SIR के बाद छूटे वोटरों के लिए राहत का बड़ा रास्ता, EC ने शुरू की विशेष मुहिम
मतदाता सूची में नाम होना केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है। यही वह आधार है जिसके जरिए कोई नागरिक चुनाव के दिन अपने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल कर पाता है। इसी वजह से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के दौरान छूटे योग्य मतदाताओं को दोबारा सूची में शामिल करने के लिए चुनाव आयोग का नया निर्देश महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जिन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां अब ऐसे लोगों के लिए सामान्य फॉर्म 6 के जरिए मतदाता सूची में नाम जुड़वाने का रास्ता खुला है, जो पुनरीक्षण के दौरान किसी कारण से सूची में शामिल नहीं हो पाए। इसमें पहली बार मतदान करने की उम्र तक पहुंच चुके युवा भी शामिल हैं।
SIR के बाद अब असली परीक्षा ‘छूटे नाम’ पहचानने की
मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य योग्य नागरिकों को शामिल करना और अपात्र, मृत या डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना होता है। लेकिन इतने बड़े स्तर की प्रक्रिया में एक दूसरी चुनौती भी सामने आती है—ऐसे वास्तविक मतदाता, जिनकी जानकारी किसी कारण से सत्यापन प्रक्रिया में दर्ज नहीं हो पाती।
इसी बिंदु पर आयोग का नया निर्देश महत्वपूर्ण है। अधिकारियों से SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों की तुलना करने को कहा गया है, ताकि ऐसे नामों की पहचान की जा सके जो सूची से हटे हैं, लेकिन उनके हटने का कारण मृत्यु, डुप्लीकेशन या किसी दूसरी जगह मतदाता के रूप में दर्ज होना नहीं है।
इस तरह का डेटा मिलान केवल नाम वापस जोड़ने की कवायद नहीं है। यह पूरी प्रक्रिया की गुणवत्ता जांचने का एक तरीका भी बन सकता है।
फॉर्म 6 से दोबारा नाम जुड़ने की प्रक्रिया आसान
SIR की अवधि खत्म होने के बाद अतिरिक्त घोषणा पत्र की बाध्यता समाप्त हो जाती है। ऐसे राज्यों में योग्य नागरिक सामान्य मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया के तहत फॉर्म 6 भरकर आवेदन कर सकते हैं।
इस बदलाव का व्यावहारिक महत्व उन लोगों के लिए अधिक है जो किसी दस्तावेजी या प्रक्रियागत वजह से SIR के दौरान अपना दावा पूरा नहीं कर पाए। अब उन्हें SIR के दौरान इस्तेमाल की गई अतिरिक्त प्रक्रिया के बजाय सामान्य मतदाता पंजीकरण व्यवस्था का सहारा लेना होगा।
यहां चुनाव अधिकारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। केवल आवेदन स्वीकार करना पर्याप्त नहीं होगा; यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि पात्र नागरिकों के आवेदन समय पर जांचे जाएं और योग्य पाए जाने पर सूची में नाम शामिल हो।
घर तक पहुंचेगा प्रशासन, तो कम हो सकती है प्रक्रिया की बाधा
आयोग ने अधिकारियों को ऐसे मामलों की पहचान करने के लिए भी कहा है जहां किसी मतदाता का नाम सूची से हट गया, लेकिन उसके बारे में डुप्लीकेट, मृत्यु या स्थानांतरण जैसी वजह नहीं मिलती।
ऐसे मामलों में बूथ लेवल अधिकारी घर जाकर फॉर्म भरने में सहायता कर सकते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हो सकता है जिन्हें ऑनलाइन प्रक्रिया, दस्तावेजी औपचारिकताओं या कार्यालय तक पहुंचने में परेशानी होती है।
मतदाता सूची की शुद्धता केवल तकनीकी सिस्टम से हासिल नहीं होती। जमीनी स्तर पर BLO की सक्रियता, स्थानीय जानकारी और आवेदन की निष्पक्ष जांच उतनी ही महत्वपूर्ण है।
राजनीतिक दलों की भूमिका भी बढ़ी
आयोग ने योग्य लेकिन छूटे मतदाताओं की पहचान में राजनीतिक दलों और उनके बूथ लेवल एजेंटों की सहायता लेने की बात कही है।
यह व्यवस्था एक तरफ स्थानीय स्तर पर छूटे मतदाताओं की पहचान में मदद कर सकती है, लेकिन दूसरी तरफ इसकी पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण होगी। किसी भी राजनीतिक दल द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसे निर्धारित चुनावी प्रक्रिया के तहत स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाना जरूरी है।
यही संतुलन मतदाता सूची के पुनरीक्षण को प्रशासनिक प्रक्रिया के साथ-साथ भरोसेमंद प्रक्रिया बनाएगा।
गोवा का मामला क्यों बना अहम उदाहरण?
