Tender Controversy: छत्तीसगढ़ के ₹5,576 करोड़ के टेंडर पर गंभीर सवाल, पुरानी मुहर और अफसरों की भूमिका जांच के घेरे में
छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग की तीन बड़ी परियोजनाओं से जुड़े ₹5,576 करोड़ के टेंडर विवाद ने सरकारी खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता, प्रशासनिक अधिकारों और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि मंत्रालय से पदस्थापना बदलने के लगभग 49 दिन बाद भी एक अधिकारी ने पुराने पदनाम की मुहर से निविदा दस्तावेजों को मंजूरी दी। इसी प्रक्रिया में पात्रता तय करने वाली समिति की अध्यक्षता को लेकर भी आपत्तियां सामने आई हैं।
मामला केवल एक मुहर या एक अधिकारी के पदनाम तक सीमित नहीं है। इतने बड़े सार्वजनिक खर्च वाली परियोजनाओं में यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि ठेकेदारों की पात्रता तय करने से लेकर निविदा खोलने और अंतिम चयन तक हर कदम नियमों के अनुसार हो। यदि प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच सार्वजनिक धन और सरकारी संस्थानों पर भरोसा बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।
Tender Controversy: किन तीन परियोजनाओं पर उठे सवाल?
विवाद जल संसाधन विभाग की तीन परियोजनाओं की निविदा प्रक्रिया से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनके अनुमानित मूल्य इस प्रकार हैं:
- सिकासार-कोडार लिंक कैनाल: ₹2,549.86 करोड़
- मटनार-देवरगांव बैराज: ₹1,636.69 करोड़
- मोहमेला-सिरपुर बैराज: ₹574.73 करोड़
इन परियोजनाओं का कुल उल्लेखित मूल्य ₹4,761.28 करोड़ होता है, जबकि खबर में तीनों महापरियोजनाओं के टेंडर का कुल आंकड़ा ₹5,576 करोड़ बताया गया है। दोनों आंकड़ों में अंतर है, इसलिए परियोजनाओं के अंतिम स्वीकृत मूल्य और कुल निविदा राशि का आधिकारिक दस्तावेजों से मिलान जरूरी है।
इतनी बड़ी परियोजनाओं में ठेकेदार का तकनीकी अनुभव, वित्तीय क्षमता, पहले से चल रहे काम और समयसीमा पूरी करने की योग्यता का सही मूल्यांकन बेहद अहम है। पात्रता की शर्तें यदि किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए बदली जाती हैं, तो प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इस मामले में कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोपों की पुष्टि जांच और आधिकारिक निष्कर्षों से ही हो सकती है।
49 दिन बाद पुरानी मुहर से मंजूरी का आरोप क्यों गंभीर है?
मामले में उठाए गए प्रमुख सवालों में से एक तत्कालीन विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (OSD) मक्सी कुजूर की भूमिका से संबंधित है। खबर में दिए गए दस्तावेजी विवरण के अनुसार, उन्हें 6 अप्रैल 2026 को मंत्रालय में OSD के पद से मुक्त कर मुख्य अभियंता, महानदी परियोजना, रायपुर के पद पर पदस्थ किया गया था।
इसके बाद 25 मई 2026 को तीनों परियोजनाओं के निविदा और फॉर्म-एफ दस्तावेजों पर ‘Approved’ लिखे जाने तथा ‘विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी, मंत्रालय’ की मुहर इस्तेमाल किए जाने का आरोप है। दोनों तारीखों के बीच लगभग 49 दिन का अंतर बताया गया है।
इस बिंदु पर कुछ सवालों का स्पष्ट उत्तर जरूरी है:
- क्या संबंधित अधिकारी को उस समय इन दस्तावेजों को मंजूरी देने का वैध अधिकार प्राप्त था?
- क्या मंजूरी किसी अधिकृत ई-ऑफिस प्रक्रिया के तहत दी गई थी?
- क्या पुरानी मुहर का उपयोग केवल पदनाम से जुड़ी प्रशासनिक त्रुटि थी या इसके पीछे अधिकारों के इस्तेमाल का कोई बड़ा प्रश्न था?
