एमसीबी में बुजुर्गों के लिए बड़ी राहत: मेगा स्वास्थ्य शिविर में सम्मान के साथ मिले सहायक उपकरण
एमसीबी। उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां ही नहीं बढ़तीं, बल्कि चलने-फिरने, सुनने, देखने और रोजमर्रा के कामों में आत्मनिर्भरता भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में किसी बुजुर्ग को केवल सम्मानित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी वास्तविक जरूरत को पहचानकर व्यावहारिक सहायता उपलब्ध कराना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। एमसीबी जिले के पोड़ी चिरमिरी स्थित मंगल भवन में आयोजित मेगा स्वास्थ्य शिविर ने इसी सोच को जमीन पर उतारने की कोशिश की है।
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बुजुर्गों को शॉल और माला पहनाकर सम्मानित किया गया। इसके साथ ही जरूरतमंद वरिष्ठ नागरिकों को वॉकिंग स्टिक समेत अन्य सहायक उपकरण उपलब्ध कराए गए। कार्यक्रम महापौर रामनरेश राय की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें सभापति संतोष सिंह सहित जनप्रतिनिधि और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे।
सम्मान से आगे बढ़कर जरूरत के मुताबिक मदद
इस आयोजन की खास बात यह रही कि वृद्धजनों के सम्मान को स्वास्थ्य सेवाओं और सहायक उपकरणों से जोड़ा गया। शिविर में स्वास्थ्य परीक्षण के बाद जरूरत का आकलन किया जा रहा है और पात्र हितग्राहियों को चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर उपकरण दिए जा रहे हैं।
अब तक करीब 100 श्रवण यंत्र और 150 वॉकिंग स्टिक वितरित किए जा चुके हैं। वहीं 450 से अधिक लोगों की दृष्टि जांच की गई है। जांच के आधार पर जरूरतमंद लोगों को चश्मे उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी की जा रही है।
इस तरह की व्यवस्था का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि किसी बुजुर्ग के लिए वॉकिंग स्टिक महज एक उपकरण नहीं होती। वह गिरने के जोखिम को कम करने, घर से बाहर निकलने का आत्मविश्वास बढ़ाने और दैनिक गतिविधियों में स्वतंत्रता बनाए रखने का साधन बन सकती है। इसी तरह श्रवण यंत्र सामाजिक संवाद और परिवार से जुड़ाव बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एक ही स्थान पर जांच से बढ़ी सुविधा
शिविर में स्वास्थ्य विभाग और समाज कल्याण विभाग के समन्वय से जांच, चिकित्सकीय परामर्श और सहायक उपकरण उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बुजुर्गों के लिए ऐसी एकीकृत व्यवस्था विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, क्योंकि अलग-अलग सेवाओं के लिए बार-बार अस्पताल या कार्यालय जाना उनके लिए कठिन होता है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अविनाश खरे के अनुसार, शिविर में स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान के साथ यह भी देखा जा रहा है कि संबंधित व्यक्ति को किस प्रकार के सहायक उपकरण की आवश्यकता है। आवश्यकता होने पर आगे के उपचार और रेफरल में भी सहयोग किया जा रहा है।
NPHCE का फोकस सिर्फ इलाज नहीं, स्वस्थ वृद्धावस्था पर
इस पहल को राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम यानी NPHCE से भी जोड़ा गया है। कार्यक्रम का व्यापक उद्देश्य 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिकों को सुलभ एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के साथ स्वस्थ और सक्रिय वृद्धावस्था को बढ़ावा देना है।
जिला नोडल अधिकारी डॉ. नम्रता चक्रवर्ती ने वृद्धजनों की देखभाल में परिवार, स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक सहयोग की भूमिका पर जानकारी दी। मौजूदा दौर में वृद्धावस्था को केवल बीमारी और निर्भरता के नजरिए से देखने के बजाय सक्रिय एवं गरिमापूर्ण जीवन से जोड़ना स्वास्थ्य नीति के लिहाज से भी अहम माना जाता है।
असली चुनौती शिविर के बाद शुरू होती है
ऐसे शिविर तत्काल राहत तो देते हैं, लेकिन इनकी सफलता का वास्तविक पैमाना यह होगा कि शिविर में सामने आई स्वास्थ्य समस्याओं पर आगे कितनी निरंतर कार्रवाई होती है। किसी बुजुर्ग की दृष्टि संबंधी समस्या सामने आने के बाद चश्मा मिलना पहला कदम है; नियमित जांच और जरूरत पड़ने पर उपचार तक पहुंच सुनिश्चित करना अगला जरूरी चरण है।
इसी तरह श्रवण यंत्र या व्हीलचेयर उपलब्ध कराने के बाद उसके सही इस्तेमाल, रखरखाव और आवश्यकता पड़ने पर फॉलोअप की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी। विशेषज्ञ दृष्टिकोण से देखें तो वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल को एक-दिवसीय कार्यक्रम के बजाय निरंतर सेवा-श्रृंखला के रूप में विकसित करने से इसका प्रभाव कहीं अधिक बढ़ सकता है।
परिवार की भूमिका भी उतनी ही जरूरी
कार्यक्रम में महापौर रामनरेश राय ने बुजुर्गों की देखभाल को परिवार और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बताया। यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद बुजुर्गों की रोजमर्रा की देखभाल में परिवार की भूमिका बनी रहती है।
उम्र बढ़ने के साथ अकेलापन, गतिशीलता में कमी और सुनने-देखने की समस्याएं सामाजिक दूरी बढ़ा सकती हैं। इसलिए स्वास्थ्य जांच के साथ भावनात्मक सहयोग, नियमित संवाद और सम्मानजनक व्यवहार भी वृद्धजनों के जीवन की गुणवत्ता के लिए जरूरी हैं।
आगे की दिशा क्या हो सकती है?
एमसीबी जैसे जिलों में इस मॉडल को नियमित फॉलोअप से जोड़ना एक उपयोगी कदम हो सकता है। शिविर में चिन्हित बुजुर्गों का रिकॉर्ड, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच, उपकरणों की कार्यक्षमता की समीक्षा और गंभीर मामलों को विशेषज्ञ सेवाओं से जोड़ने की व्यवस्था तैयार की जाए तो इसका लाभ लंबे समय तक मिल सकता है।
मेगा स्वास्थ्य शिविर की पहल का सबसे सकारात्मक पक्ष यही है कि यहां सम्मान को सहायता और सहायता को स्वास्थ्य सेवा से जोड़ा गया है। बुजुर्गों के लिए गरिमापूर्ण जीवन का अर्थ केवल उन्हें सम्मान देना नहीं, बल्कि उन्हें यथासंभव स्वस्थ, सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाए रखना भी है। एमसीबी में आयोजित यह प्रयास इसी दिशा में एक उपयोगी कदम के रूप में देखा जा सकता है।



