छत्तीसगढ़ में मानसून की शानदार वापसी, 102.1% बारिश ने बदली तस्वीर; इन जिलों में अब भी कमी
रायपुर, 4 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ में इस साल मानसून ने कुल मिलाकर सामान्य आंकड़े को पीछे छोड़ दिया है, लेकिन पूरे प्रदेश की तस्वीर एक जैसी नहीं है। कहीं बादलों ने जमकर पानी बरसाया तो कहीं पर्याप्त बारिश का इंतजार बना रहा। 3 अक्टूबर तक के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में अब तक 1,155.3 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई है, जो पिछले 10 वर्षों के औसत 1,131.1 मिलीमीटर से अधिक है। इस आधार पर प्रदेश में बारिश 102.1 प्रतिशत रही है।
यह आंकड़ा पहली नजर में सामान्य से बेहतर मानसून की तस्वीर दिखाता है, लेकिन जिलेवार आंकड़े बताते हैं कि राज्य के भीतर वर्षा का वितरण काफी असमान रहा है।
बलरामपुर में बारिश का सबसे बड़ा उछाल
वर्षा प्रतिशत के लिहाज से बलरामपुर इस मानसून में सबसे आगे रहा। जिले में 1,556.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य औसत का 165.3 प्रतिशत है। यानी यहां सामान्य से काफी अधिक पानी बरसा।
हालांकि कुल बारिश की मात्रा के मामले में नारायणपुर सबसे आगे रहा, जहां 1,720.2 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अधिक बारिश और सामान्य औसत के मुकाबले अधिक बारिश—दोनों को एक ही पैमाने से नहीं देखा जा सकता।
रायपुर में भी सामान्य से काफी ज्यादा पानी
राजधानी रायपुर में इस बार मानसून का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। यहां 1,307.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य का 135.4 प्रतिशत है।
इसी तरह गरियाबंद में 1,463.7 मिलीमीटर (130.7%), सारंगढ़-बिलाईगढ़ में 1,181.4 मिलीमीटर (131.4%), मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर में 1,216.9 मिलीमीटर (122.7%) और बालोद में 1,311.8 मिलीमीटर (121.6%) बारिश हुई।
इन आंकड़ों का सीधा असर कृषि, जलाशयों, भूजल और ग्रामीण जल उपलब्धता जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। हालांकि अधिक बारिश का लाभ तभी पूरी तरह सामने आता है, जब पानी का पर्याप्त संचयन हो और खेतों में नमी लंबे समय तक बनी रहे।
बेमेतरा में तस्वीर बिल्कुल अलग
राज्य का औसत 102.1 प्रतिशत होने के बावजूद बेमेतरा में बारिश की स्थिति कमजोर रही। जिले में 674.9 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जो सामान्य का केवल 80.4 प्रतिशत है।
यही अंतर छत्तीसगढ़ के मानसून की असली तस्वीर समझने के लिए महत्वपूर्ण है। प्रदेश के औसत आंकड़े अच्छे होने का अर्थ यह नहीं है कि हर जिले में पानी की उपलब्धता समान रही है। स्थानीय स्तर पर कम बारिश कृषि गतिविधियों, जल स्रोतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अलग प्रभाव डाल सकती है।
बस्तर और सरगुजा के कुछ जिलों में चिंता
मानसून की कमी केवल मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही। बस्तर और सरगुजा अंचल के कई जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई।
कांकेर में 1,222.5 मिलीमीटर बारिश के बावजूद वर्षा प्रतिशत 74.3% रहा। सरगुजा में 627.3 मिलीमीटर (74.9%), मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी में 1,006.8 मिलीमीटर (77%), बीजापुर में 1,516.6 मिलीमीटर (79.1%), जशपुर में 871.9 मिलीमीटर (79.3%) और सुकमा में 1,226.3 मिलीमीटर (80.2%) बारिश दर्ज हुई।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी जिले में बारिश की वास्तविक मात्रा बड़ी दिख सकती है, लेकिन यदि उसका दीर्घकालिक सामान्य औसत उससे काफी ज्यादा है, तो वर्षा प्रतिशत फिर भी कम रह सकता है। इसलिए केवल मिलीमीटर नहीं, बल्कि सामान्य औसत के मुकाबले प्रतिशत भी देखना जरूरी है।
सामान्य से थोड़ा नीचे रहने वाले जिले भी महत्वपूर्ण
कुछ जिलों में स्थिति न तो बहुत खराब रही और न ही सामान्य से बेहतर। बिलासपुर, रायगढ़, सक्ती, कोरबा, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, कबीरधाम और बस्तर जैसे जिलों में वर्षा सामान्य के करीब लेकिन कुछ कम रही।
ऐसे क्षेत्रों में मानसून के अंतिम चरण के बाद पानी की उपलब्धता पर नजर रखना जरूरी होगा। खासतौर पर कृषि और ग्रामीण पेयजल व्यवस्था में बारिश की मात्रा के साथ-साथ उसका समय और वितरण भी अहम भूमिका निभाता है।
औसत से ज्यादा बारिश का मतलब हर जगह राहत नहीं
इस मानसून का सबसे बड़ा सबक यही है कि राज्य का औसत आंकड़ा स्थानीय वास्तविकता को पूरी तरह नहीं बताता।
102.1 प्रतिशत की कुल वर्षा राज्य के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन जिन जिलों में बारिश 75-80 प्रतिशत के आसपास रही है, वहां परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। दूसरी तरफ बहुत ज्यादा बारिश वाले क्षेत्रों में जलभराव, मिट्टी के कटाव और फसलों को नुकसान जैसी चुनौतियां भी पैदा हो सकती हैं।
आगे प्रशासन के लिए चुनौती केवल बारिश के आंकड़े दर्ज करना नहीं, बल्कि जिलेवार जल उपलब्धता, फसल स्थिति और जल स्रोतों की स्थिति का आकलन करना होगी। यही जानकारी यह तय करने में मदद करेगी कि मानसून का वास्तविक लाभ किन क्षेत्रों तक पहुंचा और कहां अतिरिक्त जल प्रबंधन की जरूरत बनी हुई है।
फिलहाल 3 अक्टूबर तक के आंकड़े छत्तीसगढ़ में सामान्य से बेहतर मानसून की तस्वीर जरूर पेश करते हैं, लेकिन जिलों के बीच बड़ा अंतर यह संकेत देता है कि आने वाले समय में जल प्रबंधन की रणनीति प्रदेश के औसत आंकड़े के बजाय स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनानी होगी।



