उम्र बढ़ने के बाद भी अचानक हो सकती है एलर्जी, कोविड से लेकर टिक के काटने तक ये कारण बदल सकते हैं शरीर की प्रतिक्रिया
नई दिल्ली। एलर्जी को आमतौर पर बचपन से जुड़ी समस्या माना जाता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। किसी व्यक्ति को वर्षों तक किसी भोजन, धूल, परागकण या पर्यावरणीय तत्व से कोई परेशानी न हो और बाद में उसी चीज से एलर्जी विकसित हो जाए। विशेषज्ञों के मुताबिक शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली जीवनभर एक जैसी नहीं रहती और संक्रमण, दवाओं, हार्मोनल बदलाव तथा कुछ बाहरी परिस्थितियां इसके व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।
यही वजह है कि वयस्क उम्र में पहली बार सामने आने वाली एलर्जी को केवल आनुवंशिक कारणों से जोड़ना सही नहीं होगा। वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर प्रतिरक्षा प्रणाली कब और क्यों उन पदार्थों को खतरा मानने लगती है, जिन्हें वह पहले सामान्य समझती थी।
संक्रमण के बाद बदल सकती है प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया
हाल के शोध में कोविड-19 संक्रमण और बाद में एलर्जी संबंधी बीमारियों के बीच संबंध पर भी ध्यान दिया गया है। दिए गए 2026 के अध्ययन के अनुसार कोविड-19 संक्रमण के बाद एलर्जिक राइनाइटिस और अस्थमा विकसित होने का जोखिम अधिक पाया गया, जबकि अध्ययन में टीकाकरण के साथ इस जोखिम में कमी का संबंध देखा गया।
इसका संभावित कारण संक्रमण के दौरान शरीर में पैदा होने वाली तीव्र सूजन और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया हो सकती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि कोविड से हर व्यक्ति को एलर्जी हो जाएगी। यह संबंध आबादी के स्तर पर देखा गया है और किसी व्यक्ति में एलर्जी होने का कारण तय करने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार कुछ अन्य श्वसन संक्रमण भी बच्चों में बाद की एलर्जी से जुड़े पाए गए हैं। संक्रमण के दौरान सक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली यदि किसी सामान्य पदार्थ के संपर्क में आती है, तो कुछ परिस्थितियों में वह उसे भविष्य के लिए संभावित खतरे के रूप में पहचान सकती है।
एंटीबायोटिक और आंतों के माइक्रोबायोम की भूमिका
एलर्जी के पीछे केवल वायरस ही नहीं, बल्कि कुछ दवाओं से जुड़े प्रभावों पर भी वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं। एंटीबायोटिक के इस्तेमाल और बाद में एलर्जी के जोखिम के बीच संबंध की रिपोर्ट सामने आई हैं।
इसके पीछे आंतों में मौजूद माइक्रोबायोम एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है। शरीर में रहने वाले अरबों सूक्ष्मजीव पाचन के अलावा प्रतिरक्षा प्रणाली के विकास और उसके संतुलन में भी भूमिका निभाते हैं।
एंटीबायोटिक कुछ हानिकारक बैक्टीरिया के साथ-साथ उपयोगी बैक्टीरिया को भी प्रभावित कर सकते हैं। इस बदलाव और एलर्जी के बीच संबंध को लेकर शोध जारी है। इसलिए किसी व्यक्ति में एलर्जी होने का कारण केवल यह मान लेना कि उसने एंटीबायोटिक ली थी, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
गर्भावस्था और हार्मोनल बदलाव भी बदल सकते हैं एलर्जी के लक्षण
महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और हार्मोनल स्थिति में बड़े बदलाव होते हैं। पहले से मौजूद पर्यावरणीय एलर्जी कुछ महिलाओं में इस दौरान अधिक परेशान कर सकती है।
एक अलग स्थिति प्रेग्नेंसी राइनाइटिस भी है। इसमें गर्भावस्था के दौरान नाक बंद होना, छींक आना या नाक बहने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं, जबकि महिला को पहले एलर्जी की समस्या नहीं रही होती। इसे हमेशा वास्तविक एलर्जी मानना सही नहीं है। कई मामलों में बच्चे के जन्म के बाद ये लक्षण खत्म हो जाते हैं।
एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ परस्पर क्रिया करते हैं। यही कारण है कि गर्भावस्था और मेनोपॉज जैसे हार्मोनल बदलाव के समय एलर्जी के लक्षणों में परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिकों की रुचि बढ़ी है।
टिक के काटने के बाद मांस से एलर्जी का मामला क्यों हैरान करता है?
