Asian Para Games: भारत का ऐतिहासिक धमाका, मोना अग्रवाल के वर्ल्ड रिकॉर्ड से गोल्ड का रिकॉर्ड बराबर
नागोया | 23 अक्टूबर 2026
एशियन पैरा गेम्स 2026 में भारत के खिलाड़ियों ने ऐसा प्रदर्शन किया है, जिसने देश की पैरा स्पोर्ट्स ताकत को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। निशानेबाज मोना अग्रवाल ने विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय अभियान को बड़ी उपलब्धि दिलाई, वहीं जेहान डोराब मदन और शुभम वाधवा की जोड़ी ने पैरा टेबल टेनिस में कांस्य पदक हासिल किया। पांचवें दिन के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत के कुल पदकों की संख्या 103 तक पहुंच गई और देश ने पिछले संस्करण के 27 स्वर्ण पदकों के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली।
यह उपलब्धि केवल पदक तालिका में भारत की स्थिति का संकेत नहीं है। यह उस मेहनत, अनुशासन और प्रतिस्पर्धी क्षमता की कहानी भी है, जो पैरा खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार मजबूत बना रही है।
Mona Agrawal ने विश्व रिकॉर्ड से रचा इतिहास
भारतीय निशानेबाज मोना अग्रवाल ने महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 स्पर्धा में 357.5 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीता। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने स्वीडन की अन्ना बेंसन के 356 अंकों के पिछले विश्व रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।
इस स्पर्धा में चीन की कुइपिंग झांग ने 353.7 अंकों के साथ रजत और दक्षिण कोरिया की म्योंग किम ने 344.4 अंकों के साथ कांस्य पदक जीता। भारत की अवनि लेखरा 333.2 अंकों के साथ चौथे स्थान पर रहीं।
मोना की सफलता की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि निशानेबाजी में मामूली अंक का अंतर भी अंतिम परिणाम बदल सकता है। यहां तकनीक के साथ एकाग्रता, शरीर पर नियंत्रण और दबाव में सही निर्णय लेने की क्षमता निर्णायक भूमिका निभाती है। विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीतना इन सभी पहलुओं में उनके मजबूत प्रदर्शन को दर्शाता है।
27 गोल्ड के साथ भारत ने दोहराया पिछला रिकॉर्ड
भारत ने इस प्रतियोगिता में 27 स्वर्ण, 33 रजत और 43 कांस्य पदकों सहित कुल 103 पदक अपने नाम किए। इस तरह भारतीय दल ने पिछले संस्करण में हासिल किए गए 27 स्वर्ण पदकों की बराबरी कर ली।
पदक तालिका में चीन 170 स्वर्ण सहित 354 पदकों के साथ पहले स्थान पर है। जापान 50 स्वर्ण और कुल 154 पदकों के साथ दूसरे, जबकि उज्बेकिस्तान 41 स्वर्ण और 127 कुल पदकों के साथ तीसरे स्थान पर है। भारत चौथे स्थान पर बना हुआ है।
यह तुलना दिखाती है कि भारत का प्रदर्शन मजबूत होने के बावजूद शीर्ष देशों तक पहुंचने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। स्वर्ण पदकों के रिकॉर्ड की बराबरी उत्साहजनक है, लेकिन अगला लक्ष्य केवल कुल पदक बढ़ाना नहीं, बल्कि अधिक स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतने की क्षमता विकसित करना भी होना चाहिए।
पैरा एथलेटिक्स बना भारत की पदक सफलता का आधार
भारत के कुल 103 पदकों में सबसे बड़ा योगदान पैरा एथलेटिक्स का रहा। इस खेल में भारतीय खिलाड़ियों ने 20 स्वर्ण, 18 रजत और 19 कांस्य सहित 57 पदक जीते।
पैरा बैडमिंटन में भारत को दो स्वर्ण, चार रजत और आठ कांस्य सहित 14 पदक मिले। पैरा तैराकी में 10 और पैरा तीरंदाजी में छह पदक भारत के खाते में आए। शूटिंग पैरा स्पोर्ट में भी भारतीय निशानेबाजों ने दो स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पदक हासिल किया। पैरा टेबल टेनिस में भारत ने सात कांस्य पदक जीते।