गोवा में 97 ऐसे लोगों का मामला सामने आया जिन्हें निर्वाचन अधिकारियों ने योग्य माना था, लेकिन उनके नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके। बाद में बड़ी संख्या में इन लोगों ने फॉर्म 6 के जरिए आवेदन किया।
यह उदाहरण दिखाता है कि किसी नागरिक का पात्र पाया जाना और उसका नाम अंतिम मतदाता सूची में दिखाई देना हमेशा एक ही चरण में पूरा नहीं होता। अंतिम सूची तैयार होने के बाद भी ऐसे मामलों के लिए सुधारात्मक तंत्र जरूरी है।
यही वजह है कि SIR के बाद की विशेष मुहिम को केवल नए मतदाताओं के पंजीकरण के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसका एक हिस्सा उन पुराने योग्य मतदाताओं की पहचान करना भी है, जो प्रक्रिया के दौरान छूट गए।
जिन राज्यों में SIR जारी है, वहां अलग व्यवस्था
जहां SIR अभी चल रहा है, वहां ‘अनमैप्ड’ मतदाताओं के लिए भी प्रक्रिया में कुछ बदलाव किए गए हैं। ऐसे मामलों में हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से निर्वाचन अधिकारी के सामने उपस्थित होना जरूरी नहीं होगा। BLO घर जाकर आवश्यक दस्तावेज ले सकते हैं और उन्हें आगे की जांच के लिए सिस्टम पर अपलोड कर सकते हैं।
व्यक्तिगत सुनवाई को विशेष परिस्थितियों तक सीमित रखने से उन मतदाताओं के लिए प्रक्रिया आसान हो सकती है जिन्हें कार्यालय तक पहुंचने में कठिनाई है।
दिल्ली और महाराष्ट्र में दावे एवं आपत्तियों की समयसीमा में भी बदलाव किया गया है। इससे संबंधित मतदाताओं को अपने दावे प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त समय मिलता है।
युवाओं के लिए भी खुला रास्ता
SIR के बाद लगातार मतदाता सूची अपडेट करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नए मतदाताओं को जोड़ना है। हर चुनाव से पहले बड़ी संख्या में युवा मतदान की उम्र तक पहुंचते हैं।
अगर इन नए मतदाताओं का पंजीकरण समय पर नहीं होता, तो मतदाता सूची और वास्तविक पात्र आबादी के बीच अंतर पैदा हो सकता है। इसलिए फॉर्म 6 के जरिए सामान्य पंजीकरण प्रक्रिया को सक्रिय रखना चुनावी प्रशासन के लिए जरूरी है।
आगे की चुनौती सिर्फ नाम जोड़ना नहीं
आयोग का नया कदम अब व्यवहार में कितना प्रभावी होता है, यह तीन बातों पर निर्भर करेगा—छूटे हुए मतदाताओं की सही पहचान, आवेदनों की समयबद्ध जांच और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता।
SIR जैसी व्यापक प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची को अंतिम दस्तावेज मानकर आगे बढ़ने के बजाय लगातार अपडेट करने की व्यवस्था जरूरी है। यही व्यवस्था गलत तरीके से हटे नामों को सुधारने और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ने के बीच संतुलन बना सकती है।



