निजी निवेश को लेकर वित्त मंत्री का बड़ा आह्वान, R&D में बढ़ेगी भागीदारी तो भारत की विकास रफ्तार को मिलेगा नया बल
भारत की अर्थव्यवस्था के सामने अब सिर्फ तेज विकास दर बनाए रखने की चुनौती नहीं है, बल्कि उस विकास को लंबे समय तक टिकाऊ, रोजगार पैदा करने वाला और वैश्विक झटकों से सुरक्षित बनाने की जरूरत भी बढ़ गई है। इसी संदर्भ में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने निजी क्षेत्र से निवेश चक्र की अगुवाई करने और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च बढ़ाने की अपील की है।
3 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितता अब कोई अस्थायी स्थिति नहीं, बल्कि आर्थिक नीति के लिए लगातार मौजूद रहने वाली वास्तविकता है। ऐसे में resilience यानी आर्थिक मजबूती को एक बार तैयार करके छोड़ना पर्याप्त नहीं होगा; इसे लगातार मजबूत करना होगा।
सरकारी निवेश के बाद अब निजी क्षेत्र की बारी
पिछले वर्षों में भारत के विकास मॉडल में सरकारी पूंजीगत खर्च ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सड़क, रेलवे, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल नेटवर्क और अन्य बुनियादी ढांचे में निवेश ने अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने का आधार तैयार किया है।
लेकिन किसी बड़ी अर्थव्यवस्था में सरकार अकेले लंबे समय तक निवेश का इंजन नहीं बन सकती। निजी कंपनियों का नया प्लांट लगाना, तकनीक खरीदना, क्षमता बढ़ाना, स्टार्टअप में पूंजी लगाना और नई तकनीकों पर शोध करना ही अगले चरण में निवेश की गति को व्यापक बना सकता है।
वित्त मंत्री का संदेश इसी बदलाव की ओर इशारा करता है—सरकार द्वारा तैयार किए गए आधार पर अब उद्योग को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ना होगा। Business Standard ने भी उनके बयान को निजी पूंजीगत निवेश और R&D को अगले आर्थिक चक्र का प्रमुख आधार बनाने के आह्वान के रूप में रिपोर्ट किया है।
GDP की तेज रफ्तार के बीच निवेश का संकेत
भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में 7.8 प्रतिशत वास्तविक GDP वृद्धि दर्ज की। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इसी अवधि में वास्तविक निवेश में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल खपत बढ़ने से अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक उत्पादन क्षमता नहीं बनती। कारखाने, मशीनरी, तकनीक, अनुसंधान और बुनियादी ढांचे पर खर्च ही भविष्य की क्षमता तैयार करता है।
हालांकि, यहां एक सावधानी भी जरूरी है। कुल Gross Fixed Capital Formation में बढ़ोतरी को पूरी तरह निजी कंपनियों के निवेश के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि राष्ट्रीय खातों के आंकड़े निवेश की पूरी वृद्धि को संस्थागत क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग नहीं बताते। इसलिए निजी निवेश चक्र के मजबूत होने के संकेतों को अन्य आंकड़ों के साथ पढ़ना ज्यादा उचित है।
सबसे बड़ी चुनौती: R&D में भारत अभी पीछे
वित्त मंत्री ने भारत की एक अहम कमजोरी की ओर भी ध्यान दिलाया। भारत का R&D खर्च GDP का लगभग 0.83 प्रतिशत है, जबकि OECD देशों में यह औसतन करीब 2.7 प्रतिशत बताया गया है। भारत के कुल R&D खर्च में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी लगभग 36 प्रतिशत है।
यहीं से भारत की अगली आर्थिक चुनौती सामने आती है।
अगर देश केवल विदेशी तकनीक खरीदकर उत्पादन बढ़ाता है, तो वह विनिर्माण क्षमता तो विकसित कर सकता है, लेकिन अत्याधुनिक तकनीक का मालिक बनने की गति सीमित रह सकती है। इसके उलट यदि कंपनियां अपनी प्रयोगशालाओं, पेटेंट, प्रोटोटाइप, डीप-टेक और नई उत्पादन तकनीकों पर खर्च बढ़ाती हैं, तो आर्थिक विकास का अगला चरण ज्यादा उच्च-मूल्य वाला हो सकता है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत कितना उत्पादन करता है। बड़ा सवाल यह है कि भारत कितनी नई तकनीक खुद विकसित करता है।
₹1 लाख करोड़ की RDI योजना क्यों अहम है?