वयस्क उम्र में नई एलर्जी का सबसे असामान्य उदाहरण अल्फा-गैल सिंड्रोम है। इसमें कुछ लोगों को टिक के काटने के बाद लाल मांस और स्तनधारी जीवों से बने कुछ उत्पादों में मौजूद एक शुगर अणु से एलर्जी हो सकती है।
अमेरिकी CDC के अनुसार अल्फा-गैल नामक अणु अधिकांश स्तनधारी जीवों में पाया जाता है, लेकिन मनुष्यों में नहीं। कुछ टिकों की लार के माध्यम से इसके संपर्क के बाद प्रतिरक्षा प्रणाली इसे खतरे के रूप में पहचान सकती है। बाद में बीफ, पोर्क या लैम्ब जैसे मांस का सेवन करने पर एलर्जिक प्रतिक्रिया हो सकती है।
इस स्थिति की एक खास बात यह है कि प्रतिक्रिया हमेशा तुरंत नहीं होती। CDC के मुताबिक लक्षण कई मामलों में संपर्क के 2 से 6 घंटे बाद दिखाई दे सकते हैं। इनमें पित्ती, सूजन, पेट दर्द, मतली और सांस लेने में परेशानी शामिल हो सकती है। गंभीर स्थिति में यह जानलेवा एलर्जिक प्रतिक्रिया यानी एनाफिलेक्सिस तक पहुंच सकती है।
अमेरिका में हजारों मामलों ने बढ़ाई चिंता
CDC के आंकड़ों के अनुसार 2017 से 2022 के बीच अमेरिका में अल्फा-गैल के लिए जांच कराने वाले लोगों में 90,018 लोगों के टेस्ट पॉजिटिव पाए गए। हालांकि ये आंकड़े संभावित मामलों को दर्शाते हैं और हर पॉजिटिव टेस्ट को चिकित्सकीय रूप से निश्चित बीमारी नहीं माना जा सकता। CDC ने यह भी बताया है कि 2010 से 2022 के बीच 1.10 लाख से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए और वास्तविक प्रभावित लोगों की संख्या इससे काफी अधिक हो सकती है।
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी है—केवल अल्फा-गैल एंटीबॉडी टेस्ट पॉजिटिव आने से यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति को अल्फा-गैल सिंड्रोम है। डॉक्टर लक्षणों, टिक के संपर्क, प्रतिक्रिया में देरी और अन्य चिकित्सकीय जानकारी को साथ में देखते हैं।
बदलते पर्यावरण से भी बढ़ सकती है चुनौती
टिक से जुड़ी एलर्जी का मामला यह भी दिखाता है कि एलर्जी केवल शरीर के भीतर होने वाली प्रक्रिया नहीं है। जलवायु और पर्यावरणीय बदलाव, वन्यजीवों का फैलाव और मनुष्य-प्रकृति संपर्क में परिवर्तन भी कुछ एलर्जी स्थितियों के भौगोलिक विस्तार को प्रभावित कर सकते हैं।
इसीलिए आने वाले वर्षों में एलर्जी की पहचान केवल सामान्य खाद्य पदार्थों या धूल-पराग तक सीमित नहीं रह सकती। डॉक्टरों के लिए मरीज की यात्रा, बाहरी गतिविधियों, कीटों के संपर्क, हाल के संक्रमण और दवाओं के इतिहास को समझना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
कब डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है?
अगर किसी व्यक्ति को पहली बार किसी भोजन या अन्य पदार्थ के संपर्क के बाद बार-बार पित्ती, चेहरे या गले में सूजन, उल्टी, सांस लेने में परेशानी, चक्कर या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे सामान्य प्रतिक्रिया समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
खासकर सांस लेने में कठिनाई या गंभीर एलर्जिक प्रतिक्रिया की स्थिति में तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है। एलर्जी की पहचान के लिए डॉक्टर लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर उपयुक्त जांच की सलाह दे सकते हैं।



