दांत में दर्द नहीं फिर भी हो सकती है बड़ी बीमारी! RCT से लेकर मुंह के कैंसर तक, जानिए दांतों की सेहत के जरूरी नियम
नई दिल्ली। दांतों की परेशानी को लेकर सबसे आम गलती यही है कि लोग इलाज तब शुरू करते हैं, जब दर्द बढ़कर रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित करने लगे। लेकिन दांतों की कई समस्याएं लंबे समय तक बिना तेज दर्द के भी बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि सिर्फ दर्द को दांतों की बीमारी का पैमाना मानना सही नहीं है।
ओरल हेल्थ सिर्फ दांतों की सफाई तक सीमित नहीं है। मसूड़ों की स्थिति, मुंह के अंदर होने वाले असामान्य बदलाव, खान-पान की आदतें और तंबाकू-सुपारी का इस्तेमाल भी लंबे समय की सेहत पर असर डालते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी ओरल हेल्थ को सामान्य स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।
जब दांत बच सकता है तो RCT क्यों किया जाता है?
दांत के अंदर मौजूद पल्प या उसकी जड़ों तक संक्रमण पहुंचने पर रूट कैनाल ट्रीटमेंट यानी RCT की जरूरत पड़ सकती है। इसका उद्देश्य संक्रमित हिस्से को हटाकर दांत को बचाना होता है, ताकि हर समस्या का समाधान दांत निकालना न बन जाए।
आज एंडोडॉन्टिक उपचार में बेहतर इमेजिंग, छोटे उपकरण और माइक्रोस्कोप जैसी तकनीकों ने डॉक्टरों को दांत की अंदरूनी संरचना अधिक स्पष्ट तरीके से देखने में मदद की है। इससे जटिल कैनाल की पहचान और सफाई में सटीकता बढ़ सकती है।
हालांकि RCT हर दांत के दर्द का इलाज नहीं है। दांत की स्थिति, संक्रमण की सीमा और एक्स-रे या अन्य जांच के आधार पर डेंटिस्ट तय करता है कि दांत को बचाने की संभावना कितनी है।
दांत निकालना पड़े तो इम्प्लांट कैसे मदद करता है?
किसी दांत को बचाना संभव न हो तो उसे निकालने के बाद खाली जगह छोड़ देना हमेशा बेहतर विकल्प नहीं होता। दांत की कमी से चबाने की क्षमता, आसपास के दांतों की स्थिति और समय के साथ हड्डी पर भी असर पड़ सकता है।
ऐसे मामलों में डेंटल इम्प्लांट कृत्रिम जड़ की तरह काम करता है। इम्प्लांट लगाने से पहले जबड़े की हड्डी और आसपास की संरचनाओं का आकलन जरूरी होता है। आधुनिक डेंटिस्ट्री में CBCT जैसे 3D स्कैन से डॉक्टर को हड्डी की उपलब्धता और इम्प्लांट की संभावित स्थिति का अधिक विस्तृत आकलन करने में मदद मिलती है।
कुछ मरीजों में दांत निकालने के तुरंत बाद इम्प्लांट लगाने की योजना बनाई जा सकती है, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए संभव या उपयुक्त नहीं होती। संक्रमण, हड्डी की स्थिति और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों के आधार पर समय तय किया जाता है।
मुंह के कैंसर का खतरा किन आदतों से बढ़ता है?
ओरल कैंसर के मामले में भारत सहित दक्षिण एशिया के लिए तंबाकू और सुपारी से जुड़े उत्पाद एक गंभीर चिंता हैं। IARC के अनुसार तंबाकू के सभी रूप, शराब और अरेका नट यानी सुपारी ओरल कैंसर के स्थापित जोखिम कारकों में शामिल हैं।
खास तौर पर गुटखा, खैनी और तंबाकू वाले पान जैसे उत्पादों का लगातार सेवन जोखिम बढ़ाता है। WHO के अनुसार भारत में स्मोकलेस तंबाकू का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है।
इसलिए बचाव का सबसे प्रभावी कदम इन पदार्थों का सेवन शुरू न करना और इस्तेमाल करने वालों के लिए इसे छोड़ने की दिशा में कदम उठाना है। सुपारी को भी पूरी तरह सुरक्षित विकल्प मानना सही नहीं है; IARC ने अरेका नट को कैंसरकारी पदार्थ के रूप में वर्गीकृत किया है।
मुंह में ये बदलाव दिखें तो नजरअंदाज न करें
मुंह में लंबे समय तक रहने वाला घाव, सफेद या लाल पैच, असामान्य गांठ, लगातार जलन, चबाने या निगलने में परेशानी अथवा आवाज में लगातार बदलाव जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
