छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक परिवहन का बड़ा संकट: 24 साल बाद भी बस सेवा पर सवाल, अफसरों के ईंधन खर्च ने बढ़ाई बेचैनी
रायपुर। छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक परिवहन को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। करीब दो दशक से ज्यादा समय पहले राज्य में सरकारी परिवहन निगम के मॉडल को समाप्त करने के बाद इंटर-सिटी बस सेवाओं के लिए निजी ऑपरेटरों पर निर्भरता बढ़ी। उस समय आर्थिक बोझ और परिवहन व्यवस्था को निजी क्षेत्र के जरिए चलाने का तर्क सामने था। आज सवाल यह है कि बदलती आबादी, फैलते शहरों और दूरदराज के इलाकों की जरूरतों के हिसाब से क्या वही मॉडल पर्याप्त है?
मौजूदा बहस को इसलिए भी महत्व मिल रहा है क्योंकि नवा रायपुर आने-जाने वाले अधिकारियों के लिए ईंधन आवंटन को लेकर आंकड़े सामने आए हैं। 2024 के सरकारी खर्च संबंधी निर्देशों की रिपोर्टिंग के मुताबिक रायपुर से नवा रायपुर स्थित सरकारी कार्यालयों और प्रशासन अकादमी आने-जाने के लिए अधिकारियों को प्रतिमाह 250 लीटर तक पेट्रोल-डीजल का प्रावधान था। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन और सरकारी वाहनों पर होने वाले खर्च को एक साथ देखने की मांग उठना स्वाभाविक है।
असल सवाल सिर्फ पेट्रोल का खर्च नहीं है। असली मुद्दा यह है कि राज्य की परिवहन नीति में आम यात्री की पहुंच को कितनी प्राथमिकता मिल रही है।
छत्तीसगढ़ का भौगोलिक स्वरूप इस समस्या को दूसरे राज्यों से अलग बनाता है। बड़े शहरों के अलावा यहां आदिवासी और वन क्षेत्रों में बसे गांवों की संख्या भी काफी है। ऐसे इलाकों में निजी बस ऑपरेटर के लिए हर रूट व्यावसायिक रूप से आकर्षक नहीं होता। लेकिन किसी गांव के लिए वही बस अस्पताल, कॉलेज, तहसील, जिला मुख्यालय या बाजार तक पहुंच का सबसे महत्वपूर्ण साधन हो सकती है।
यहीं सरकारी परिवहन की भूमिका सामने आती है। सार्वजनिक बस सेवा को केवल टिकट से होने वाली कमाई के आधार पर आंकना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। किसी दूरस्थ रूट पर कम यात्री मिल सकते हैं, लेकिन उस बस की सामाजिक उपयोगिता कहीं ज्यादा हो सकती है।
बस सेवा का असर सिर्फ सफर तक सीमित नहीं
मान लीजिए किसी ग्रामीण क्षेत्र से जिला मुख्यालय तक नियमित और किफायती बस उपलब्ध नहीं है। इसका मतलब केवल इतना नहीं कि व्यक्ति को आने-जाने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। मरीज के लिए अस्पताल तक पहुंच मुश्किल होगी, छात्र के लिए कॉलेज या प्रतियोगी परीक्षा तक पहुंच सीमित हो सकती है और किसान के लिए मंडी तक माल ले जाना महंगा पड़ सकता है।
महिलाओं और बुजुर्गों के लिए सुरक्षित एवं नियमित परिवहन का महत्व भी अलग है। रोजगार की तलाश में शहर जाने वाले युवाओं के लिए बस की उपलब्धता सीधे आर्थिक अवसर से जुड़ती है।
इसलिए परिवहन को सड़क निर्माण से अलग करके नहीं देखा जा सकता। सड़क बन जाने के बाद उस पर नियमित, सुरक्षित और सस्ती यात्री सेवा नहीं है तो कनेक्टिविटी का फायदा अधूरा रह जाता है।
क्या पुराना सरकारी बस मॉडल ही समाधान है?
यह जरूरी नहीं कि समाधान फिर से पुराने ढांचे को हूबहू खड़ा करने में ही हो। 2002 के दौर की आर्थिक और प्रशासनिक परिस्थितियां आज से अलग थीं। अब सरकार के पास सार्वजनिक परिवहन के लिए कई मॉडल उपलब्ध हैं।
सरकार चाहें तो चुनिंदा रूट पर अपनी बसें चलाने के बजाय पब्लिक-प्राइवेट मॉडल अपना सकती है। ऐसे रूट जहां यात्री पर्याप्त हों, वहां निजी ऑपरेटरों को संचालन दिया जा सकता है और कम यात्री वाले लेकिन सामाजिक रूप से जरूरी मार्गों पर सरकार वायबिलिटी गैप फंडिंग दे सकती है।
इसी तरह इलेक्ट्रिक बसों को शहरी और अर्ध-शहरी रूट से जोड़कर धीरे-धीरे नेटवर्क बढ़ाया जा सकता है। रायपुर में 100 इलेक्ट्रिक बसों की दिशा में सरकारी स्तर पर काम की योजना पहले ही सामने आ चुकी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सार्वजनिक परिवहन का नया मॉडल केवल कागज पर चर्चा का विषय नहीं है।
निजी बसों के साथ निगरानी भी जरूरी
सरकारी निगम नहीं होने का अर्थ यह नहीं कि परिवहन व्यवस्था पर सरकार की भूमिका खत्म हो जाती है। परमिट, किराया, सुरक्षा, फिटनेस और रूट की निगरानी सरकार की जिम्मेदारी बनी रहती है।
हाल में परिवहन विभाग की जांच में करीब 2,000 यात्री बसों में GPS/VLTD से जुड़ी खामियां सामने आने की रिपोर्ट भी बताती है कि तकनीकी निगरानी को मजबूत करने की जरूरत है। विभाग ने ऐसे बस संचालकों को नोटिस जारी किए हैं और नियमों के पालन नहीं होने पर परमिट कार्रवाई की चेतावनी दी है।
इससे भविष्य की परिवहन नीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता है—सिर्फ बसों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। बस कहां चल रही है, समय पर पहुंच रही है या नहीं, किराया क्या है और यात्री की सुरक्षा कैसी है, इन सभी पहलुओं की निगरानी भी जरूरी होगी।
अब नीति में बदलाव की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?
छत्तीसगढ़ की आबादी, शहरों का विस्तार और नवा रायपुर जैसे नए प्रशासनिक केंद्रों का विकास 2002 की तुलना में परिवहन की जरूरतों को काफी बदल चुका है। ऐसे में दो दशक पुराने मॉडल की सफलता या विफलता पर बहस करने से ज्यादा जरूरी है कि आज की जरूरत के हिसाब से नया ढांचा बनाया जाए।
एक प्रभावी सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क में शहरों के साथ गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों को भी जोड़ा जाना चाहिए। मुख्य मार्गों के साथ फीडर बसें, डिजिटल टिकटिंग, लाइव ट्रैकिंग, निर्धारित किराया और सामाजिक रूप से जरूरी रूटों के लिए सरकारी सहायता जैसे उपाय इसे अधिक व्यावहारिक बना सकते हैं।
आखिरकार सार्वजनिक परिवहन का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि बस कंपनी को कितना मुनाफा हुआ। उसका बड़ा पैमाना यह भी है कि एक विद्यार्थी कितनी आसानी से कॉलेज पहुंचा, मरीज कितनी जल्दी अस्पताल गया, किसान कितनी कम लागत में बाजार पहुंचा और गांव का व्यक्ति कितनी आसानी से जिला मुख्यालय से जुड़ा।



