LIC को बड़ा झटका: बेटे की मौत के बाद पिता ने नहीं छोड़ी उम्मीद, 5 लाख के क्लेम पर आया अहम फैसला
नई दिल्ली। जीवन बीमा पॉलिसी लेने के बाद किसी पॉलिसीधारक की मौत हो जाए और कंपनी क्लेम यह कहते हुए रोक दे कि बीमारी की जानकारी छिपाई गई थी, तो मामला सिर्फ बीमा राशि मिलने या न मिलने तक सीमित नहीं रहता। असली सवाल यह होता है कि कंपनी के पास उस आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय दस्तावेज हैं या नहीं।
पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब से जुड़े एक मामले में यही सवाल उपभोक्ता विवाद के केंद्र में रहा। एक पॉलिसीधारक की मौत के बाद उसके पिता और नॉमिनी ने क्लेम खारिज किए जाने को चुनौती दी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने LIC के पक्ष में दिए गए क्लेम रिजेक्शन को स्वीकार नहीं किया और ₹5 लाख की बीमित राशि देने का निर्देश दिया। इसके साथ 29 जनवरी 2024 से भुगतान तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और ₹10,000 की मुकदमा लागत भी निर्धारित की गई।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
मामले में पॉलिसीधारक ने अप्रैल 2022 में जीवन बीमा पॉलिसी ली थी। करीब एक साल बाद अगस्त 2023 में उसकी मौत हो गई। इसके बाद नॉमिनी ने बीमा राशि के लिए दावा पेश किया।
बीमा कंपनी ने क्लेम स्वीकार करने के बजाय मेडिकल हिस्ट्री का मुद्दा उठाया। उसका कहना था कि पॉलिसी लेने से पहले पॉलिसीधारक को दिल से जुड़ी एक पुरानी समस्या और उससे संबंधित मेडिकल प्रक्रिया की जानकारी थी, लेकिन प्रस्ताव के समय इसका खुलासा नहीं किया गया।
यहीं से मामला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा।
LIC के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?
बीमा कंपनी ने पुरानी मेडिकल स्थिति और बाद के अस्पताल रिकॉर्ड का सहारा लिया। लेकिन आयोग के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या उपलब्ध दस्तावेज वास्तव में यह साबित करते हैं कि पॉलिसी खरीदते समय संबंधित व्यक्ति को बीमारी की जानकारी थी और उसने जानबूझकर उसे छिपाया था?
यही अंतर बीमा विवादों में बेहद महत्वपूर्ण होता है।
किसी व्यक्ति की पुरानी मेडिकल हिस्ट्री मिल जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पॉलिसी लेते समय उसने जानबूझकर कोई तथ्य छिपाया था। कंपनी को अपने क्लेम रिजेक्शन के आधार को दस्तावेजी साक्ष्यों से जोड़ना पड़ता है।
पुराने इलाज और पॉलिसी खरीदने के समय के बीच का अंतर बना अहम बिंदु
रिपोर्ट के मुताबिक LIC ने 2008 में हुई ASD/VSD से संबंधित प्रक्रिया और बाद की मेडिकल जानकारी का हवाला दिया था। कंपनी ने 2023 के अस्पताल रिकॉर्ड का भी इस्तेमाल किया।
लेकिन आयोग के सामने समस्या यह रही कि पॉलिसी जारी होने से पहले की कथित बीमारी को साबित करने वाले पर्याप्त मेडिकल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए जा सके। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि प्रस्ताव फॉर्म से संबंधित दस्तावेजों में तारीख, हस्ताक्षर और रिकॉर्ड की पूर्णता को लेकर सवाल उठे।
यानी विवाद का केंद्र यह नहीं था कि पुरानी मेडिकल हिस्ट्री मौजूद थी या नहीं, बल्कि यह था कि क्या उस हिस्ट्री को पॉलिसी आवेदन के समय जानबूझकर छिपाने का पर्याप्त प्रमाण मौजूद था।
प्रस्ताव फॉर्म क्यों बन गया निर्णायक दस्तावेज?
