भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी गिरावट: 2 हफ्तों में 31 अरब डॉलर से ज्यादा घटा खजाना, रुपये पर बढ़ सकती है चुनौती
भारत की आर्थिक ताकत का आकलन केवल शेयर बाजार, जीडीपी या विदेशी निवेश के आंकड़ों से नहीं होता। देश के पास कितना विदेशी मुद्रा भंडार है और जरूरत पड़ने पर वह रुपये को कितना सहारा दे सकता है, यह भी आर्थिक स्थिरता का अहम पैमाना है। इसी मोर्चे पर भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मुताबिक, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 12.952 अरब डॉलर घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया।
इससे पहले 25 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भी भंडार में 18.343 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी। यानी इन दो सप्ताह में कुल गिरावट करीब 31.3 अरब डॉलर रही। हालांकि, इसे सीधे आर्थिक संकट का संकेत मानना सही नहीं होगा। विदेशी मुद्रा भंडार में बदलाव के पीछे रुपये की चाल, विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक की गतिविधियां, अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्य और सोने की कीमत जैसे कई कारक हो सकते हैं।
रिकॉर्ड स्तर से नीचे आया विदेशी मुद्रा भंडार
सितंबर की शुरुआत में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 785.706 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। इसके बाद लगातार दो सप्ताह गिरावट आने से यह 734.606 अरब डॉलर पर आ गया। इस अंतर को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि भंडार में बढ़ोतरी किन कारणों से हुई थी और हाल की कमी में किन घटकों की भूमिका रही।
विदेशी मुद्रा भंडार किसी देश के लिए वित्तीय सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। इसमें विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां, सोना, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से जुड़े कुछ भंडार और अन्य निर्धारित घटक शामिल होते हैं। जरूरत पड़ने पर RBI विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है, जिससे रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित करने में मदद मिल सकती है।
भंडार में कमी का अर्थ यह नहीं है कि उतनी ही राशि देश से स्थायी रूप से बाहर चली गई। इसके लिए यह समझना जरूरी है कि गिरावट बाजार में डॉलर की मांग, केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप, परिसंपत्तियों के मूल्यांकन या दूसरे कारणों से आई है।
विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में सबसे ज्यादा कमी
RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां (Foreign Currency Assets) 10.664 अरब डॉलर घटकर 604.747 अरब डॉलर रह गईं। विदेशी मुद्रा भंडार का यह सबसे बड़ा हिस्सा होता है।
इन परिसंपत्तियों में अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और येन जैसी दूसरी विदेशी मुद्राओं से जुड़ी संपत्तियां भी शामिल होती हैं। जब इन मुद्राओं का डॉलर के मुकाबले मूल्य बदलता है, तो डॉलर में मापा गया भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा विदेशी मुद्रा बाजार में RBI की गतिविधियां भी इन आंकड़ों पर असर डाल सकती हैं।
इसलिए केवल विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में गिरावट देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि पूरा पैसा बाजार में खर्च कर दिया गया। गिरावट के वास्तविक कारणों को समझने के लिए संबंधित सप्ताह के विस्तृत आंकड़ों और बाजार की परिस्थितियों को साथ देखकर विश्लेषण करना जरूरी है।
सोने के भंडार का मूल्य भी घटा
विदेशी मुद्रा भंडार के दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से यानी सोने के भंडार के मूल्य में भी कमी दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, इसका मूल्य 2.288 अरब डॉलर घटकर 106.413 अरब डॉलर रह गया।
सोने के भंडार का डॉलर में मूल्य केवल सोने की मात्रा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों से भी प्रभावित होता है। इसलिए मूल्य में गिरावट का मतलब जरूरी नहीं कि RBI ने उतनी मात्रा में सोना बेच दिया हो।
वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास भारत के विशेष आहरण अधिकार (SDR) में 1.5 करोड़ डॉलर की मामूली बढ़ोतरी हुई और यह 18.656 अरब डॉलर पर पहुंच गया। दूसरी ओर, IMF में भारत की रिजर्व स्थिति 1.5 करोड़ डॉलर घटकर 4.789 अरब डॉलर रह गई।
ये बदलाव दिखाते हैं कि कुल विदेशी मुद्रा भंडार कई अलग-अलग परिसंपत्तियों का सम्मिलित परिणाम है। किसी एक घटक में कमी को पूरे भंडार की स्थिति का पूरा चित्र नहीं माना जा सकता।
भारत-अमेरिका बॉन्ड यील्ड का अंतर क्यों है महत्वपूर्ण?
