Earthquake Alert: 24 घंटे में कई झटकों से दहशत, भारत में भूकंप के खतरे पर फिर उठे सवाल
नई दिल्ली: एशिया के कई हिस्सों में 22 और 23 अक्टूबर को भूकंपीय गतिविधियों की खबरों ने एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की तैयारी पर ध्यान खींचा है। उपलब्ध समाचार विवरण में भारत, तिब्बत, चीन, अफगानिस्तान, नेपाल, म्यांमार और पाकिस्तान में अलग-अलग तीव्रता के भूकंप दर्ज होने का उल्लेख है। इनमें तिब्बत क्षेत्र में 7.0 तीव्रता के एक बड़े भूकंप और उसके बाद कई झटकों की जानकारी दी गई है।
हालांकि, अलग-अलग देशों में दर्ज सभी भूकंपों को एक ही घटना का हिस्सा मानना सही नहीं होगा। भूकंप की संख्या, उसका केंद्र, गहराई और तीव्रता की पुष्टि संबंधित भूकंप निगरानी एजेंसियों के आंकड़ों से की जानी चाहिए। इसी तरह, जनहानि से जुड़े दावों की पुष्टि भी विश्वसनीय आधिकारिक जानकारी के आधार पर जरूरी है।
बार-बार झटके आने का क्या मतलब है?
किसी क्षेत्र में एक बड़े भूकंप के बाद छोटे-छोटे झटके महसूस होना असामान्य नहीं है। इन्हें आफ्टरशॉक्स कहा जाता है, जो मुख्य भूकंप के बाद चट्टानों में तनाव के पुनर्वितरण के कारण आ सकते हैं। लेकिन हर बाद का भूकंप आफ्टरशॉक नहीं होता। इसकी पहचान करने के लिए भूकंप के केंद्र, समय, गहराई और भूगर्भीय स्थिति का विश्लेषण आवश्यक है।
समाचार विवरण में तिब्बत में 7.0 तीव्रता के झटके के बाद कई अन्य झटकों का उल्लेख है। यदि ये उसी भूकंपीय घटना से संबंधित हैं, तो विशेषज्ञों के लिए उनका अध्ययन महत्वपूर्ण होगा। इससे प्रभावित क्षेत्र में इमारतों की स्थिरता, भूस्खलन की आशंका और राहत कार्यों की जरूरत का आकलन करने में मदद मिल सकती है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भूकंप की संख्या अधिक होने भर से किसी क्षेत्र में बड़े विनाश का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि भूकंप कितना शक्तिशाली था, कितनी गहराई पर आया, आबादी उससे कितनी दूर थी और वहां की इमारतें कितनी सुरक्षित थीं।
भारत में कहां-कहां दर्ज हुए झटके?
उपलब्ध विवरण के मुताबिक, भारत में नागालैंड, महाराष्ट्र के चंद्रपुर क्षेत्र, हिमाचल प्रदेश के चंबा और शिमला तथा बेंगलुरु में अलग-अलग तीव्रता के भूकंप दर्ज होने की जानकारी दी गई है। इनमें कई झटकों की तीव्रता 2 से 4 के बीच बताई गई है।
इस स्तर के भूकंप कई बार लोगों को महसूस भी नहीं होते, जबकि कुछ परिस्थितियों में हल्का कंपन महसूस हो सकता है। वास्तविक अनुभव स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों, इमारत की ऊंचाई और व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है।
भारत के इन अलग-अलग स्थानों पर भूकंप की खबरें सामने आने का अर्थ यह नहीं है कि सभी जगह एक ही भूकंप का प्रभाव पहुंचा। इनके केंद्रों और समय का वैज्ञानिक मिलान किए बिना किसी एक साझा कारण का दावा करना उचित नहीं होगा।
हिमालयी क्षेत्र में जोखिम क्यों बना रहता है?
