अमेरिका में H-1B पर नई सख्ती: भारतीय IT प्रोफेशनल्स के लिए क्या बदलेगा?
वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर सितंबर 2026 में किए गए कई नीतिगत बदलावों ने भारतीय IT और टेक प्रोफेशनल्स के सामने नई अनिश्चितताएं खड़ी कर दी हैं। हालांकि इसे सीधे तौर पर मौजूदा H-1B धारकों के वीजा रद्द होने के रूप में देखना सही नहीं होगा। असली बदलाव कंपनियों की जिम्मेदारी, विदेशी कर्मचारियों की भर्ती और वीजा प्रक्रिया की जांच को अधिक सख्त किए जाने में है।
18 सितंबर 2026 को जारी अमेरिकी कार्यकारी आदेश में विदेश विभाग, श्रम विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग को H-1B आवेदन, Labor Condition Application (LCA) और संबंधित प्रक्रियाओं में नियोक्ता के हालिया या प्रस्तावित छंटनी रिकॉर्ड को ध्यान में रखने का निर्देश दिया गया है। खास तौर पर यह देखा जाना है कि क्या किसी कंपनी ने पिछले एक साल में समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों को हटाया है या ऐसी छंटनी की योजना बना रही है।
भारतीय कर्मचारियों पर चर्चा क्यों तेज है?
इसका एक बड़ा कारण H-1B कार्यक्रम में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी है। USCIS की FY 2024 रिपोर्ट के अनुसार, स्वीकृत H-1B याचिकाओं में लाभार्थियों के जन्मस्थान के आधार पर 71 प्रतिशत भारत से संबंधित थे। चीन लगभग 12 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर था।
इसलिए जब अमेरिका H-1B के नियमों में भर्ती, वेतन, अनुपालन और नियोक्ता की भूमिका पर बदलाव करता है, तो उसका प्रभाव भारतीय पेशेवरों पर भी अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे सकता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। नया 18 सितंबर का कार्यकारी आदेश यह नहीं कहता कि अमेरिका में मौजूद हर भारतीय H-1B कर्मचारी की नौकरी या वीजा समाप्त हो जाएगा। इसका मुख्य निशाना H-1B को स्पॉन्सर करने वाली कंपनियों की प्रक्रियाएं और अनुपालन हैं। सरकार अब यह देखना चाहती है कि H-1B का इस्तेमाल वास्तविक विशेषज्ञता की जरूरत के लिए हो रहा है या ऐसे मामलों में किया जा रहा है जहां समान अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी भी हुई है।
$100,000 भुगतान की शर्त अलग मामला है
सितंबर की नीति में एक और महत्वपूर्ण कदम H-1B से जुड़ा है। 18 सितंबर 2026 की राष्ट्रपति उद्घोषणा ने 2025 में शुरू की गई उस व्यवस्था को अगले 12 महीनों के लिए बढ़ाया है, जिसके तहत अमेरिका के बाहर मौजूद कुछ नए H-1B कर्मचारियों के प्रवेश से जुड़े मामलों में नियोक्ता को $100,000 का भुगतान करना पड़ सकता है। मौजूदा घोषणा के अनुसार यह व्यवस्था 21 सितंबर 2027 तक जारी रहने वाली है, हालांकि इसमें कुछ अपवाद भी हैं।
इसका व्यावहारिक असर यह हो सकता है कि भारत से किसी कर्मचारी को अमेरिका भेजने का शुरुआती खर्च काफी बढ़ जाए। ऐसे में कंपनियों के लिए हर H-1B नियुक्ति की लागत और उपयोगिता का हिसाब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
60 दिन का ग्रेस पीरियड: अभी क्या स्थिति है?
