Assam Politics: हिरासत से बाहर आते ही आशुतोष रांका का हिमंत सरमा को चैलेंज, बोले- ‘कॉकरोचों ने अभी शुरुआत की है’
गुवाहाटी: असम की राजनीति में रविवार को एक छोटे से संगठन की प्रस्तावित बैठक पुलिस कार्रवाई और तीखे राजनीतिक आरोपों के बीच चर्चा का विषय बन गई। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक आशुतोष रांका और संगठन के कई कार्यकर्ताओं को गुवाहाटी में प्रस्तावित वॉलंटियर्स मीटिंग से पहले हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई। रिहाई के बाद रांका ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर सीधे निशाना साधते हुए कहा कि उनकी पार्टी की गतिविधियां अभी सिर्फ शुरुआत हैं।
घटना के बाद विवाद का केंद्र सिर्फ हिरासत नहीं रहा। CJP ने इसे अपनी राजनीतिक गतिविधियों को रोकने की कार्रवाई बताया, जबकि पुलिस की ओर से अब तक हिरासत के विस्तृत कारण को लेकर सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। यही वजह है कि मामले में सामने आए राजनीतिक आरोपों और पुष्ट तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है।
बैठक से पहले हिरासत ने बढ़ाया सियासी विवाद
CJP ने गुवाहाटी में अपना पहला क्षेत्रीय वॉलंटियर्स सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई थी। रांका शनिवार को शहर पहुंचे थे और रविवार को कार्यकर्ताओं से मुलाकात प्रस्तावित थी। रिपोर्टों के मुताबिक, बैठक से पहले रांका सहित संगठन के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। अलग-अलग रिपोर्टों में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या 30 से 40 से अधिक बताई गई है।
CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने आरोप लगाया कि पुलिस ने बैठक को रोक दिया और संगठन के नेताओं को हिरासत में लेकर पुलिस परिसर ले जाया गया। दिपके ने रांका और अन्य कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग भी उठाई।
हालांकि, इन आरोपों के बीच यह महत्वपूर्ण है कि हिरासत की कानूनी वजह और पुलिस की आधिकारिक स्थिति को लेकर सार्वजनिक रूप से पूरी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है।
रिहाई के बाद रांका ने मुख्यमंत्री को घेरा
रिहाई के बाद आशुतोष रांका ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को निशाने पर लिया। उन्होंने लिखा कि असम के ‘कॉकरोचों’ ने अभी शुरुआत की है। यह टिप्पणी CJP के नाम और उसकी राजनीतिक शैली से जुड़ा हुआ बयान था।
रांका ने हिरासत को लेकर भी दावा किया कि उन्हें और उनकी टीम को बिना स्पष्ट आधार के हिरासत में लिया गया। उनके अनुसार, जब उन्होंने पुलिस से कार्रवाई का कारण पूछा तो उन्हें कथित तौर पर बताया गया कि ऊपर से आदेश मिले हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इससे पहले हिरासत के दौरान रांका ने मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया था कि CJP असम के स्कूलों की स्थिति, काजीरंगा से जुड़े भूमि और अधिकारों के सवाल तथा राज्य में बाढ़ जैसे मुद्दों को सामने लाना चाहती है। ये रांका और CJP की ओर से लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर आवश्यक है।
अभिजीत दिपके ने भी दी प्रतिक्रिया
CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने रांका की हिरासत के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह भी पुलिस स्टेशन पर प्रदर्शन में शामिल होने वाले थे। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि यदि रांका और अन्य कार्यकर्ताओं को नहीं छोड़ा गया तो वह और अधिक पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ असम पहुंचेंगे।
इस घटनाक्रम से साफ है कि CJP इस मामले को केवल स्थानीय संगठनात्मक कार्यक्रम में आई रुकावट के तौर पर नहीं देख रही, बल्कि इसे राज्य में अपनी राजनीतिक मौजूदगी के बड़े मुद्दे के रूप में पेश कर रही है।
असम में CJP की गतिविधियां क्यों महत्वपूर्ण हैं?
इस घटना को समझने के लिए CJP की गतिविधियों के व्यापक संदर्भ को देखना जरूरी है। संगठन ने असम में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए वॉलंटियर्स के साथ बैठक, स्कूलों की स्थिति का जायजा और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर संवाद जैसी गतिविधियों की योजना बनाई थी। रिपोर्टों के अनुसार संगठन की गतिविधियां शिक्षा, मतदाता सूची और स्थानीय अधिकारों जैसे मुद्दों तक फैली हुई हैं।
ऐसे में गुवाहाटी की घटना संगठन को राज्य में शुरुआती राजनीतिक पहचान दिलाने वाली घटना बन सकती है। हालांकि, किसी संगठन की वास्तविक राजनीतिक स्वीकार्यता का आकलन केवल एक हिरासत या सोशल मीडिया बयान से नहीं किया जा सकता। उसके लिए जमीन पर संगठन की पहुंच, कार्यकर्ताओं की संख्या, स्थानीय मुद्दों पर अभियान और जनता की प्रतिक्रिया जैसे कई पहलुओं को देखना होगा।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल इस विवाद का अगला चरण दो स्तरों पर दिखाई देता है। पहला, पुलिस की ओर से यदि हिरासत के कारण और कानूनी आधार पर कोई विस्तृत जानकारी आती है तो उससे घटना की प्रशासनिक तस्वीर साफ हो सकती है। दूसरा, CJP इस कार्रवाई को अपने असम अभियान के लिए राजनीतिक मुद्दा बनाती है या नहीं, यह आगे देखना होगा।
रांका और दिपके के बयानों से संकेत मिलता है कि संगठन पीछे हटने के बजाय राज्य में अपनी गतिविधियां बढ़ाने की कोशिश कर सकता है। दूसरी तरफ, यदि भविष्य में ऐसे कार्यक्रमों को लेकर प्रशासन और संगठन के बीच फिर टकराव होता है, तो यह मामला राजनीतिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक अधिकार और सार्वजनिक कार्यक्रमों की अनुमति जैसे व्यापक सवालों तक पहुंच सकता है।



