बस्तर में बड़ा सुरक्षा बदलाव: केंद्रीय बलों की वापसी के बीच स्थानीय युवाओं को जिम्मेदारी, पुलिस भर्ती बनी सबसे बड़ी चुनौती
बस्तर में सुरक्षा व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जहां सफलता का अगला पैमाना केवल माओवादी हिंसा में कमी नहीं, बल्कि स्थायी स्थानीय सुरक्षा तंत्र खड़ा करना होगा। वर्षों तक जंगलों और दूरदराज के इलाकों में केंद्रीय सशस्त्र बलों ने सुरक्षा अभियान की रीढ़ का काम किया। अब उनकी चरणबद्ध वापसी शुरू होने के साथ राज्य पुलिस और स्थानीय सुरक्षा बलों पर जिम्मेदारी बढ़ रही है।
सितंबर 2026 की रिपोर्टों के मुताबिक बस्तर से केंद्रीय बलों की वापसी शुरू हो चुकी है और करीब 30 प्रतिशत बल लौट चुका है। इसी दौरान राज्य में स्वीकृत पुलिस पदों के मुकाबले लगभग 20 हजार पद खाली होने की बात सामने आई है। यानी चुनौती सिर्फ जवानों की संख्या की नहीं, बल्कि उस खाली जगह को सही समय पर प्रशिक्षित स्थानीय बल से भरने की है।
बस्तर का अगला सुरक्षा मॉडल कैसा होगा?
बस्तर में सुरक्षा अभियान की परिस्थितियां देश के सामान्य शहरी या मैदानी इलाकों से अलग रही हैं। घने जंगल, दूर-दराज के गांव, सीमित सड़क संपर्क और स्थानीय बोली-संस्कृति की समझ यहां पुलिसिंग को विशेष बनाती है।
इसी वजह से स्थानीय युवाओं को सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ने की रणनीति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बस्तर फाइटर्स इसी सोच का हिस्सा हैं। स्थानीय स्तर पर भर्ती जवान इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों, गांवों और भाषाई-सामाजिक नेटवर्क को बेहतर समझ सकते हैं।
सितंबर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बस्तर फाइटर्स में 4,600 आरक्षकों की सीधी भर्ती के लिए नियमावली तैयार की गई थी। इसमें स्थानीय बोली जानने वाले उम्मीदवारों को 20 बोनस अंक देने और महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण जैसे प्रावधान बताए गए हैं।
वहीं जुलाई की रिपोर्टों में बस्तर फाइटर्स के 5,800 पदों को मंजूरी दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके अलावा 2026-27 के बजट में 1,500 अतिरिक्त पद प्रस्तावित किए जाने की रिपोर्ट भी आई। इन अलग-अलग आंकड़ों से स्पष्ट है कि स्थानीय सुरक्षा बल के विस्तार की योजना चरणों में आगे बढ़ रही है।
असली चिंता जवानों की वापसी नहीं, संक्रमण की तैयारी है
केंद्रीय बलों की वापसी को केवल जवानों की संख्या घटने के रूप में देखना अधूरा होगा।
लंबे समय तक केंद्रीय बलों ने बस्तर में एरिया डोमिनेशन, कैंप सुरक्षा, जंगल अभियान और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा उपस्थिति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब जैसे-जैसे यह जिम्मेदारी राज्य पुलिस की तरफ आएगी, उसी अनुपात में स्थानीय पुलिस की संख्या, प्रशिक्षण, संचार व्यवस्था और लॉजिस्टिक क्षमता मजबूत करनी होगी।
मार्च 2026 में राज्य के गृह मंत्री ने भी केंद्रीय सुरक्षा बलों की क्रमिक कमी की बात कही थी, साथ ही यह स्पष्ट किया था कि बस्तर में पुलिस कैंप बंद करने की योजना नहीं है।
इसका मतलब यह है कि रणनीति अचानक सुरक्षा ढांचा हटाने की नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उसकी जिम्मेदारी राज्य के अपने सुरक्षा तंत्र को देने की है।
25 प्रतिशत पुलिस पद खाली होना क्यों महत्वपूर्ण है?
राज्य पुलिस में करीब 20 हजार पद रिक्त होने की रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब केंद्रीय बलों की भूमिका कम हो रही है। यही वह बिंदु है जो आने वाले महीनों की सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन सकता है।
पुलिस बल की कमी का असर केवल माओवादी विरोधी अभियान पर नहीं पड़ता। कानून-व्यवस्था, थानों की नियमित व्यवस्था, जांच, यातायात, वीआईपी सुरक्षा, आपातकालीन प्रतिक्रिया और ग्रामीण इलाकों में पुलिस की पहुंच—सभी पर इसका दबाव पड़ सकता है।
इसलिए नई भर्ती को केवल रोजगार योजना के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। भर्ती के बाद प्रशिक्षण, हथियार संचालन, जंगल युद्ध कौशल, मानवाधिकार संबंधी प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी का इस्तेमाल और आधुनिक संचार प्रणाली भी उतनी ही महत्वपूर्ण होंगी।
स्थानीय युवाओं की भर्ती में सबसे बड़ा फायदा क्या हो सकता है?