निजी क्षेत्र को अनुसंधान और नवाचार की दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए सरकार पहले ही ₹1 लाख करोड़ के Research, Development and Innovation (RDI) Scheme का ढांचा तैयार कर चुकी है। सरकारी बजट दस्तावेजों के अनुसार इसका उद्देश्य निजी क्षेत्र आधारित R&D और innovation को बढ़ावा देना तथा transformative और strategic technology क्षेत्रों में लंबी अवधि का वित्त उपलब्ध कराना है।
इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि R&D का परिणाम तुरंत मुनाफे के रूप में नहीं आता। किसी नई दवा, सेमीकंडक्टर तकनीक, रक्षा प्रणाली, ऊर्जा समाधान या AI आधारित तकनीक को बाजार तक पहुंचने में वर्षों लग सकते हैं।
ऐसे क्षेत्रों में शुरुआती जोखिम कम करने के लिए लंबी अवधि की पूंजी और नीति समर्थन निजी कंपनियों के निर्णय को प्रभावित कर सकता है।
निवेश बढ़ेगा तो रोजगार का स्वरूप भी बदल सकता है
निजी निवेश का प्रभाव केवल GDP तक सीमित नहीं रहता। नई उत्पादन इकाइयां और तकनीकी निवेश सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स, सेवाओं और कौशल विकास की मांग भी बढ़ाते हैं।
लेकिन भविष्य के रोजगारों की प्रकृति पहले जैसी नहीं होगी। AI, ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और advanced manufacturing के विस्तार के साथ कंपनियों को ऐसे कर्मचारियों की जरूरत होगी जो तकनीक को समझ सकें और उसके साथ काम कर सकें।
इसलिए निवेश और कौशल विकास को अलग-अलग नीतियों की तरह देखने के बजाय एक ही आर्थिक रणनीति का हिस्सा बनाना होगा।
सिर्फ ज्यादा निवेश नहीं, सही निवेश भी जरूरी
निजी क्षेत्र से निवेश बढ़ाने की अपील तभी प्रभावी होगी जब कंपनियों को लंबे समय की नीति स्पष्टता, पर्याप्त मांग, प्रतिस्पर्धी वित्त, तेज मंजूरी और भरोसेमंद कारोबारी वातावरण मिले।
दूसरी तरफ कंपनियों के लिए भी चुनौती है कि निवेश केवल मौजूदा क्षमता बढ़ाने तक सीमित न रहे। R&D, उत्पाद डिजाइन, intellectual property और नई तकनीक में निवेश बढ़ाना ही भारतीय उद्योग को वैश्विक value chain में ऊपर ले जा सकता है।
यही वह बिंदु है जहां “Made in India” से आगे बढ़कर भारत में तकनीक की कल्पना, डिजाइन और विकास की क्षमता महत्वपूर्ण हो जाती है।
रणनीतिक संसाधनों की सुरक्षा भी विकास का हिस्सा
वित्त मंत्री ने निवेश के साथ strategic resource security को भी आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण आधार बताया है। वैश्विक सप्लाई चेन में किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता संकट के समय उद्योगों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
Critical minerals, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और अन्य रणनीतिक inputs की उपलब्धता इसलिए सिर्फ व्यापार का विषय नहीं रह गई है। यह औद्योगिक नीति और राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ चुकी है।
भारत के लिए आगे की रणनीति का अर्थ यह होगा कि जहां घरेलू क्षमता विकसित करना संभव है वहां उसे बढ़ाया जाए और जहां वैश्विक सहयोग जरूरी है वहां सप्लाई स्रोतों में विविधता लाई जाए।
2047 की अर्थव्यवस्था के लिए असली परीक्षा
वित्त मंत्री ने भारत के विकास लक्ष्य को 2047 तक व्यापक अवसर, बेहतर उत्पादकता और ज्यादा रोजगार से जोड़ते हुए यह संकेत दिया कि अगले चरण में आर्थिक क्षमता का लाभ अधिक नागरिकों, कंपनियों और क्षेत्रों तक पहुंचाना होगा।
इसका अर्थ है कि आने वाले वर्षों में सफलता का पैमाना केवल GDP की वृद्धि दर नहीं होगी। निवेश कितना उत्पादक है, R&D से कितनी नई तकनीक निकलती है, कितने गुणवत्तापूर्ण रोजगार बनते हैं और भारतीय कंपनियां वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कितनी आगे बढ़ती हैं—ये सभी संकेतक उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।
निष्कर्ष
भारत ने बुनियादी ढांचे और सरकारी पूंजीगत खर्च के जरिए आर्थिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक आधार तैयार किया है। अब उस आधार को निजी निवेश, innovation और तकनीकी शोध से आगे ले जाने की चुनौती है।
वित्त मंत्री का संदेश मूल रूप से इसी बदलाव पर केंद्रित है: बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में मजबूती केवल संकट आने के बाद प्रतिक्रिया देने से नहीं बनेगी। इसके लिए पहले से निवेश, तकनीक, कौशल, संसाधन सुरक्षा और वैश्विक साझेदारियों की तैयारी करनी होगी।
अगर निजी उद्योग R&D और productive investment में अपनी भूमिका को बड़े पैमाने पर बढ़ाता है, तो भारत के लिए अगला आर्थिक चरण केवल तेज विकास का नहीं, बल्कि उच्च उत्पादकता और तकनीकी क्षमता वाले विकास का भी हो सकता है।



