छत्तीसगढ़ निकाय चुनाव 2026: टिकट के दावेदार बढ़े, BJP-कांग्रेस ने तेज की तैयारी; आरक्षण से बदले समीकरण
रायपुर। छत्तीसगढ़ में नगरीय निकाय चुनाव की औपचारिक तारीख भले अभी सामने नहीं आई है, लेकिन चुनावी गतिविधियां जमीन पर दिखाई देने लगी हैं। चार नगर निगम समेत 15 निकायों में होने वाले चुनाव को लेकर प्रशासनिक तैयारियों के साथ भाजपा और कांग्रेस ने भी संगठनात्मक स्तर पर अपनी कवायद तेज कर दी है। अब सबसे ज्यादा नजर इस बात पर है कि दोनों दल स्थानीय समीकरणों को देखते हुए किन चेहरों पर भरोसा जताते हैं।
राज्य निर्वाचन आयोग ने जुलाई में दिसंबर 2026 में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनावों की तैयारियों की समीक्षा की थी। जिन 15 निकायों का कार्यकाल दिसंबर में समाप्त होना है, उनमें बीरगांव, भिलाई, भिलाई-चरौदा और रिसाली नगर निगम शामिल हैं। इसके अलावा जामुल, सारंगढ़, बैकुण्ठपुर, शिवपुर-चरचा और खैरागढ़ नगरपालिका परिषद तथा प्रेमनगर, मारो, कोंटा, नरहरपुर, भैरमगढ़ और भोपालपट्टनम नगर पंचायत शामिल हैं। तमनार और बड़ी करेली में भी नवगठित नगर पंचायत के रूप में चुनाव प्रस्तावित हैं।
चुनाव से पहले संगठन ने संभाली कमान
निकाय चुनाव में उम्मीदवारों का चयन केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं होता। स्थानीय संगठन, वार्ड की सामाजिक संरचना, पिछले चुनाव का प्रदर्शन, आरक्षण और प्रत्याशी की क्षेत्र में स्वीकार्यता जैसे कई पहलू टिकट वितरण को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि दोनों प्रमुख दल चुनाव की घोषणा से पहले ही स्थानीय स्तर पर फीडबैक जुटाने में लगे हैं।
कांग्रेस ने सितंबर में 15 निकायों के लिए पर्यवेक्षक और सह-पर्यवेक्षक नियुक्त किए हैं। चार नगर निगमों के लिए भी वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है। बीरगांव में पूर्व मंत्री शिवकुमार डहरिया, भिलाई में पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेन्द्र साहू, रिसाली में मोहन मरकाम और भिलाई-चरौदा में पूर्व विधायक विकास उपाध्याय को पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी दी गई है।
भाजपा ने भी अगस्त में 15 निकायों के लिए प्रभारी और सह-प्रभारियों की नियुक्ति की थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पार्टी ने प्रत्येक निकाय में एक प्रभारी और दो सह-प्रभारी की जिम्मेदारी तय की है। इससे संकेत मिलता है कि दोनों दल चुनाव को केवल स्थानीय स्तर के टिकट वितरण तक सीमित न रखकर संगठनात्मक तैयारी के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
आरक्षण के बाद टिकट का गणित बदलेगा
इस चुनाव में वार्ड आरक्षण का असर उम्मीदवारों की दावेदारी पर सीधे दिखाई देगा। किसी वार्ड के महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य निर्धारित वर्ग के लिए आरक्षित होने पर वहां संभावित उम्मीदवारों का पूरा समीकरण बदल सकता है।
खास तौर पर महिला आरक्षण वाले वार्डों में ऐसे परिवारों की दावेदारी सामने आ सकती है, जिनका स्थानीय राजनीति में पहले से प्रभाव रहा है। हालांकि किसी परिवार के पुराने राजनीतिक प्रभाव का चुनावी टिकट में बदलना तय नहीं है। अंतिम निर्णय संबंधित पार्टी की संगठनात्मक प्रक्रिया और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा।
यही कारण है कि फिलहाल कई दावेदार अपनी स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे हैं। आरक्षण की अंतिम स्थिति सामने आने के बाद टिकट मांगने वालों की तस्वीर कहीं अधिक साफ हो सकती है।
विकास कार्य भी बनेगा स्थानीय चुनाव का मुद्दा
निकाय चुनाव में राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय मुद्दों के साथ स्थानीय सुविधाएं भी महत्वपूर्ण रहती हैं। सड़क, नाली, पेयजल, सफाई, स्ट्रीट लाइट, कचरा प्रबंधन, आवासीय क्षेत्रों का विकास और नगर सेवाओं की गुणवत्ता जैसे विषय सीधे मतदाताओं के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े होते हैं।
चुनाव वाले क्षेत्रों में सरकारी गतिविधियों और विकास कार्यों पर बढ़ता ध्यान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्थानीय मतदाता योजनाओं की घोषणा से ज्यादा उनके जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों को देख सकते हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में नगरों में विकास कार्यों की प्रगति और स्थानीय समस्याओं पर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है।
किन निकायों पर रहेगी सबसे ज्यादा नजर?
चार नगर निगम इस चुनावी प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा होंगे—बीरगांव, भिलाई, भिलाई-चरौदा और रिसाली। इनके अलावा पांच नगरपालिका परिषद और छह नगर पंचायत भी चुनावी तस्वीर का हिस्सा हैं। राज्य निर्वाचन आयोग के स्तर पर इन निकायों की चुनावी तैयारियों को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
बड़े नगर निगमों में टिकट वितरण का असर केवल वार्ड स्तर तक सीमित नहीं रहेगा। महापौर पद के लिए संभावित चेहरों को लेकर भी राजनीतिक दलों के भीतर चर्चा का दौर आगे बढ़ सकता है। वहीं छोटे निकायों में स्थानीय समीकरण, व्यक्तिगत संपर्क और वार्ड स्तर की पकड़ अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
अब किस बात का इंतजार?
फिलहाल सबसे बड़ा इंतजार चुनाव कार्यक्रम और आरक्षण से जुड़ी अंतिम प्रक्रियाओं का है। तारीख घोषित होने के बाद राजनीतिक दलों के सामने उम्मीदवार चयन से लेकर प्रचार रणनीति तक की तस्वीर तेजी से स्पष्ट होगी।



