोककला के लिए प्रसिद्ध है। गुलाबी नगरी के बाजार, प्रमुख इमारतें और व्यावसायिक क्षेत्र रंगीन रोशनी से सजाए जाते हैं।
यहां घरों और दुकानों के प्रवेश द्वार पर मांडना बनाने की परंपरा भी देखने को मिलती है। मांडना राजस्थान की पारंपरिक लोककला है, जिसमें जमीन और दीवारों पर विशेष आकृतियां बनाई जाती हैं। इसे शुभता, समृद्धि और स्वागत का प्रतीक माना जाता है।
जयपुर की दिवाली यह भी दिखाती है कि किस तरह किसी त्योहार के साथ स्थानीय कला और पर्यटन जुड़कर शहर की अलग पहचान बना सकते हैं।
4. कोलकाता: लक्ष्मी पूजा से अलग मां काली की आराधना
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में दिवाली की रात का सबसे बड़ा आकर्षण काली पूजा होती है। देश के कई हिस्सों में इस दिन मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है, जबकि बंगाल में अमावस्या की रात मां काली की आराधना का विशेष महत्व है।
शहर के अलग-अलग इलाकों में आकर्षक पंडाल बनाए जाते हैं और देवी की प्रतिमाओं की स्थापना कर पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता में मां काली को बुराई, अहंकार और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाली शक्ति के रूप में देखा जाता है।
इसके अलावा यहां दिवाली से एक दिन पहले भूत चतुर्दशी मनाई जाती है। इस परंपरा में 14 दीप जलाने की मान्यता है। यह बंगाल की उन सांस्कृतिक विशेषताओं में से एक है, जो इसे देश के अन्य हिस्सों से अलग बनाती है।
5. अमृतसर: बंदी छोड़ दिवस से जुड़ी आजादी की ऐतिहासिक याद
पंजाब के अमृतसर में दिवाली के आसपास सिख समुदाय बंदी छोड़ दिवस मनाता है। इसका संबंध सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी से जुड़ी ऐतिहासिक परंपरा से है।
सिख परंपरा के अनुसार, गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने ग्वालियर के किले से अपनी रिहाई के समय 52 राजाओं की मुक्ति सुनिश्चित की थी। इस घटना को स्वतंत्रता, न्याय और दूसरों की आजादी के प्रति प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
इस अवसर पर स्वर्ण मंदिर को दीपों और रोशनी से सजाया जाता है। श्रद्धालु मत्था टेकने पहुंचते हैं और धार्मिक आयोजन में हिस्सा लेते हैं।
यह परंपरा दिवाली के उत्सव को केवल व्यक्तिगत खुशियों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि दूसरों की स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों का संदेश भी देती है।
6. गुजरात: चोपड़ा पूजन से होती है नए कारोबार की शुरुआत
गुजरात में दिवाली का संबंध व्यापारिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा है। यहां व्यापारी पुराने बही-खातों को बंद करके नए लेखा-जोखा की शुरुआत करते हैं। इस परंपरा को चोपड़ा पूजन कहा जाता है।
व्यापारी नए बही-खातों की पूजा करते हैं और मां लक्ष्मी तथा भगवान गणेश से कारोबार में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। दिवाली के अगले दिन गुजराती नववर्ष यानी बेस्टु वर्ष मनाया जाता है।
इस परंपरा का आर्थिक महत्व भी है। नए वित्तीय हिसाब की शुरुआत व्यापारियों के लिए पुराने लेन-देन का मूल्यांकन करने और भविष्य की कारोबारी योजनाएं बनाने का अवसर होती है।
7. दक्षिण भारत: नरकासुर पर विजय की याद में दीपावली
दक्षिण भारत के कई हिस्सों में दीपावली का संबंध भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की कथा से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि नरकासुर के अत्याचारों से मुक्ति मिलने की खुशी में लोगों ने उत्सव मनाया था।
कई क्षेत्रों में नरक चतुर्दशी की सुबह जल्दी उठकर तेल स्नान करने, नए कपड़े पहनने और दीप जलाने की परंपरा है। घरों में मिठाइयां बनाई जाती हैं और परिवार के लोग एक-दूसरे के साथ त्योहार मनाते हैं।
यहां दिवाली की शुरुआत कई जगह उत्तर भारत की तुलना में सुबह के धार्मिक अनुष्ठानों से अधिक जुड़ी होती है। यही कारण है कि एक ही त्योहार देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग समय और रीति-रिवाजों के साथ दिखाई देता है।
भारत में दिवाली की अलग-अलग परंपराएं क्यों हैं खास?
दिवाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका कोई एक सांस्कृतिक स्वरूप पूरे देश पर लागू नहीं होता। उत्तर भारत में राम की वापसी, बंगाल में शक्ति की उपासना, पंजाब में बंदी छोड़ दिवस और गुजरात में नए व्यापारिक वर्ष की शुरुआत जैसे अलग-अलग संदर्भ इस पर्व को व्यापक अर्थ देते हैं।
इन परंपराओं का महत्व आने वाली पीढ़ियों तक संस्कृति और इतिहास पहुंचाने में भी है। साथ ही त्योहार स्थानीय कारीगरों, छोटे व्यापारियों, पर्यटन और रोजगार को गति देने का अवसर बनते हैं।
इसलिए दिवाली को केवल एक दिन का त्योहार मानना इसकी वास्तविक व्यापकता को कम करके देखना होगा। यह भारत की सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक एकता का ऐसा उत्सव है, जिसमें अलग-अलग परंपराएं होने के बावजूद रोशनी और खुशियों का संदेश एक जैसा रहता है।