नौकरी गंवाने वाले H-1B कर्मचारियों के संदर्भ में 60 दिन की अवधि को लेकर भी भ्रम है। वर्तमान नियमों में रोजगार समाप्त होने के बाद अधिकतम 60 दिनों तक का discretionary grace period उपलब्ध है। सितंबर 2026 में DHS ने एक प्रस्ताव प्रकाशित किया है जिसमें इस अधिकतम 60-दिन के grace period को नियमों से हटाने की बात कही गई है। यह प्रस्तावित बदलाव है, तत्काल लागू हो चुका नियम नहीं।
इसलिए फिलहाल यह कहना कि सभी H-1B कर्मचारियों के लिए 60 दिन का समय समाप्त हो चुका है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। हालांकि यदि प्रस्ताव अंतिम नियम के रूप में लागू होता है, तो नौकरी गंवाने वाले विदेशी कर्मचारियों की स्थिति निश्चित रूप से अधिक कठिन हो सकती है।
अमेरिका की जांच अब केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं
H-1B अनुपालन पर अमेरिकी अधिकारियों की कार्रवाई भी तेज हुई है। अमेरिकी श्रम विभाग के Inspector General ने अगस्त 2026 में Dallas में H-1B धोखाधड़ी की जांच के तहत कई कंपनियों से जुड़े स्थानों पर field checks किए। विभाग ने बताया कि कुछ परिसरों में वास्तविक कारोबारी गतिविधि के संकेत बहुत कम मिले, जबकि उनसे सैकड़ों स्वीकृत H-1B आवेदन जुड़े हुए थे।
जुलाई में DOL OIG ने H-1B और PERM कार्यक्रमों में धोखाधड़ी तथा विदेशी श्रमिकों के शोषण से जुड़े मामलों की व्यापक जांच की घोषणा भी की थी।
इससे भारतीय IT professionals के लिए एक अहम संदेश निकलता है: केवल नौकरी का offer या visa sponsorship पर्याप्त नहीं है। जिस कंपनी के माध्यम से H-1B प्रक्रिया हो रही है, उसके compliance record और वास्तविक employment arrangement का महत्व बढ़ रहा है।
वेतन आधारित चयन से entry-level नौकरियों पर असर?
H-1B चयन प्रक्रिया को वेतन स्तर के आधार पर अधिक प्राथमिकता देने की दिशा में भी अमेरिकी प्रशासन आगे बढ़ चुका है। इसका उद्देश्य उच्च वेतन और उच्च-कौशल वाली भूमिकाओं को अधिक प्राथमिकता देना है। ऐसे बदलावों से कम वेतन वाली entry-level भूमिकाओं की तुलना में उच्च वेतन वाली positions को लाभ मिल सकता है।
यह बदलाव भारतीय IT sector के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका जाने वाले कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा technology और specialized occupations में काम करता है। कंपनियां भविष्य में केवल यह नहीं देखेंगी कि किसी पद के लिए H-1B संभव है या नहीं, बल्कि यह भी देख सकती हैं कि उस पद का वेतन और skill level नई व्यवस्था में कितना मजबूत है।
Green Card आवेदकों के लिए भी बदला public charge framework
18 सितंबर 2026 से public charge से जुड़ा एक नया framework प्रभावी हुआ है। USCIS ने 2022 के नियम को हटाकर अधिकारियों को applicant की आर्थिक स्थिति और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों का व्यापक, case-by-case आकलन करने की अनुमति दी है। 18 सितंबर के बाद मिलने वाले कुछ means-tested public benefits भी इस आकलन में देखे जा सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर Green Card applicant स्वतः अयोग्य हो जाएगा। नियम में अलग-अलग श्रेणियों के लिए अपवाद और waiver की व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं तथा निर्णय applicant की पूरी परिस्थितियों को देखकर किया जाना है।
Social media screening भी बढ़ी
अमेरिकी विदेश विभाग ने 18 सितंबर को बताया कि 1 अक्टूबर 2026 से I, TN और TD visa applicants के लिए online presence review का दायरा बढ़ाया जाएगा। इन श्रेणियों के आवेदकों को अपने social media profiles की privacy settings को public या open रखने का निर्देश दिया गया है। H-1B applicants पहले से विस्तारित online presence review के दायरे में हैं।
इससे साफ है कि अमेरिका की visa screening अब केवल documents और employment details तक सीमित नहीं रह रही, बल्कि applicant की व्यापक background vetting भी प्रक्रिया का हिस्सा बनती जा रही है।
आगे भारतीय IT professionals के लिए क्या मायने?
अमेरिका में H-1B को लेकर 2026 के बदलावों को एक अकेले नियम के रूप में देखने के बजाय पूरे compliance framework में बदलाव के रूप में समझना अधिक उचित है। कंपनियों पर employee layoffs, wage levels, petition documentation और वास्तविक job requirements को लेकर अधिक scrutiny है। वहीं नए overseas H-1B hires के लिए $100,000 भुगतान जैसी लागत भी महत्वपूर्ण हो गई है।
इसका संभावित व्यावसायिक असर यह है कि अमेरिकी कंपनियां कुछ भूमिकाओं के लिए स्थानीय hiring, automation, offshore delivery या अधिक specialized foreign talent जैसे विकल्पों की तुलना कर सकती हैं। भारतीय professionals के लिए भी केवल सामान्य IT skills के बजाय high-demand specialization, बेहतर compensation और मजबूत employer compliance पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं।



