महासमुंद के दंपती के मामले में हाईकोर्ट ने कहा- सामान्य वैवाहिक मतभेद और छोटे-मोटे विवाद अपने आप में क्रूरता नहीं माने जा सकते
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में फैमिली कोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया है, जिसमें पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की गई थी। पति ने पत्नी पर वैवाहिक क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी। सुनवाई के दौरान पति की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पत्नी करवा चौथ का व्रत बीच में ही तोड़ देती थी और उसका कहना था कि जब उसे पति के साथ नहीं रहना है तो व्रत रखने का क्या फायदा।
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर पति द्वारा लगाए गए क्रूरता और परित्याग के आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं होते। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की तलाक संबंधी डिक्री को रद्द कर दिया।
2011 में हुई थी शादी
मामला महासमुंद निवासी दंपती से जुड़ा है। दोनों का विवाह 10 दिसंबर 2011 को गुरुद्वारा में हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था।
पति की ओर से आरोप लगाया गया था कि शादी के कुछ समय बाद पत्नी के व्यवहार में बदलाव आ गया। उसके अनुसार, पत्नी छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद करती थी, सास-ससुर का सम्मान नहीं करती थी और कई बार बिना पर्याप्त कारण बताए मायके चली जाती थी।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन नहीं करती थी और करवा चौथ का व्रत भी बीच में छोड़ देती थी। इसके अलावा पत्नी द्वारा उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए के तहत मामला दर्ज कराने और घरेलू हिंसा से संबंधित शिकायत को भी पति ने मानसिक क्रूरता बताया था।
पत्नी ने लगाए दहेज प्रताड़ना के आरोप
पत्नी ने पति के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वह अपना वैवाहिक जीवन बचाना चाहती थी और पति के साथ रहने के लिए तैयार थी। उसने ससुराल पक्ष पर दहेज की मांग के साथ शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया।
पत्नी के अनुसार, 2 जुलाई 2018 को वह रसोई में काम कर रही थी। इसी दौरान सास और देवरानी ने पैसे लाने की बात को लेकर उसके साथ मारपीट की। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने भी उसके बाल पकड़कर उसे एक कमरे में बंद कर दिया था, जिससे उसका एक दांत टूट गया।
पत्नी के मुताबिक, वह किसी तरह वहां से निकलकर गुरुद्वारा पहुंची और अपने परिजनों तथा पुलिस को घटना की जानकारी दी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने वैवाहिक संबंधों में होने वाले सामान्य मतभेदों और विवादों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव, मतभेद या छोटे-मोटे झगड़ों को मात्र इसी आधार पर क्रूरता नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवाद के दौरान पत्नी द्वारा पुलिस या कानूनी माध्यम से शिकायत करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसके लिए मामले के पूरे तथ्यों और संबंधित आचरण की गंभीरता पर विचार करना जरूरी है।
तलाक की डिक्री हुई निरस्त
दोनों पक्षों के आरोपों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पति की ओर से लगाए गए क्रूरता और परित्याग के आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुए।
इसी आधार पर डिवीजन बेंच ने पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में पारित तलाक की डिक्री को निरस्त कर दिया।
पाठकों के लिए जरूरी बात
इस मामले में करवा चौथ का व्रत रखना या न रखना अकेले तलाक का आधार घोषित नहीं किया गया है। हाईकोर्ट ने पूरे वैवाहिक विवाद, दोनों पक्षों के आरोप और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि पति की ओर से लगाए गए क्रूरता और परित्याग के आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुए।