हर ऐसा लक्षण कैंसर का संकेत नहीं होता, लेकिन यदि कोई बदलाव बना रहता है तो डेंटिस्ट या डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। खासकर तंबाकू या सुपारी का सेवन करने वाले लोगों के लिए नियमित ओरल जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। IARC के अनुसार उच्च जोखिम वाले लोगों में क्लिनिकल ओरल एग्जामिनेशन के जरिए शुरुआती बदलाव पकड़ने से गंभीर बीमारी और मृत्यु के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
सुबह ब्रश करना काफी नहीं, रात की सफाई भी जरूरी
दांतों की रोजमर्रा की देखभाल में सबसे महत्वपूर्ण बात किसी महंगे प्रोडक्ट से ज्यादा नियमितता और सही तकनीक है।
अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन के अनुसार फ्लोराइड टूथपेस्ट के साथ दिन में दो बार करीब दो मिनट ब्रश करना सामान्य तौर पर बेहतर ओरल केयर का हिस्सा है। सॉफ्ट-ब्रिसल वाला ब्रश इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।
रात में ब्रश करना खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सोने के दौरान मुंह में लार का प्रवाह कम हो जाता है और भोजन के अवशेष तथा प्लाक लंबे समय तक दांतों के संपर्क में रह सकते हैं।
जोर से रगड़ना सफाई नहीं, नुकसान भी कर सकता है
कई लोगों को लगता है कि जितना ज्यादा दबाव डालकर ब्रश करेंगे, दांत उतने ही चमकदार होंगे। यह सोच सही नहीं है।
बहुत ज्यादा दबाव और गलत तकनीक से मसूड़ों में चोट या दांत की सतह पर घिसाव की समस्या हो सकती है। इसलिए ब्रश करते समय दबाव नियंत्रित रखना और सभी सतहों को व्यवस्थित तरीके से साफ करना अधिक महत्वपूर्ण है।
ब्रश को आम तौर पर हर 3-4 महीने में या ब्रिसल्स घिसने/फैलने पर बदलना चाहिए। यह सलाह अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन की है।
उंगली से मसूड़ों की मालिश क्या ब्रश का विकल्प है?
पारंपरिक रूप से कई घरों में उंगली से मसूड़ों की सफाई या मालिश की जाती रही है। हल्की मसाज कुछ लोगों को आराम दे सकती है, लेकिन इसे ब्रशिंग और दांतों के बीच की सफाई का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
दांतों पर जमा प्लाक को हटाने के लिए नियमित ब्रशिंग और जरूरत के अनुसार इंटरडेंटल क्लीनिंग ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति को मसूड़ों से खून आता है, सूजन रहती है या लगातार बदबू की समस्या है तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डेंटिस्ट से जांच कराना बेहतर है।
दांतों से बोतल खोलना ‘मजबूती’ नहीं
बोतल का ढक्कन खोलना, पैकेट फाड़ना या अखरोट जैसी कठोर चीज तोड़ने के लिए दांतों का इस्तेमाल करना कई लोगों की आदत हो सकती है। लेकिन दांत चबाने के लिए बने हैं, औजार की तरह इस्तेमाल करने के लिए नहीं।
ऐसा करने से दांत में क्रैक, फ्रैक्चर या फिलिंग/क्राउन को नुकसान हो सकता है। चोट लगने के बाद समस्या हमेशा तुरंत दर्द के रूप में सामने आए, यह जरूरी नहीं।
दर्द का इंतजार क्यों नहीं करना चाहिए?
दांतों की बीमारी का सबसे खतरनाक भ्रम यही है कि “दर्द नहीं है तो सब ठीक है।”
कैविटी या मसूड़ों की बीमारी शुरुआती चरण में कम लक्षणों के साथ भी मौजूद हो सकती है। जब संक्रमण दांत के अंदर के संवेदनशील हिस्से तक पहुंचता है, तब दर्द ज्यादा स्पष्ट हो सकता है। इसलिए दर्द शुरू होने तक इंतजार करने के बजाय नियमित दंत जांच कराना ज्यादा समझदारी है।
किसी व्यक्ति को कितनी बार जांच की जरूरत है, यह उसकी उम्र, कैविटी का इतिहास, मसूड़ों की स्थिति, तंबाकू सेवन और अन्य जोखिम कारकों पर निर्भर कर सकता है। इसलिए छह महीने का अंतराल कई लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन व्यक्तिगत जांच की जरूरत डेंटिस्ट तय कर सकता है।
दांतों की सेहत का असली फॉर्मूला
मजबूत दांत केवल सफेद दिखाई देने वाले दांत नहीं हैं। अच्छी ओरल हेल्थ का मतलब है—दांतों में अनावश्यक दर्द न हो, मसूड़े स्वस्थ रहें, चबाने में परेशानी न हो और मुंह में कोई असामान्य बदलाव लंबे समय तक बना न रहे।
रोजाना सही तरीके से ब्रश करना, फ्लोराइड टूथपेस्ट का इस्तेमाल, दांतों के बीच की सफाई, अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों की आदत को नियंत्रित करना और तंबाकू-सुपारी से दूरी बनाना लंबे समय में बड़ा फर्क डाल सकता है।



