Bhilai Steel Plant Scrap Theft: 250 टन स्क्रैप चोरी की जांच अब CBI के हाथ, 21 गिरफ्तारियों के बाद बढ़ा दायरा
भिलाई। भिलाई इस्पात संयंत्र से कथित तौर पर करीब 250 टन लौह स्क्रैप बाहर निकालने के मामले ने अब स्थानीय पुलिस जांच से आगे बढ़कर केंद्रीय जांच का रूप ले लिया है। राजपत्र में आदेश जारी होने के बाद इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई है। अब तक पुलिस की कार्रवाई में बीएसपी से जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियों, ट्रांसपोर्टरों और निजी कारोबारियों समेत 21 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
मामले की गंभीरता सिर्फ जब्त किए गए स्क्रैप की मात्रा या उसकी अनुमानित कीमत तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि यदि प्लांट परिसर से इतनी बड़ी मात्रा में सामग्री बाहर निकली, तो इसके लिए भंडारण, रिकॉर्ड, परिवहन और बाहर निकलने की निगरानी व्यवस्था में कहां-कहां सेंध लगी। CBI जांच के दौरान इसी पूरी श्रृंखला की पड़ताल महत्वपूर्ण हो सकती है।
एक गोदाम की कार्रवाई से खुली बड़ी जांच
मामला 26 मई को उस समय सामने आया जब पुरानी भिलाई थाना पुलिस ने अकलोरडीह खदानपारा स्थित एके ट्रेडर्स के गोदाम और हथखोज क्षेत्र में कार्रवाई की। पुलिस को वहां बड़ी मात्रा में ऐसा लौह स्क्रैप मिला, जिसके बीएसपी से चोरी किए जाने का संदेह जताया गया।
कार्रवाई के दौरान लगभग 250 टन स्क्रैप के अलावा वाहन, जेसीबी, हाइड्रा और अन्य मशीनरी भी जब्त की गई। पुलिस के अनुसार जब्त सामग्री और उपकरणों का कुल अनुमानित मूल्य करीब 3.22 करोड़ रुपये था।
जांच में पुलिस ने कथित तौर पर यह संभावना सामने रखी कि स्क्रैप को फ्लाई ऐश या दूसरी सामग्री की आड़ में संयंत्र से बाहर निकालकर पहले एक निर्धारित ठिकाने तक पहुंचाया जाता था। इसके बाद उसे आगे बेचने या औद्योगिक उपयोग में खपाने की कड़ी जुड़ती थी।
यही बिंदु अब केंद्रीय जांच के लिए अहम हो सकता है—क्या यह केवल कुछ लोगों तक सीमित मामला था या इसके पीछे एक व्यवस्थित सप्लाई और डिस्पोजल नेटवर्क काम कर रहा था।
21 गिरफ्तारियों के बाद भी कई सवाल बाकी
स्थानीय पुलिस की जांच में अब तक 21 आरोपित गिरफ्तार किए जा चुके हैं। कार्रवाई का दायरा बीएसपी के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों से लेकर ट्रांसपोर्टर, कारोबारी तथा निजी औद्योगिक इकाइयों से जुड़े लोगों तक पहुंचा।
18 सितंबर को रायपुर पावर एंड स्टील लिमिटेड, रसमड़ा के मैनेजिंग डायरेक्टर विनोद कुमार गर्ग और डायरेक्टर संदीप कुमार सिंह की गिरफ्तारी भी इसी मामले की जांच का हिस्सा बनी। दोनों पर कथित चोरी के स्क्रैप को निजी औद्योगिक इकाई में खपाने से जुड़ी भूमिका के आरोप हैं। न्यायालय ने उन्हें न्यायिक रिमांड पर भेजा था।
इससे जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—कथित चोरी के बाद सामग्री कहां गई और उसका अंतिम उपयोग किस स्तर पर हुआ। यदि चोरी का स्क्रैप वास्तव में अलग-अलग संस्थानों तक पहुंचा था, तो उसके पूरे movement trail की जांच मामले की दिशा तय कर सकती है।
बीएसपी के अंदर की व्यवस्था भी जांच के केंद्र में
मामले में बीएसपी प्रबंधन ने जीएम हिमांशु भूषण मलिक, नॉन-एग्जीक्यूटिव धनंजय वर्मा और मनोज कुमार देवांगन को निलंबित किया था।
यह कार्रवाई इस बात को रेखांकित करती है कि जांच केवल प्लांट से बाहर सामग्री पहुंचाने वालों तक सीमित नहीं है। स्क्रैप की पहचान, स्टॉक रिकॉर्ड, यार्ड की निगरानी, डिस्पैच प्रक्रिया और वाहनों की आवाजाही जैसे कई स्तरों पर जवाबदेही की जांच जरूरी है।
औद्योगिक संयंत्रों में स्क्रैप प्रबंधन एक नियमित लेकिन संवेदनशील प्रक्रिया होती है। इसलिए किसी बड़े स्टॉक के गायब होने या अनधिकृत तरीके से बाहर जाने की स्थिति में सिर्फ चोरी करने वाले व्यक्ति की पहचान पर्याप्त नहीं होती। रिकॉर्ड और भौतिक स्टॉक में अंतर कैसे बना, किस स्तर पर सत्यापन हुआ और निकासी के दौरान कौन-कौन से नियंत्रण काम नहीं कर पाए—ये सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
CBI के आने से जांच का अगला चरण क्या होगा?