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि एथलेटिक्स भारत की पदक रणनीति का प्रमुख आधार है। वहीं बैडमिंटन, तीरंदाजी और निशानेबाजी जैसे खेलों में मिली सफलताएं यह संकेत देती हैं कि भारत के पास अलग-अलग स्पर्धाओं में भी पदक जीतने की क्षमता है।
आगे की चुनौती इस प्रदर्शन को स्थायी बनाना है। खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, वैज्ञानिक फिटनेस सहायता, प्रतियोगिताओं का अनुभव और लंबे समय तक उपलब्ध रहने वाली कोचिंग सुविधाएं मिलें, तो भारत विभिन्न खेलों में अपनी प्रतिस्पर्धा और मजबूत कर सकता है।
50 साल की उम्र में जेहान मदन का कांस्य, अनुभव की मिसाल
पैरा टेबल टेनिस के पुरुष युगल एमडी4 वर्ग में जेहान डोराब मदन और शुभम वाधवा ने कांस्य पदक जीता। भारतीय जोड़ी को अपने अंतिम ग्रुप मुकाबले में दक्षिण कोरिया के पार्क जिनचियोल और किम क्यूंग-ह्यून के खिलाफ 0-3 से हार मिली, लेकिन ग्रुप में शीर्ष चार जोड़ियों में रहने के कारण उन्हें पदक मिला।
50 वर्षीय जेहान मदन इस उपलब्धि के साथ भारतीय दल के सबसे उम्रदराज पदक विजेता बने। पूर्व रेसिंग ड्राइवर रहे जेहान की कहानी यह भी बताती है कि खेल में प्रतिस्पर्धा और उपलब्धि की संभावनाएं किसी एक उम्र तक सीमित नहीं होतीं। उनके 29 वर्षीय साथी शुभम वाधवा के साथ यह पदक अलग-अलग उम्र और अनुभव के खिलाड़ियों के सहयोग का उदाहरण है।
इस उपलब्धि को केवल उम्र के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। पैरा खेलों में खिलाड़ियों के लिए सही प्रशिक्षण, उपयुक्त खेल सुविधाएं और नियमित प्रतिस्पर्धा तक पहुंच बेहद जरूरी है। जेहान और शुभम का पदक इस बात पर भी ध्यान खींचता है कि प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए खेल व्यवस्था को अलग-अलग आयु वर्ग के खिलाड़ियों के अनुकूल होना चाहिए।
तीरंदाजी में करीबी हार, लेकिन मुकाबले का स्तर ऊंचा
भारतीय पैरा रिकर्व मिश्रित जोड़ी हरविंदर सिंह और भावना चौधरी कांस्य पदक के मुकाबले में ईरान से शूटऑफ में 4-5 से हार गई। निर्धारित सेटों के बाद मुकाबला बराबरी पर पहुंचा था, लेकिन निर्णायक शूटऑफ में भारतीय जोड़ी पदक हासिल नहीं कर सकी।
करीबी हार किसी खिलाड़ी के पूरे अभियान का मूल्यांकन नहीं करती। तीरंदाजी जैसे खेल में दबाव के क्षणों में कुछ मिलीमीटर का अंतर भी परिणाम बदल सकता है। हालांकि, ऐसे मुकाबले यह समझने का अवसर देते हैं कि निर्णायक क्षणों में प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए मानसिक तैयारी और प्रतिस्पर्धी अनुभव कितने महत्वपूर्ण हैं।
भारत के पैरा खेलों के लिए आगे का रास्ता
103 पदकों और 27 स्वर्ण की बराबरी के बाद भारत के सामने सबसे अहम सवाल है कि इस सफलता को अगले प्रतियोगिता चक्र में कैसे आगे बढ़ाया जाए। केवल बड़े आयोजन के दौरान संसाधन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा। प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान, जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, पुनर्वास सहायता और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में नियमित भागीदारी को एक साथ मजबूत करना होगा।
साथ ही, पैरा खेलों को स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय खेल संस्थानों तक पहुंचाना भी जरूरी है। इससे नए खिलाड़ियों को शुरुआती स्तर पर ही सही मार्गदर्शन मिल सकता है और परिवारों को भी खेल में करियर की संभावनाओं के बारे में अधिक जानकारी मिलेगी।
मोना अग्रवाल का विश्व रिकॉर्ड, पैरा एथलेटिक्स में बड़ी संख्या में पदक और जेहान मदन की उपलब्धि भारतीय अभियान की अलग-अलग ताकतों को सामने लाती हैं। अब चुनौती इस प्रदर्शन को एक बार की उपलब्धि तक सीमित न रखकर ऐसी खेल व्यवस्था तैयार करने की है, जिसमें पैरा खिलाड़ियों को लगातार आगे बढ़ने के अवसर मिलें।




