2 अक्टूबर की विशेष ग्राम सभा में 12 प्रस्तावों की जानकारी; गांव में पादरियों के धार्मिक कार्यक्रमों पर रोक संबंधी सूचना भी लगाई गई, प्रशासन ने लिखित शिकायत मिलने पर नियमों के तहत जांच की बात कही
सुकमा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुनपल्ली गांव में ग्राम सभा के एक प्रस्ताव को लेकर धार्मिक स्वतंत्रता, आदिवासी परंपराओं और ग्राम सभा के अधिकारों पर चर्चा तेज हो गई है। 2 अक्टूबर 2026 को हुई विशेष ग्राम सभा में गांव की जमीन का इस्तेमाल ईसाई समुदाय के लोगों के दफन, चर्च, प्रार्थना सभा और अन्य धार्मिक आयोजनों के लिए नहीं करने का प्रस्ताव पारित किए जाने की जानकारी सामने आई है। ग्राम सभा ने अपने फैसले के लिए PESA कानून और अनुसूचित क्षेत्रों से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया है।
2,000 की आबादी, 21 ईसाई परिवार
पुनपल्ली की आबादी करीब 2,000 बताई गई है। इनमें 21 परिवारों के कुल 75 सदस्य ईसाई धर्म का पालन करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गांव में दफन के लिए जमीन उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में इन परिवारों को अंतिम संस्कार के लिए धोरनापाल में 13 किलोमीटर से अधिक या सुकमा जिला मुख्यालय में 40 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करनी पड़ सकती है।
गांव में लगाए गए सूचना बोर्ड में पादरियों और ईसाई धर्म प्रचारकों के प्रवेश तथा धर्मांतरण या अन्य धार्मिक गतिविधियों से जुड़े कार्यक्रमों पर रोक की बात कही गई है। ग्राम सभा से जुड़े लोगों के अनुसार, निर्णय के पीछे आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक एकता की रक्षा का तर्क दिया गया है।
PESA कानून का दिया गया हवाला
ग्राम सभा का निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244(1), पांचवीं अनुसूची और Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 यानी PESA का उल्लेख करता है। पुनपल्ली अनुसूचित क्षेत्र में आता है और ग्राम सभा ने अपने फैसले को स्थानीय परंपराओं तथा सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा से जोड़कर रखा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, विशेष बैठक में कुल 12 प्रस्ताव लिए गए थे।
हालांकि, इस प्रस्ताव की वैधानिकता को लेकर सवाल भी उठे हैं। ईसाई समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों और अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी व्यक्ति को उसके धर्म के आधार पर दफन के लिए जमीन से वंचित करना संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। वहीं ग्राम सभा की ओर से PESA के तहत स्थानीय परंपराओं और सामुदायिक हितों की सुरक्षा का पक्ष रखा गया है। इन दोनों पक्षों के बीच कानूनी स्थिति का अंतिम निर्धारण सक्षम प्रशासनिक अथवा न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट के दफन अधिकार मामले का संदर्भ
इस मामले की चर्चा छत्तीसगढ़ में ईसाई समुदाय के दफन अधिकार से जुड़े रमेश बघेल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले के संदर्भ में भी हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2025 के फैसले में एक ईसाई व्यक्ति के शव को उसके मूल गांव में दफनाने से जुड़े विवाद पर विचार किया गया था। न्यायालय के रिकॉर्ड में दफन स्थल को लेकर अलग-अलग न्यायिक विचार और परिस्थितियों का विस्तृत उल्लेख है।
ईसाई समुदाय से जुड़े कुछ प्रतिनिधियों का आरोप है कि इस मामले के बाद दफन से जुड़े विवादों को लेकर स्थानीय स्तर पर तनाव बढ़ा है। हालांकि, इन आरोपों को संबंधित पक्षों के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
प्रशासन की नजर में अभी मामला जांच का विषय
सुकमा जिला पंचायत के CEO मुकुंद ठाकुर के अनुसार, यह विषय ग्राम सभा के एजेंडे में नहीं था। उन्होंने कहा कि यदि इस संबंध में लिखित शिकायत प्राप्त होती है तो लागू नियमों के अनुसार मामले की वैधता की जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल पुनपल्ली का मामला ग्राम सभा के स्थानीय निर्णय और उसके संभावित कानूनी प्रभावों तक सीमित है। इसे किसी अंतिम न्यायिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जा सकता। आगे प्रशासनिक जांच या न्यायिक प्रक्रिया से यह स्पष्ट हो सकता है कि ग्राम सभा के अधिकारों की सीमा इस मामले में किस तरह लागू होती है।