हिमालय दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक है। भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच लगातार भूगर्भीय दबाव बनने से इस क्षेत्र में बड़े भूकंप आने की संभावना बनी रहती है। नेपाल, हिमाचल प्रदेश और तिब्बत के आसपास के क्षेत्रों में भूकंप संबंधी गतिविधियों का अध्ययन इसलिए विशेष महत्व रखता है।
लेकिन किसी विशेष दिन कई भूकंप दर्ज होने से यह साबित नहीं होता कि भारत में तत्काल कोई बड़ा भूकंप आने वाला है। मौजूदा विज्ञान किसी बड़े भूकंप का सटीक दिन, समय और स्थान पहले से विश्वसनीय ढंग से बताने में सक्षम नहीं है।
इसलिए सोशल मीडिया पर भूकंपों की संख्या के आधार पर किए जाने वाले भय पैदा करने वाले दावों से सावधान रहना चाहिए। जोखिम का आकलन दीर्घकालीन भूगर्भीय अध्ययन, स्थानीय निर्माण गुणवत्ता और आपदा प्रबंधन की तैयारी के आधार पर किया जाता है।
चीन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी गतिविधियां
समाचार विवरण में चीन और तिब्बत के अलावा अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में भी कई भूकंपों का उल्लेख है। नेपाल और म्यांमार में भी अलग-अलग समय पर झटके दर्ज होने की जानकारी दी गई है।
इन देशों के भूकंप संभावित क्षेत्रों में भौगोलिक और भूगर्भीय परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए सभी घटनाओं को एक ही श्रृंखला मानने के बजाय प्रत्येक भूकंप का केंद्र और संबंधित टेक्टोनिक संरचना देखना अधिक उपयोगी होगा।
तिब्बत में बताए गए बड़े भूकंप की पुष्टि और उसके बाद संभावित नुकसान की जानकारी राहत एवं बचाव की जरूरत समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जब तक आधिकारिक आकलन उपलब्ध न हो, तब तक जनहानि या प्रभावित आबादी के बारे में अपुष्ट आंकड़े साझा करने से बचना चाहिए।
भूकंप आने पर लोगों को क्या करना चाहिए?
भूकंप के दौरान घबराकर सीढ़ियों या लिफ्ट की ओर भागने के बजाय सुरक्षित व्यवहार अपनाना जरूरी है।
- घर या कार्यालय के अंदर हों, तो मजबूत मेज के नीचे झुकें, सिर और गर्दन को ढकें तथा कंपन रुकने तक सहारा लेकर रहें।
- खिड़कियों, शीशों, अलमारियों और गिर सकने वाली भारी वस्तुओं से दूर रहें।
- बाहर हों, तो इमारतों, बिजली के खंभों, पेड़ों और अन्य संभावित गिरने वाली वस्तुओं से दूर खुली जगह पर जाएं।
- कंपन रुकने के बाद क्षतिग्रस्त इमारत में दोबारा प्रवेश न करें, जब तक उसे सुरक्षित घोषित न किया जाए।
- प्रभावित क्षेत्र में हों, तो स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के निर्देशों का पालन करें।
भूकंप के बाद भी छोटे झटके आ सकते हैं, इसलिए क्षतिग्रस्त इमारतों और भूस्खलन संभावित ढलानों के आसपास विशेष सावधानी जरूरी है।
आगे की तैयारी क्यों जरूरी है?
भूकंप से होने वाले नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका केवल चेतावनी का इंतजार करना नहीं, बल्कि पहले से तैयारी करना है। भवन निर्माण नियमों का पालन, पुराने और कमजोर ढांचों का सुरक्षा ऑडिट, स्कूलों तथा अस्पतालों में नियमित अभ्यास और स्थानीय आपातकालीन योजनाएं जनहानि कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
भारत के भूकंप संभावित क्षेत्रों में शहरी विस्तार और निर्माण गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षित भवनों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। घरों में भारी फर्नीचर को सुरक्षित तरीके से लगाना, आपातकालीन संपर्कों की सूची रखना और परिवार के साथ निकासी योजना बनाना भी उपयोगी कदम हैं।