- दस्तावेजों को मंजूरी देने की प्रक्रिया में किस-किस अधिकारी की भूमिका थी?
केवल पुरानी मुहर दिखाई देने से अपने आप यह सिद्ध नहीं हो जाता कि पूरी निविदा प्रक्रिया अवैध थी। लेकिन यदि किसी अधिकारी ने पदस्थापना बदलने के बाद अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय लिया, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर विषय बन सकता है। इसका निर्धारण संबंधित आदेशों, डिजिटल रिकॉर्ड और लागू सेवा नियमों की जांच से होना चाहिए।
पात्रता समिति की अध्यक्षता को लेकर भी विवाद
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि प्री-क्वालिफिकेशन समिति की अध्यक्षता मुख्य अभियंता (प्रबोधन) को करनी थी, लेकिन प्रमुख अभियंता जितेन्द्र नेताम ने शासन से अनुमति लिए बिना समिति की अध्यक्षता स्वयं संभाल ली।
निविदा प्रक्रिया में प्री-क्वालिफिकेशन चरण का उद्देश्य यह जांचना होता है कि बोली लगाने वाली कंपनियां निर्धारित तकनीकी और वित्तीय मानकों को पूरा करती हैं या नहीं। इसी चरण में यदि पात्रता का आकलन निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से नहीं होता, तो आगे की प्रतिस्पर्धा की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए समिति की संरचना, अध्यक्ष की नियुक्ति, निर्णय लेने के अधिकार और अनुमोदन की प्रक्रिया की जांच आवश्यक है। यदि नियमों के विपरीत समिति बनाई गई थी, तो यह भी देखना होगा कि इससे निर्णयों पर वास्तविक प्रभाव पड़ा या नहीं।
कंपनियों को पात्र बनाने में पक्षपात के आरोप
रिपोर्ट में मटनार-देवरगांव बैराज परियोजना के संबंध में NCC लिमिटेड और ऋत्विक प्रोजेक्ट्स तथा मोहमेला-सिरपुर बैराज परियोजना में ओम मेटल्स सहित अन्य कंपनियों को लाभ पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं। आरोपों के अनुसार, कुछ कंपनियों के कार्य-प्रगति विवरण (वर्क-इन-हैंड) और अनुभव संबंधी शर्तों पर सवाल थे, फिर भी उन्हें पात्र माना गया।
इन आरोपों की जांच में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी कंपनी को पात्र घोषित किया गया था या नहीं। यह भी जांचना होगा कि निविदा की मूल शर्तें क्या थीं, संबंधित कंपनियों ने कौन-से दस्तावेज जमा किए, मूल्यांकन समिति ने क्या कारण दर्ज किए और सभी बोलीदाताओं पर समान मानक लागू किए गए या नहीं।
यदि किसी कंपनी को नियमों में ढील देकर लाभ दिया गया हो, तो इससे सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा और परियोजना की लागत पर असर पड़ सकता है। लेकिन जब तक दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच से निष्कर्ष सामने नहीं आते, तब तक संबंधित कंपनियों या अधिकारियों को दोषी मानना उचित नहीं होगा।
आपत्ति उठाने वाले अधिकारियों को हटाने के आरोप
इस मामले का एक और संवेदनशील पहलू उन अधिकारियों की सेवा और पदस्थापना से जुड़ा है, जिन्होंने कथित तौर पर निविदा प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी।
रिपोर्ट में संविदा अधिकारी गुरुवर के इस्तीफे, दूसरे संविदा अधिकारी भागवत की सेवा समाप्ति और कार्यपालन अभियंता शिवराम सिधारे को प्रमुख अभियंता कार्यालय से संबद्ध किए जाने का उल्लेख है। आरोप है कि ये कदम निविदा प्रक्रिया से जुड़ी आपत्तियों के बाद उठाए गए।
यदि किसी अधिकारी को नियमों के पालन की मांग करने या अनियमितता की आशंका उठाने के कारण प्रतिकूल कार्रवाई का सामना करना पड़ा हो, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था में स्वतंत्र आपत्ति दर्ज कराने की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है। दूसरी ओर, पदस्थापना या सेवा समाप्ति से जुड़े निर्णयों के अपने प्रशासनिक कारण भी हो सकते हैं। इसलिए प्रत्येक मामले में आदेश, नोटिस, सेवा शर्तें और संबंधित रिकॉर्ड देखना जरूरी है।