CBI के जांच में आने के बाद सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह होगा कि पूरे मामले को एक बड़े नेटवर्क के रूप में जांचने की संभावना बढ़ेगी। अब तक पुलिस द्वारा जुटाए गए दस्तावेज, जब्ती रिकॉर्ड, तकनीकी साक्ष्य, कॉल डिटेल या अन्य उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ के निष्कर्ष केंद्रीय जांच के लिए आधार बन सकते हैं।
जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि कथित तौर पर स्क्रैप की निकासी किस तरीके से हुई, परिवहन की व्यवस्था कैसे की गई, बीच में किन ठिकानों का इस्तेमाल हुआ और अंतिम खरीदार या औद्योगिक उपयोगकर्ता तक सामग्री कैसे पहुंची।
इसके साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण रहेगा कि क्या कथित गतिविधि केवल हाल की अवधि तक सीमित थी या इससे पहले भी इसी तरह की सामग्री बाहर जाती रही थी। इसका जवाब स्टॉक रिकॉर्ड, पुराने परिवहन दस्तावेज और वित्तीय लेनदेन की जांच से मिल सकता है।
हालांकि इन सभी पहलुओं को फिलहाल जांच के संभावित दायरे के रूप में देखना चाहिए। किसी व्यक्ति की भूमिका या अपराध में संलिप्तता का अंतिम निर्धारण अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगा।
जमानत मिलने का क्या मतलब है?
मामले में कुछ आरोपितों को हाई कोर्ट से जमानत भी मिल चुकी है। अभय सिंह और हिमांशु खंडेलवाल को अग्रिम जमानत मिली, जबकि हिमांशु भूषण मलिक और उपेंद्र उर्फ पिंटू ओझा को नियमित जमानत दी गई। 13 अगस्त को बीएसपी के इंजीनियरिंग एसोसिएट मनोज कुमार देवांगन को भी हाई कोर्ट से नियमित जमानत मिली।
जमानत का अर्थ आरोपों का समाप्त होना या अदालत द्वारा किसी आरोपी को दोषमुक्त घोषित करना नहीं होता। यह न्यायिक प्रक्रिया के दौरान आरोपी को निर्धारित शर्तों के तहत बाहर रहने की अनुमति है। इसलिए CBI की आगे की जांच और अदालत में पेश होने वाले साक्ष्य इस मामले की कानूनी दिशा के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।
CBI जांच की मांग से अब केंद्रीय एजेंसी तक पहुंचा मामला
भिलाई क्षेत्र के विधायक रिकेश सेन ने इस मामले में शुरुआत से CBI जांच की मांग उठाई थी। उन्होंने विधानसभा में अशासकीय संकल्प की प्रक्रिया शुरू करने के साथ केंद्र सरकार से भी मामले को केंद्रीय एजेंसी को सौंपने का अनुरोध किया था।
20 जुलाई को उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र भेजकर CBI जांच की मांग की थी। इसके जवाब में गृह मंत्रालय ने पत्र को आवश्यक कार्रवाई के लिए इस्पात मंत्रालय को भेजे जाने की जानकारी दी थी।
अब राजपत्र में केंद्रीय जांच से संबंधित आदेश जारी होने के बाद इस मामले की जांच का संस्थागत दायरा बदल गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल: चोरी कितनी बड़ी थी और नेटवर्क कितना पुराना?
21 गिरफ्तारियां इस मामले की गंभीरता को दिखाती हैं, लेकिन जांच की वास्तविक तस्वीर इससे आगे तय होगी। CBI के सामने अब सिर्फ यह पता लगाना चुनौती नहीं होगी कि कथित रूप से स्क्रैप किसने बाहर निकाला, बल्कि यह समझना भी जरूरी होगा कि पूरी व्यवस्था किस तरह काम करती थी।
यदि जांच में किसी संगठित नेटवर्क के ठोस प्रमाण सामने आते हैं, तो मामले का दायरा और बढ़ सकता है। दूसरी ओर, यदि साक्ष्य सीमित भूमिका या अलग-अलग घटनाओं की ओर इशारा करते हैं, तो कानूनी जिम्मेदारी भी उसी आधार पर तय होगी।
भिलाई स्टील प्लांट देश के प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में शामिल है। इसलिए इस मामले का महत्व केवल 250 टन स्क्रैप या करोड़ों रुपये की जब्ती तक सीमित नहीं है। यह मामला यह भी सवाल उठाता है कि इतने बड़े औद्योगिक परिसर में स्क्रैप, स्टॉक और सामग्री की आवाजाही पर नियंत्रण कितना प्रभावी है।