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के साथ भारतीय रुपये और विदेशी निवेश पर असर डालने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भारत और अमेरिका के सरकारी बॉन्ड की यील्ड का अंतर है। बॉन्ड यील्ड से आशय उस प्रतिफल से है जो निवेशक सरकारी बॉन्ड में निवेश के बदले हासिल कर सकते हैं।
दिए गए स्रोत के मुताबिक, भारत और अमेरिका के 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड का अंतर घटकर 194 आधार अंक यानी 1.94 प्रतिशत रह गया था। रिपोर्ट में भारतीय बॉन्ड की यील्ड 7.29 प्रतिशत और अमेरिकी 10 वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5.35 प्रतिशत बताई गई है।
विदेशी निवेशक भारत में निवेश करते समय केवल ब्याज या यील्ड नहीं देखते। वे रुपये में संभावित उतार-चढ़ाव, निवेश से जुड़े जोखिम, बाजार की तरलता और भविष्य की आर्थिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखते हैं। यदि अमेरिकी बॉन्ड अपेक्षाकृत आकर्षक प्रतिफल देने लगते हैं, तो कुछ निवेशक अपने निवेश का हिस्सा अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर ले जा सकते हैं।
हालांकि, कम यील्ड अंतर का अर्थ यह नहीं है कि विदेशी निवेश निश्चित रूप से भारत से बाहर जाएगा। भारत की विकास संभावनाएं, कंपनियों की कमाई, बाजार का प्रदर्शन और निवेश नीतियां भी विदेशी निवेश के फैसलों को प्रभावित करती हैं।
रुपये पर कैसे पड़ सकता है दबाव?
जब डॉलर की मांग बढ़ती है और विदेशी निवेश का प्रवाह कमजोर होता है, तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा कच्चे तेल के आयात, व्यापार घाटे और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों का भी रुपये की चाल पर असर पड़ता है।
यदि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो भारत के लिए कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और दूसरे आयात महंगे हो सकते हैं। इससे कंपनियों की लागत बढ़ने और कुछ वस्तुओं की कीमतों पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है। दूसरी ओर, कमजोर रुपया कुछ निर्यातकों को विदेशी बाजारों में मूल्य प्रतिस्पर्धा में मदद भी कर सकता है। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित कारोबार में आयातित सामग्री की कितनी जरूरत है और कंपनियां विनिमय दर के जोखिम को किस तरह संभालती हैं।
इसीलिए विदेशी मुद्रा भंडार, बॉन्ड यील्ड और रुपये की चाल को अलग-अलग घटनाओं की तरह नहीं देखना चाहिए। ये सभी वैश्विक ब्याज दरों, निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा और भारत के बाहरी भुगतान संतुलन से प्रभावित हो सकते हैं।
क्या विदेशी मुद्रा भंडार की गिरावट चिंता की बात है?
लगातार दो सप्ताह गिरावट जरूर निगरानी का विषय है, लेकिन केवल इस आधार पर किसी वित्तीय संकट का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। भारत का भंडार सितंबर की शुरुआत में रिकॉर्ड स्तर पर था और 2 अक्टूबर के आंकड़े में भी यह 734 अरब डॉलर से अधिक था। फिर भी, भंडार की पर्याप्तता का आकलन केवल कुल डॉलर राशि से नहीं किया जाता।
विश्लेषक आम तौर पर यह भी देखते हैं कि भंडार कितने महीनों के आयात को कवर कर सकता है, देश पर कितना अल्पकालिक विदेशी कर्ज है, बाहरी भुगतान की जरूरतें क्या हैं और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां किस दिशा में जा रही हैं।
यदि गिरावट अस्थायी मूल्यांकन बदलाव या सीमित बाजार हस्तक्षेप के कारण हुई है, तो उसका अर्थ अलग होगा। लेकिन अगर लंबे समय तक विदेशी मुद्रा की मांग बनी रहती है, पूंजी का प्रवाह कमजोर पड़ता है और भंडार लगातार घटता है, तो स्थिति पर अधिक बारीकी से नजर रखने की जरूरत होगी।
आने वाले समय में किन संकेतकों पर रहेगी नजर?
आगे की स्थिति समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण संकेतकों पर ध्यान देना होगा:
- विदेशी मुद्रा भंडार के साप्ताहिक आंकड़े: इससे पता चलेगा कि गिरावट जारी है या भंडार में स्थिरता लौट रही है।
- डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल: लगातार दबाव रहने पर आयात लागत और विदेशी निवेशकों के फैसलों पर असर पड़ सकता है।
- भारत-अमेरिका बॉन्ड यील्ड अंतर: यह विदेशी निवेशकों के लिए दोनों बाजारों के प्रतिफल की तुलना में एक अहम संकेतक है, हालांकि अकेला निर्णायक कारक नहीं।
- कच्चे तेल और दूसरे आयातों की लागत: महंगे आयात से डॉलर की मांग और चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है।
- विदेशी निवेश का प्रवाह: शेयर और बॉन्ड बाजार में निवेशकों की गतिविधियां रुपये और वित्तीय बाजारों को प्रभावित कर सकती हैं।
इन संकेतकों को साथ रखकर ही यह समझा जा सकता है कि विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट अस्थायी उतार-चढ़ाव है या बाहरी क्षेत्र में बढ़ते दबाव का संकेत।



