Economy Alert: महंगाई का बड़ा खतरा! अशोक लाहिड़ी ने ब्याज दरों पर दी सख्त सलाह, निवेश और आम जनता पर पड़ सकता है असर
महंगाई से जूझ रहे आम लोगों को सस्ती EMI और कर्ज पर राहत मिलने की उम्मीद फिलहाल पूरी होती नजर नहीं आ रही है। वैश्विक बाजार में खाद्य पदार्थों और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक लाहिड़ी ने मौद्रिक नीति को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। उनका मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में जल्दबाजी में राहत देने वाले फैसले भविष्य में महंगाई को और गंभीर बना सकते हैं।
यह चर्चा ऐसे समय हो रही है, जब भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने अक्टूबर 2026 में रेपो रेट 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया है। इसका सीधा संबंध केवल बैंकिंग व्यवस्था से नहीं, बल्कि आम आदमी के होम लोन, कार लोन, कारोबारियों की लागत और देश में निवेश की गति से भी है।
महंगाई के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
अशोक लाहिड़ी ने वैश्विक महंगाई के दो महत्वपूर्ण कारणों की ओर ध्यान दिलाया है। पहला, खाद्य पदार्थों और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में संभावित तेजी और दूसरा, अल नीनो का खतरा।
अल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जो प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव के कारण विकसित होती है। इसका प्रभाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान के पैटर्न पर पड़ सकता है। भारत में यदि इसके कारण मानसून कमजोर होता है, तो कृषि उत्पादन, खाद्य आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
खाद्य पदार्थों की आपूर्ति प्रभावित होने पर सब्जियों, अनाज और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। दूसरी तरफ पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने से परिवहन, खेती और उद्योगों की लागत बढ़ती है।
यही वजह है कि आर्थिक नीति बनाते समय केवल वर्तमान महंगाई के आंकड़ों को देखना पर्याप्त नहीं होता। भविष्य में कीमतों पर पड़ने वाले संभावित दबाव का आकलन भी जरूरी होता है।
RBI के फैसले का आम आदमी पर क्या असर होगा?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। इसमें बदलाव का असर धीरे-धीरे बैंकिंग प्रणाली और बाजार की ब्याज दरों पर पड़ सकता है।
जब रेपो रेट बढ़ता है, तो बैंकों के लिए धन की लागत बढ़ने की संभावना रहती है। इसका असर नए कर्ज और कुछ मौजूदा फ्लोटिंग रेट लोन की EMI पर भी पड़ सकता है।
इसके विपरीत, ब्याज दरों में कटौती से कर्ज सस्ता होने और निवेश को प्रोत्साहन मिलने की संभावना रहती है। लेकिन यदि महंगाई का दबाव बना हुआ है, तो जल्द राहत देने से कीमतों को नियंत्रित करने की चुनौती बढ़ सकती है।
इसलिए रिजर्व बैंक के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। एक तरफ आर्थिक विकास की गति बनाए रखना और दूसरी तरफ आम लोगों की क्रय शक्ति को महंगाई से बचाना।
होर्मुज स्ट्रेट का तनाव क्यों बढ़ा रहा आर्थिक चिंता?
वैश्विक ऊर्जा बाजार में होर्मुज जलडमरूमध्य का विशेष महत्व है। यह दुनिया के प्रमुख तेल और गैस परिवहन मार्गों में शामिल है।
यदि यहां सैन्य तनाव या परिवहन संबंधी बाधाएं पैदा होती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे कीमतों में तेजी आने का खतरा रहता है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है।
इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन महंगा होने पर खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है।
लाहिड़ी की सावधानी बरतने की सलाह को इसी व्यापक वैश्विक आर्थिक परिस्थिति के संदर्भ में समझना जरूरी है।
पूर्वी भारत के विकास में बैंक बन सकते हैं बड़े भागीदार
अशोक लाहिड़ी ने केवल महंगाई और मौद्रिक नीति पर ही चिंता नहीं जताई, बल्कि पूर्वी भारत में औद्योगिक विकास की संभावनाओं पर भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
उनका मानना है कि बैंकों को केवल कर्ज देने वाली संस्थाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें निवेशकों और राज्य सरकारों के बीच मध्यस्थ की भूमिका भी निभानी चाहिए।
बैंकों के पास स्थानीय उद्योगों, कारोबारियों, संभावित निवेशकों और बाजार की जरूरतों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी होती है। इस जानकारी का उपयोग करके वे निवेश के नए अवसर विकसित कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण, इस्पात, कपड़ा या अन्य उद्योगों की संभावनाएं हैं, तो बैंक निवेशकों को उन अवसरों से जोड़ सकते हैं। इससे उद्योगों को पूंजी मिलेगी और बैंकिंग संस्थाओं को भी नए कारोबार का अवसर मिलेगा।
