Nuclear Weapons: इन देशों ने छोड़ा परमाणु हथियारों का रास्ता, फिर भारत-पाकिस्तान क्यों बढ़ा रहे अपना जखीरा? समझें NPT और CTBT पर नई दिल्ली की नीति
नई दिल्ली: परमाणु हथियारों की दुनिया में एक दिलचस्प विरोधाभास सामने है। कुछ देशों ने अपने पास मौजूद परमाणु हथियारों या परमाणु हथियार कार्यक्रम को खत्म करने का फैसला किया, जबकि दूसरी ओर आज के नौ परमाणु-सशस्त्र देश अपने-अपने परमाणु शस्त्रागार को आधुनिक बनाने में लगे हैं। इस तस्वीर में भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं।
Stockholm International Peace Research Institute यानी SIPRI के 2026 आकलन के मुताबिक जनवरी 2026 में दुनिया के नौ परमाणु-सशस्त्र देशों के पास कुल करीब 12,187 परमाणु हथियार थे। इनमें भारत के पास लगभग 190 और पाकिस्तान के पास करीब 170 वारहेड का अनुमान लगाया गया है। SIPRI के अनुसार दोनों देशों ने 2025 में भी अपने परमाणु हथियारों और उनसे जुड़े डिलीवरी सिस्टम को विकसित करना जारी रखा।
लेकिन सवाल यह है कि जब कुछ देशों ने परमाणु हथियारों से दूरी बनाने का रास्ता चुना, तो भारत ने NPT और CTBT पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?
इसका जवाब केवल “परमाणु हथियार रखने” तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सुरक्षा, वैश्विक परमाणु व्यवस्था, संधियों की संरचना और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ी लंबी बहस है।
चार देशों की कहानी अलग-अलग है
परमाणु हथियार छोड़ने वाले देशों का उदाहरण अक्सर एक साथ दिया जाता है, लेकिन उनकी परिस्थितियां समान नहीं थीं।
दक्षिण अफ्रीका इस सूची का सबसे अलग मामला है। उसने अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम विकसित किया और बाद में उसे समाप्त कर दिया। उसने 1991 में NPT पर हस्ताक्षर किए और 1996 में CTBT पर हस्ताक्षर किए। दक्षिण अफ्रीका का अनुभव इस बात का उदाहरण है कि कोई देश अपनी सुरक्षा और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के बाद परमाणु हथियार कार्यक्रम को खत्म करने का फैसला कर सकता है।
दूसरी ओर यूक्रेन, बेलारूस और कजाकिस्तान को सोवियत संघ के विघटन के बाद उनकी धरती पर मौजूद सोवियत परमाणु हथियार विरासत में मिले थे। इन हथियारों का वहां मौजूद होना इन देशों द्वारा स्वतंत्र रूप से बनाए गए राष्ट्रीय परमाणु शस्त्रागार के समान नहीं था। सोवियत परमाणु कमान और नियंत्रण की व्यवस्था भी एक अलग संदर्भ में काम करती थी।
1990 के दशक में इन तीनों देशों ने परमाणु हथियारों से अलग होने की प्रक्रिया अपनाई और NPT तथा 1994 के Budapest Memorandum से जुड़ी प्रतिबद्धताओं के तहत अपने क्षेत्र में मौजूद सोवियत परमाणु हथियार रूस को हस्तांतरित किए गए।
यही वजह है कि इन देशों की मिसाल को सीधे भारत या पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति से जोड़ना उचित नहीं होगा।
भारत ने NPT पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?
भारत लंबे समय से Nuclear Non-Proliferation Treaty यानी NPT की संरचना पर आपत्ति जताता रहा है। NPT ने 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु विस्फोट कर चुके पांच देशों—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—को “nuclear-weapon states” की श्रेणी में रखा।
भारत का आधिकारिक रुख है कि वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण सार्वभौमिक, गैर-भेदभावपूर्ण और सत्यापन योग्य होना चाहिए। नई दिल्ली का तर्क रहा है कि ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती जिसमें कुछ देशों को स्थायी रूप से परमाणु हथियार रखने की मान्यता मिले और बाकी देशों के लिए अलग नियम हों। विदेश मंत्रालय आज भी सार्वभौमिक और गैर-भेदभावपूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण को भारत की नीति का आधार बताता है।
भारत का यह रुख नया नहीं है। विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों में 1968 के NPT और 1996 के CTBT को लेकर भारत की आपत्तियों को उसकी रणनीतिक और सुरक्षा चिंताओं से जोड़ा गया है।
CTBT पर भारत की आपत्ति क्या है?
Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty यानी CTBT का उद्देश्य परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाना है। भारत ने 1996 में अंतिम रूप दिए गए CTBT पर हस्ताक्षर नहीं किए।
भारत की आपत्ति का एक प्रमुख हिस्सा यह रहा कि वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण और परीक्षण रोकने की व्यवस्था सभी परमाणु शक्तियों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत ने परमाणु परीक्षण पर रोक के विचार का ऐतिहासिक रूप से समर्थन किया है और 1954 में ही परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबंध की मांग की थी। हालांकि 1996 में CTBT को लेकर भारत ने अपनी सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़े प्रश्न उठाए।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—CTBT पर हस्ताक्षर न करना परमाणु परीक्षण करने की घोषणा नहीं है। यह भारत की संधि-व्यवस्था को लेकर स्थिति है। भारत ने परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए सार्वभौमिक और गैर-भेदभावपूर्ण ढांचे की मांग जारी रखी है।
फिर भारत और पाकिस्तान के परमाणु भंडार क्यों बढ़ रहे हैं?
दक्षिण एशिया की परमाणु स्थिति को केवल भारत-पाकिस्तान के रिश्तों से समझना भी अधूरा होगा। चीन भी परमाणु क्षमता बढ़ा रहा है। SIPRI के अनुसार चीन का परमाणु शस्त्रागार 2025 में करीब 600 से बढ़कर लगभग 620 वारहेड तक पहुंचने का अनुमान है। इसी अवधि में भारत और पाकिस्तान ने भी अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों का आधुनिकीकरण जारी रखा।
भारत की रणनीतिक सोच में चीन और पाकिस्तान दोनों महत्वपूर्ण कारक हैं। SIPRI के अनुसार भारत का आधुनिकीकरण अब लंबी दूरी की प्रणालियों पर भी ज्यादा ध्यान दे रहा है, जबकि पाकिस्तान नई डिलीवरी प्रणालियों और हथियार सामग्री की क्षमता विकसित कर रहा है।
इसलिए दक्षिण एशिया का परमाणु समीकरण अब केवल दो देशों के बीच हथियारों की संख्या की तुलना नहीं रह गया है। इसमें चीन की क्षमता, मिसाइल तकनीक, समुद्री परमाणु क्षमता, नई सैन्य तकनीक और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण भी शामिल हो चुके हैं।
भारत का रुख सिर्फ परमाणु हथियार रखने तक सीमित नहीं
भारत खुद को परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में रखता है, लेकिन साथ ही आधिकारिक स्तर पर credible minimum deterrence और No First Use की नीति का उल्लेख करता रहा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत सार्वभौमिक परमाणु निरस्त्रीकरण के लक्ष्य के साथ इस नीति को जोड़ता है।
यानी भारत का घोषित दृष्टिकोण यह है कि परमाणु हथियार राष्ट्रीय सुरक्षा में प्रतिरोधक क्षमता का हिस्सा हैं, लेकिन अंतिम लक्ष्य वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों का पूर्ण और सत्यापन योग्य उन्मूलन होना चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां भारत की नीति को “परमाणु हथियारों के पक्ष में” या “निरस्त्रीकरण के पक्ष में” जैसे किसी एक शब्द में समेटना मुश्किल हो जाता है।
दुनिया के लिए सबसे बड़ी चिंता अब क्या है?
SIPRI की 2026 रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि दुनिया के सभी नौ परमाणु-सशस्त्र देश अपने शस्त्रागार को किसी न किसी रूप में आधुनिक बना रहे हैं। कुल परमाणु हथियारों की संख्या में गिरावट मुख्य रूप से अमेरिका और रूस द्वारा पुराने हथियारों को नष्ट किए जाने की वजह से बनी हुई है, जबकि नए हथियारों की तैनाती और आधुनिकीकरण की गति बढ़ रही है।
इस बदलती स्थिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हाइपरसोनिक हथियार, मिसाइल रक्षा और नई कमांड-एंड-कंट्रोल तकनीकें परमाणु स्थिरता के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। SIPRI ने 2026 में भारत, चीन और अमेरिका की परमाणु प्रणालियों में AI के संभावित उपयोग को भी अलग से अध्ययन किया है।