जीवन बीमा में प्रस्ताव फॉर्म बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। इसमें पॉलिसी लेने वाला व्यक्ति अपनी स्वास्थ्य स्थिति, पुरानी बीमारियों, इलाज और अन्य पूछी गई जानकारियों के बारे में जवाब देता है।
बाद में क्लेम विवाद होने पर यही दस्तावेज यह समझने में मदद कर सकता है कि बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी करते समय कौन-सी जानकारी मांगी थी और आवेदक ने क्या जवाब दिया था।
इस मामले में आयोग ने प्रस्ताव फॉर्म से जुड़े दस्तावेजों की तारीख और उनकी पूर्णता पर सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार एक दस्तावेज पर ऐसी तारीख थी जो पॉलिसी जारी होने के बाद की थी। ऐसे रिकॉर्ड के आधार पर पॉलिसी जारी होने के समय आवेदक ने वास्तव में क्या जानकारी दी थी, यह साबित करना चुनौतीपूर्ण हो गया।
‘बीमारी छिपाई’ कहना और उसे साबित करना अलग बात
बीमा कंपनियों के लिए गैर-प्रकटीकरण यानी non-disclosure एक महत्वपूर्ण क्लेम जांच का विषय हो सकता है। लेकिन किसी क्लेम को इस आधार पर खारिज करने की स्थिति में उपलब्ध रिकॉर्ड का मजबूत होना महत्वपूर्ण है।
इस मामले में आयोग ने माना कि कंपनी द्वारा पेश किए गए दस्तावेज उस स्तर पर पर्याप्त नहीं थे जिससे कथित मेडिकल स्थिति को पॉलिसी लेते समय जानबूझकर छिपाने की बात स्थापित हो सके। इसी आधार पर क्लेम रिजेक्शन को रद्द किया गया।
फैसले से पॉलिसीधारकों को क्या समझना चाहिए?
इस मामले का सबसे व्यावहारिक पहलू यह है कि बीमा लेते समय स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। प्रस्ताव फॉर्म में पूछे गए प्रत्येक सवाल का सही और स्पष्ट जवाब देना जरूरी है।
पुरानी बीमारी, सर्जरी, अस्पताल में भर्ती होने या नियमित इलाज से जुड़ी जानकारी हो तो उसे छिपाने के बजाय बीमा कंपनी को बताना बेहतर है। साथ ही पॉलिसी खरीदते समय भरे गए प्रस्ताव फॉर्म और मेडिकल दस्तावेजों की कॉपी अपने रिकॉर्ड में रखना भी उपयोगी हो सकता है।
क्लेम विवाद की स्थिति में यही दस्तावेज यह समझने में मदद करते हैं कि पॉलिसी जारी होने के समय क्या जानकारी दी गई थी।
LIC को कितना भुगतान करना होगा?
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक आयोग ने ₹5 लाख की बीमित राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा 29 जनवरी 2024 से भुगतान की तारीख तक 7 प्रतिशत सालाना ब्याज और ₹10,000 मुकदमा खर्च भी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार पहले लौटाई गई प्रीमियम राशि को अंतिम भुगतान में समायोजित किया जाना है।
आगे के लिए क्या संकेत?
यह मामला बीमा क्लेम विवादों में दस्तावेजी साक्ष्य की अहमियत को सामने लाता है। बीमारी के पुराने रिकॉर्ड और पॉलिसी आवेदन के समय की वास्तविक जानकारी के बीच संबंध साबित करना क्लेम जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
पॉलिसीधारक के लिए भी सबक स्पष्ट है—बीमा फॉर्म में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पूरी ईमानदारी से भरें, दस्तावेज संभालकर रखें और क्लेम खारिज होने पर कंपनी के कारण तथा उसके समर्थन में दिए गए रिकॉर्ड को ध्यान से जांचें।