एक मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारियों को तथ्यात्मक आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए। शिकायतों की जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और शिकायतकर्ता के विरुद्ध किसी कार्रवाई को भी स्पष्ट कारणों तथा लागू नियमों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
पूर्व विधायक की शिकायत और विभाग का पक्ष
रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव और आर्थिक अपराध अन्वेषण से जुड़े अधिकारियों को पत्र लिखकर मामले की जांच, 14 अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई और टेंडर निरस्त करने की मांग की है।
दूसरी ओर, जल संसाधन विभाग के सचिव राजेश सुकुमार टोप्पो ने कहा है कि निविदा प्रक्रिया नियमानुसार की गई और उच्च न्यायालय ने भी इसे मान्य किया है।
इन दोनों पहलुओं को साथ रखकर देखना जरूरी है। शिकायत में लगाए गए आरोप अपने आप में अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं, जबकि विभाग का पक्ष भी विवाद के प्रत्येक तथ्य की स्वतंत्र जांच का विकल्प नहीं बनता। उच्च न्यायालय की कार्यवाही का सटीक दायरा और आदेश में किन मुद्दों पर विचार किया गया, यह संबंधित न्यायिक दस्तावेज देखकर ही स्पष्ट किया जा सकता है।
यदि न्यायालय ने किसी विशिष्ट पहलू पर निर्णय दिया है, तो उसका अर्थ पूरे मामले के हर आरोप पर निर्णय होना जरूरी नहीं है। इसलिए न्यायिक आदेश, विभागीय रिकॉर्ड और शिकायत में उठाए गए सवालों का अलग-अलग परीक्षण महत्वपूर्ण रहेगा।
₹5,576 करोड़ के सार्वजनिक खर्च में पारदर्शिता क्यों जरूरी?
बड़ी सिंचाई परियोजनाओं का असर केवल निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहता। इनका संबंध जल प्रबंधन, कृषि, स्थानीय विकास और सरकारी बजट के उपयोग से होता है। निविदा प्रक्रिया में देरी या विवाद होने पर परियोजनाओं की लागत, काम शुरू होने की समयसीमा और संभावित लाभ प्रभावित हो सकते हैं।
ऐसे मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि:
- निविदा की पात्रता शर्तें और उनमें किए गए बदलाव रिकॉर्ड पर उपलब्ध हों।
- समिति की नियुक्ति और अनुमोदन से जुड़े आदेश स्पष्ट हों।
- सभी बोलीदाताओं का मूल्यांकन समान मानकों पर किया जाए।
- ई-ऑफिस की टाइमस्टैम्प, अनुमोदन रिकॉर्ड और डिजिटल लॉग सुरक्षित रखे जाएं।
- शिकायतों और आपत्तियों की स्वतंत्र जांच हो तथा निष्कर्षों के आधार पर उचित कार्रवाई की जाए।
इन प्रक्रियाओं से न केवल किसी संभावित अनियमितता का पता लगाया जा सकता है, बल्कि भविष्य की परियोजनाओं में विवाद और देरी की आशंका भी कम की जा सकती है।
आगे क्या होना चाहिए?
इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण अगला कदम दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट और निष्पक्ष जांच है। संबंधित अधिकारियों की पदस्थापना के आदेश, मंजूरी की तारीखें, ई-ऑफिस रिकॉर्ड, समिति गठन संबंधी आदेश और कंपनियों की पात्रता से जुड़े दस्तावेजों का मिलान किया जाना चाहिए।
जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कथित अनियमितताओं से निविदा के परिणाम पर कोई प्रभाव पड़ा या नहीं। यदि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो लागू कानून और सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। टेंडर रद्द करने या दोबारा प्रक्रिया शुरू करने जैसे निर्णय भी संबंधित कानूनी और तकनीकी निष्कर्षों के आधार पर ही होने चाहिए।




