चेक बाउंस केस में दिल्ली हाई कोर्ट का अनोखा आदेश, जुर्माना माफ कर वकील से कर्मचारियों को चाय-समोसे खिलाने को कहा
नई दिल्ली। चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का एक आदेश इन दिनों चर्चा में है। अदालत ने एक कंपनी पर पहले लगाए गए ₹50 हजार के खर्च को माफ करते हुए उसके वकील को दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) के सभी कर्मचारियों के लिए चाय और समोसे की व्यवस्था करने का निर्देश दिया। हालांकि, इस आदेश का असल संदेश सिर्फ चाय-समोसे तक सीमित नहीं है, बल्कि अदालत के सामने पूरी और सही जानकारी रखने की जिम्मेदारी से जुड़ा है।
मामला Indus Birra Beverages की ओर से दायर याचिका से संबंधित है। कंपनी ने चेक बाउंस मामले में निचली अदालत की कार्यवाही को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का रुख किया था। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि मामले से संबंधित ट्रायल कोर्ट का एक आदेश हाई कोर्ट के समक्ष पेश नहीं किया गया था।
अदालत ने विरोधाभासी बयानों पर जताई नाराजगी
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने 20 अगस्त को कंपनी के रवैये पर गंभीर आपत्ति जताते हुए ₹50 हजार का खर्च लगाया था। अदालत की नाराजगी का मुख्य कारण यह था कि अलग-अलग अदालतों के सामने कंपनी की ओर से विरोधाभासी बातें रखी गईं और महत्वपूर्ण जानकारी सामने नहीं लाई गई।
न्यायिक प्रक्रिया में किसी पक्ष से अपेक्षा होती है कि वह मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और पूर्व आदेशों को अदालत के संज्ञान में लाए। किसी तथ्य को छिपाने से अदालत के सामने मामले की पूरी तस्वीर नहीं आ पाती और इससे न्यायिक निर्णय प्रभावित होने की स्थिति बन सकती है।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह ऐसे आचरण को स्वीकार नहीं करता, जिसमें जानकारी छिपाकर या अदालत को गुमराह करने की कोशिश के जरिए अपने पक्ष में आदेश हासिल करने का प्रयास किया जाए।
₹50 हजार का खर्च माफ, लेकिन मिली अलग तरह की जिम्मेदारी
कंपनी की ओर से बाद में ₹50 हजार के खर्च को माफ करने के लिए आवेदन दिया गया। 17 सितंबर को इस आवेदन पर सुनवाई हुई। अदालत ने आवेदन स्वीकार करते हुए पहले लगाया गया खर्च समाप्त कर दिया, लेकिन इसके साथ एक अलग निर्देश दिया।
कोर्ट ने कंपनी के वकील को एक सप्ताह के भीतर दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सभी कर्मचारियों के लिए चाय और समोसे की व्यवस्था करने को कहा।
इससे पहले ₹50 हजार की राशि कंपनी के वकीलों की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन लॉयर्स सोशल सिक्योरिटी एंड वेलफेयर फंड में जमा कराने का निर्देश दिया गया था। बाद में अदालत ने जुर्माने को माफ करते हुए चाय-समोसे की व्यवस्था का निर्देश दिया।
आदेश का व्यापक संदेश क्या है?
इस मामले को केवल अदालत के ‘अनोखे’ आदेश के तौर पर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे न्यायिक प्रक्रिया में ईमानदारी, पारदर्शिता और पूर्ण तथ्य प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण सिद्धांत दिखाई देता है।
किसी मुकदमे में एक पक्ष द्वारा पहले से पारित महत्वपूर्ण आदेश को अदालत के सामने न रखना दूसरे पक्ष के अधिकारों और अदालत की निर्णय प्रक्रिया दोनों को प्रभावित कर सकता है। खासतौर पर तब, जब अलग-अलग अदालतों में मामले से संबंधित अलग-अलग दावे किए गए हों।