पूर्वी भारत में बैंकिंग और निवेश के बीच बड़ी खाई
लाहिड़ी ने क्षेत्रीय ऋण-जमा अनुपात में अंतर का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 2023 में दक्षिण भारत का क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात 93.6 प्रतिशत था, जबकि पूर्वी क्षेत्र में यह 47.5 प्रतिशत रहा।
यह अंतर बताता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में बैंकों द्वारा जमा की गई राशि के मुकाबले कर्ज वितरण की स्थिति काफी अलग हो सकती है।
पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और सिक्किम जैसे राज्यों में औद्योगिक विकास की संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक निवेश में बदलने के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे, कारोबार के अनुकूल माहौल और वित्तीय सहायता की जरूरत है।
यहां बैंकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, केवल कर्ज वितरण बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। परियोजनाओं की व्यवहार्यता, रोजगार सृजन और निवेश की दीर्घकालिक क्षमता का मूल्यांकन भी जरूरी है।
पश्चिम बंगाल के लिए बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट का सुझाव
लाहिड़ी ने पश्चिम बंगाल में औद्योगिक विकास को गति देने के लिए कुछ बड़ी परियोजनाओं की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने गहरे समुद्र में आधुनिक बंदरगाह विकसित करने और सिंगूर में आधुनिक औद्योगिक पार्क स्थापित करने जैसे सुझाव दिए।
ऐसी परियोजनाएं राज्य की अर्थव्यवस्था को कई स्तरों पर प्रभावित कर सकती हैं। बंदरगाह से निर्यात और आयात की क्षमता बढ़ सकती है, जबकि औद्योगिक पार्क के माध्यम से नई कंपनियों और सहायक उद्योगों को अवसर मिल सकते हैं।
हालांकि, इन परियोजनाओं की सफलता के लिए जमीन, पर्यावरणीय स्वीकृति, परिवहन संपर्क, बिजली, पानी और स्थानीय लोगों की भागीदारी जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान देना होगा।
सिर्फ बड़े निवेश की घोषणा से औद्योगिक विकास सुनिश्चित नहीं होता। परियोजनाओं का समय पर पूरा होना और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
MSME को बढ़ावा देना क्यों जरूरी है?
लाहिड़ी ने छोटे और मध्यम उद्योगों यानी MSME की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, आज के बड़े औद्योगिक घरानों की शुरुआत भी कभी छोटे कारोबार से हुई थी।
MSME क्षेत्र रोजगार पैदा करने, स्थानीय उत्पादन बढ़ाने और नए उद्यमियों को आगे लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बैंकों के लिए सैकड़ों छोटे उद्यमों को अलग-अलग कर्ज देना प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि छोटे उद्योगों को वित्तीय सहायता से पीछे रखा जाए।
इसके लिए बैंकों को डिजिटल क्रेडिट मूल्यांकन, आसान ऋण प्रक्रिया, वित्तीय मार्गदर्शन और छोटे कारोबारियों की जरूरत के अनुसार उत्पाद विकसित करने होंगे।
यदि छोटे उद्योगों को समय पर पूंजी और बाजार उपलब्ध होता है, तो वे भविष्य में बड़े औद्योगिक उद्यम बन सकते हैं।
आगे भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने क्या चुनौती होगी?
आने वाले समय में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखना होगी।
एक तरफ वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता और मौसम संबंधी जोखिम हैं, तो दूसरी तरफ देश में रोजगार, निवेश और औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है।
ऐसे में मौद्रिक नीति, सरकारी निवेश और बैंकिंग क्षेत्र के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा। यदि महंगाई नियंत्रित रहती है और निवेश के अवसर बढ़ते हैं, तो उद्योगों के विस्तार और रोजगार सृजन को गति मिल सकती है।
निष्कर्ष: अशोक लाहिड़ी की सलाह का व्यापक संदेश यह है कि आर्थिक फैसले केवल तत्काल राहत को ध्यान में रखकर नहीं किए जाने चाहिए। महंगाई के जोखिम को समझते हुए मौद्रिक नीति में सावधानी और दूसरी तरफ पूर्वी भारत में उद्योगों तथा MSME के लिए निवेश के अवसर बढ़ाना जरूरी है। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कीमतों में स्थिरता और रोजगार पैदा करने वाले निवेश, दोनों के बीच संतुलन बनाना ही आने वाले समय की सबसे बड़ी आर्थिक परीक्षा होगी।