स्थानीय पुलिसिंग की सबसे बड़ी ताकत स्थानीय जानकारी हो सकती है।
किस गांव तक कौन-सी सड़क जाती है, कौन-से इलाके में पहुंचना मुश्किल है, स्थानीय बोली में संवाद कैसे किया जाता है और ग्रामीणों से भरोसे का रिश्ता कैसे बनाया जाए—इन पहलुओं में स्थानीय युवाओं को स्वाभाविक बढ़त मिल सकती है।
इसी कारण बस्तर फाइटर्स में स्थानीय बोली को महत्व देने की व्यवस्था सामने आई है। यह मॉडल सुरक्षा और रोजगार दोनों को जोड़ता है।
लेकिन स्थानीय भर्ती का अर्थ यह नहीं कि प्रशिक्षण की जरूरत कम हो जाती है। उलटे, आधुनिक पुलिसिंग, तकनीकी निगरानी, साइबर क्षमताओं और पेशेवर जांच में पर्याप्त प्रशिक्षण इस मॉडल की सफलता के लिए जरूरी होगा।
400 से अधिक सुरक्षा कैंपों का भविष्य भी अहम
बस्तर में सुरक्षा ढांचा सिर्फ जवानों की संख्या से तय नहीं होता। कैंप, सड़कें, संचार और प्रशासनिक पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
केंद्र सरकार ने मई 2026 में बताया था कि बस्तर में करीब 200 केंद्रीय सुरक्षा बल कैंपों में से लगभग 70 को आगे चलकर सार्वजनिक सेवा केंद्रों में बदलने की योजना है। इन केंद्रों के माध्यम से बैंकिंग, कौशल प्रशिक्षण, स्कूल और अन्य सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का लक्ष्य बताया गया था।
यह बदलाव बताता है कि सुरक्षा अभियान के बाद अगला चरण केवल पुलिस की तैनाती नहीं, बल्कि सुरक्षा से प्रशासन और प्रशासन से विकास तक पहुंच बनाने का है।
माओवादी हिंसा घटने के बाद भी सुरक्षा तंत्र क्यों जरूरी रहेगा?
बस्तर को नक्सल-मुक्त घोषित करने के बाद यह मान लेना कि सुरक्षा की जरूरत पूरी तरह समाप्त हो गई, व्यावहारिक रणनीति नहीं होगी।
किसी लंबे समय तक चले हिंसक संघर्ष के बाद सुरक्षा व्यवस्था को सामान्य होने में समय लगता है। हथियारों का नेटवर्क, पुराने प्रभाव क्षेत्र, सीमावर्ती जंगल और स्थानीय स्तर पर पैदा हुई असुरक्षा जैसी परिस्थितियों पर लगातार नजर रखना पड़ता है।
2026 में भी बस्तर क्षेत्र में आत्मसमर्पण की घटनाएं जारी रही हैं। फरवरी में बीजापुर और सुकमा में 51 माओवादी कैडरों के आत्मसमर्पण की रिपोर्ट सामने आई थी।
इसलिए आने वाले समय में सुरक्षा रणनीति का स्वरूप बदल सकता है—बड़े पैमाने के अभियान से ज्यादा जोर स्थानीय खुफिया तंत्र, क्षेत्रीय पुलिसिंग और प्रशासनिक पहुंच पर हो सकता है।
रोजगार और सुरक्षा—दोनों को जोड़ने का मौका
बस्तर फाइटर्स की भर्ती का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू भी है। यदि स्थानीय युवाओं को नियमित और प्रशिक्षित सुरक्षा बल का हिस्सा बनाया जाता है तो उन्हें रोजगार के साथ अपने ही क्षेत्र की सुरक्षा में भूमिका मिलती है।
लेकिन इसका दीर्घकालिक असर तभी मजबूत होगा जब भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो, प्रशिक्षण गुणवत्तापूर्ण हो और सेवा के दौरान जवानों के लिए करियर विकास की स्पष्ट व्यवस्था हो।
सिर्फ बड़ी संख्या में भर्ती करना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक क्षमता इस बात से तय होगी कि इन जवानों को कितनी जल्दी प्रभावी पुलिसिंग के लिए तैयार किया जाता है।
आगे की सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
बस्तर में अब सुरक्षा नीति का अगला चरण तीन मोर्चों पर एक साथ काम करने का होगा—
पहला, केंद्रीय बलों की वापसी और राज्य पुलिस की जिम्मेदारी के बीच कोई सुरक्षा खालीपन न बने।
दूसरा, रिक्त पुलिस पदों को तेजी से भरने के साथ भर्ती हुए जवानों का उच्च गुणवत्ता वाला प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए।
तीसरा, जिन इलाकों में सुरक्षा उपस्थिति कम हो रही है, वहां प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग और सड़क जैसी नागरिक सुविधाओं की पहुंच बढ़ाई जाए।
केंद्र सरकार ने 2031 तक बस्तर के विकास और आय बढ़ाने का दीर्घकालिक लक्ष्य भी सार्वजनिक रूप से रखा है। इसके लिए सुरक्षा के बाद विकास और भरोसे की व्यवस्था को मजबूत करना अहम होगा।



