Delhi HC POCSO Verdict: ‘शादी से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती’, नाबालिग पत्नी से संबंध पर मुस्लिम पर्सनल लॉ की दलील खारिज
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिगों की कानूनी सुरक्षा से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि किसी विवाह को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानने की दलील 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध के मामले में POCSO Act और आपराधिक कानून से सुरक्षा नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत कानून संसद द्वारा बनाए गए आपराधिक कानून में ऐसी छूट नहीं जोड़ सकता, जिसे कानून ने स्वयं नहीं दी है।
यह फैसला ऐसे मामले में आया, जिसमें एक व्यक्ति ने अपने खिलाफ दर्ज FIR और POCSO के तहत शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए मामले को आगे बढ़ने की अनुमति दी। फैसले में न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने व्यक्तिगत कानून और बाल संरक्षण कानून के बीच महत्वपूर्ण कानूनी अंतर को रेखांकित किया।
मामला 16 साल की लड़की और 28 वर्षीय व्यक्ति से जुड़ा
मामले के अनुसार, लड़की की शादी दिसंबर 2024 में हुई थी। उस समय उसकी उम्र 16 साल 3 महीने थी, जबकि पति की उम्र करीब 28 वर्ष थी। विवाह के बाद दोनों साथ रहे और लड़की गर्भवती हुई। बाद में सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी उम्र सामने आई, जिसके बाद पुलिस मामला दर्ज हुआ।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि विवाह दोनों की इच्छा और परिवारों की सहमति से हुआ था। उनका कहना था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में युवावस्था प्राप्त कर चुकी लड़की के विवाह की क्षमता को अलग तरीके से देखा जाता है, इसलिए विवाह के बाद बने संबंध को POCSO के तहत अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने नागरिक वैधता और आपराधिक जिम्मेदारी को अलग रखा
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि हाई कोर्ट ने विवाह की कथित नागरिक वैधता और नाबालिग के साथ यौन संबंध के आपराधिक परिणाम को दो अलग कानूनी प्रश्न माना।
अदालत के अनुसार, यदि किसी व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह को वैध माना भी जाए, तो उससे 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को POCSO के तहत मिलने वाली सुरक्षा समाप्त नहीं हो जाती। दूसरे शब्दों में, विवाह का अस्तित्व अपने आप उस व्यक्ति को आपराधिक कानून से छूट नहीं देता।
यही वह बिंदु है जो इस फैसले को व्यापक कानूनी संदर्भ देता है। POCSO कानून बच्चे की उम्र के आधार पर सुरक्षा निर्धारित करता है। अदालत ने इस उम्र-आधारित सुरक्षा को किसी व्यक्तिगत कानून से कमजोर करने से इनकार किया।
‘शादी से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती’
फैसले में अदालत की टिप्पणी का सबसे चर्चित हिस्सा यही है कि विवाह किसी बच्चे की उम्र को आगे नहीं बढ़ाता।
यानी यदि विवाह के समय कोई व्यक्ति 16 वर्ष का है, तो विवाह के बाद भी उसकी कानूनी उम्र 16 वर्ष ही रहती है। अदालत ने इसी आधार पर कहा कि POCSO और संबंधित आपराधिक प्रावधानों के तहत उम्र एक निर्णायक तथ्य है।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामले में विवाह को ही आपराधिक कार्यवाही से बचाव का आधार बनाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह और आपराधिक दायित्व को एक ही कानूनी प्रश्न नहीं माना जा सकता।
POCSO में 18 वर्ष की उम्र क्यों महत्वपूर्ण है?
POCSO Act बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने वाला विशेष कानून है। इसकी व्यवस्था में 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति ‘child’ माना जाता है। इसलिए किसी नाबालिग के साथ यौन संबंध के मामले में केवल यह कहना कि उसने विवाह किया था या परिवार की सहमति थी, अपने आप आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने का आधार नहीं बन जाता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत कानून को आपराधिक कानून में ऐसी छूट देने वाला माध्यम नहीं बनाया जा सकता, जिसे संसद ने कानून में शामिल नहीं किया है।
BNS के प्रावधानों का भी आया संदर्भ
मामले में POCSO Act की धारा 6 के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64(1) के तहत भी मामला दर्ज किया गया था। हाई कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया।
इससे यह संदेश निकलता है कि नाबालिग से जुड़े यौन अपराधों में जांच और अभियोजन के दौरान केवल विवाह की स्थिति पर निर्भर रहने के बजाय लागू आपराधिक कानून और बच्चे की उम्र को प्राथमिक कानूनी कसौटी के रूप में देखा जाएगा।
परिवार की सहमति से विवाह होने की दलील भी पर्याप्त नहीं
इस मामले की एक अहम बात यह भी है कि रिपोर्टों के अनुसार लड़की ने विवाह को अपनी इच्छा और दोनों परिवारों की सहमति से हुआ बताया था। उसने कथित तौर पर अपने पति की जमानत का समर्थन भी किया था।
फिर भी अदालत ने POCSO के संदर्भ में इस तथ्य को आपराधिक कार्यवाही खत्म करने का आधार नहीं माना। यही POCSO की कानूनी संरचना को समझने की कुंजी है—कानून बच्चे की उम्र के आधार पर विशेष सुरक्षा देता है और केवल सहमति या वैवाहिक स्थिति के आधार पर उस सुरक्षा को समाप्त नहीं किया जा सकता।
फैसले का व्यापक असर क्या हो सकता है?
यह फैसला केवल एक परिवार या एक FIR तक सीमित कानूनी विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका महत्व इस बात में है कि अदालत ने व्यक्तिगत कानून और बाल संरक्षण के लिए बनाए गए केंद्रीय आपराधिक कानून के बीच सीमा को स्पष्ट किया है।
भविष्य में ऐसे मामलों में यदि आरोपी पक्ष विवाह की वैधता को आपराधिक कार्यवाही से बचाव के रूप में पेश करता है, तो अदालतें इस फैसले में व्यक्त सिद्धांतों को ध्यान में रख सकती हैं। हालांकि, हर मामले के तथ्य अलग होते हैं और अंतिम कानूनी निष्कर्ष संबंधित मामले के साक्ष्यों और लागू प्रावधानों पर निर्भर करेगा।
इस फैसले का व्यावहारिक संदेश भी स्पष्ट है—नाबालिग की उम्र विवाह के बाद भी वही रहती है और विवाह अपने आप POCSO के तहत आपराधिक दायित्व से सुरक्षा नहीं देता।



